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आयुष्मान भारत योजनाः संसाधन-सुविधा और पैसों के अभाव में मरीज तो मरीज अस्पताल भी हो रहे बीमार

मोदी सरकार ने बड़े जोर-शोर से जिस आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत की थी, उसका भी वही हाल हुआ जो दूसरी तमाम योजनाओं का हुआ है। इलाज और इलाज के बाद भुगतान की प्रक्रिया को लेकर भ्रम की वजह से निजी अस्पताल इससे कन्नी काट रहे हैं और इसका फायदा लोगों को नहीं हो रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया

नवजीवन डेस्क

पिछले साल बड़े जोर-शोर से आयुष्मान भारत योजना जब लॉंच की गई, तो इसे ‘मोदी केयर’ कहा गया। लेकिन इस योजनाका भी वही हाल हुआ जो मोदी सरकार की दूसरी तमाम योजनाओं का हुआ है। यानी आधी-अधूरी तैयारी के कारण इसका फायदा लोगों को नहीं हो रहा है। अभी इलाज और इलाज के बाद भुगतान कैसे होगा, इसकी प्रक्रिया को लेकर तमाम भ्रम हैं जिसके कारण निजी अस्पताल इससे कन्नी काट रहे हैं। नवजीवन आज से देशभर में इस योजना की स्थिति पर एक विशेष रिपोर्ट की श्रंखला शुरू कर रहा है, जिसकी पहली कड़ी में आज उत्तराखंड और बिहार में योजना की जमीनी हकीकत से हम पाठकों को रूबरू करा रहे हैं।

उत्तराखंड में योजना का हालः पैसों के बिना कैसे होगा 23 लाख परिवारों का मुफ्त इलाज?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो कदम आगे बढ़ते हुए आयुष्मान योजना में केंद्र सरकार द्वारा चुने गए गरीब परिवारों से पांच गुना अधिक परिवारों को महंगे से महंगे अस्पतालों में सालाना पांच लाख रुपये तक मुफ्त इलाज की घोषणा तो कर दी, मगर इस असंभव काम को संभव बनाने के लिए उनके हाथ कौन सा जादुई चिराग लग गया, इसकी जानकारी प्रदेश की जनता को तो नहीं ही है, मंत्रियों और नौकरशाही को भी नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्रीअटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर गत 25 दिसंबर को उत्तराखंड के सीएम ने ‘अटल आयुष्मान योजना’ की शुरुआत की। भारत सरकार ने आयुष्मान योजना का नाम बदलकर ‘प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ कर दिया है, मगर उत्तराखंड सरकार अब भी आयुष्मान पर ही कायम है। यही नहीं, केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत साल 2011 की आर्थिक-सामाजिक जनगणना के आधार पर राज्य में केवल 5.37 लाख परिवारों को चुना है, जिसका खर्च केंद्र सरकार ही वहन करेगी। लेकिन ठीक लोकसभा चुनाव से पहले योजना को लागू करने वाले पहले राज्य के तमगे के लिए त्रिवेंद्र सरकार ने राज्य की दयनीय आर्थिक स्थिति या राज्य की विशेष भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को परे खिसकाते हुए सभी 23 लाख परिवारों को साल में 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की योजना लांच कर दी। शेष 19 लाख परिवारों के लोगों का महंगा मुफ्त इलाज कहां से होगा, इसका रोडमैप सरकार के पास नहीं है।

सामान्यतः सबसे खर्चीला इलाज कैंसर और न्यूरो सर्जरी का होता है। राज्य में कैंसर रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2011 में राज्य में 11,240 कैंसर के रोगी थे जो 2015 में बढ़कर 11,796 हो गए। इनके इलाज के लिए ही सरकार को 589.80 करोड़ चाहिए। इस पहाड़ी राज्य में सड़क दुर्घटनाएं बहुत होती हैं। वर्ष 2016 में 1591 सड़क हादसे हुए थे, जिनमें 962 लोग मारे गये और 1735 घायल हुए। इनमें शहरों में रोजमर्रा होने वाली दुर्घटनाएं शामिल नहीं हैं। इन दुर्घटनाओं में हेड इंजुरी ज्यादा होती हैं, जिसके लिए न्यूरो सर्जरी की जरूरत होती है जो बहुत महंगी है। इनके अलावा पहाड़ों में चट्टान और पेड़ों से गिरने की घटनाएं बहुत होती हैं जिनमें ज्यादातर महिलाएं होती हैं और बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जो बिना इलाज के दम तोड़ देते हैं।

उत्तराखंड के चालू वित्त वर्ष के 45,585 करोड़ के बजट में वेतन, ऋणों पर ब्याज, ऋणों की किश्तें, पेंशन आदि पर 27,206 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है। चाहे बाकी काम हो या न हों, कर्मचारियों को वेतन आदि देने जैसे प्रतिबद्ध खर्चे तो सरकार को करने ही होंगे। जबकि राज्य सरकार को अपने करों और केंद्र सरकार से केंद्रीय करों में 42 प्रतिशत के अंश को मिलाकर कुल 26,725.36 करोड़ मिलने हैं। यह आमदनी भी तब है, जब हर मद में सौ फीसदी वसूली हो जाए, जो संभव नहीं। इसलिए सरकार को हर साल वेतन आदि के लिए भी कर्ज लेना होता है। राज्य के 45 हजार करोड़ के बजट को 9510 करोड़ रुपये का कर्ज लेकर भी पूरा किया जाना है। इन आंकड़ों से स्पष्टहै कि जिस सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं, वह 5 लाख की जगह 23 लाख परिवारों का सालाना 5 लाख तक इलाज का खर्च कैसे वहन करेगी। वैसे भी मात्र 18 सालों में इस राज्यपर लगभग 50 हजार करोड़ का कर्ज चढ़ चुका है जिसका ब्याज ही हर साल लगभग 4906 करोड़ तक पहुंच गया है। चिकित्सा, शिक्षाऔर आजीविका उत्तराखंड की तीन बड़ी समस्याएं रही हैं। खास कर इन्हीं समस्यओं के समाधान के लिये राज्य के लोगों ने अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग की थी और इन्हीं कारणों से पिछले 10 सालों में 3946 गावों से 1,18,981 लोग पहाड़ों से स्थायी तौर पर पलायन कर गए। लेकिन 18 साल बाद भी ये समस्याएं जहां की तहां हैं। राज्य के मैदानी क्षेत्रों में गरीबी तो है मगर साधन-संपन्न लोगों के लिए चिकित्सा सुविधा काअभाव नहीं। लेकिन राज्य के 84.37 प्रतिशत पहाड़ी भूभाग में स्थिति चिंताजनक है। ऐसे अनगिनत मामले हैं जब महिलाओं ने स्वास्थ्य केंद्र जाने के दौरान रास्ते में ही बच्चे को जन्म दे दिया।

पहाड़ में दुर्घटना में घायल और गंभीर रोगी कई बार मैदानी अस्पतालों तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। पहाड़ के अस्पतालों में न तो डॉक्टर होते हैं और न जरूरी उपकरण। और तो और, प्रदेश मुख्यालय में भी एक भी स्तरीय ट्रॉमा सेंटर नहीं। जहां ऐसे सेंटर बनाए गए हैं, वहां आवश्यक सुविधाएं नहीं हैं। मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र डोइवाला में सरकारी अस्पताल को निजी क्षेत्र में देने के बाद स्थिति और भी खराब हो गई है। राज्य में डॉक्टरों एवं पैरामेडिकल आदि के 7090 चिकित्सा कर्मियों के पद हैं जिनमें से 1606 खाली हैं। इन खाली पदों में पुरुष डॉक्टरों के 698 तथा महिला डॉक्टरों के 179 हैं। जो डॉक्टर उपलब्ध हैं, वे देहरादून जैसे मैदानी और शहरी इलाकों में ही तैनात हैं। पुरुष डॉक्टरों के सामने संकोची पहाड़ी महिलाएं अपना असली दर्द नहीं बता पातीं। कई जगह पुरुष डॉक्टर ही प्रसव भी कराते हैं। राज्य में केवल 36 प्रतिशत महिलाओं को संस्थागत प्रसव सुविधा मिल पाती है शेष प्रसव दायियों के भरोसे होते हैं, जिस कारण लाख में से लगभग 188 महिलाएं प्रसव के समय दम तोड़ देती हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार की मुफ्त चिकित्सा योजना लोगों को मुंह ही चिढ़ा रही है।

बिहारः संसाधन-सुविधा दिए बगैर कैसे फलेगा ‘आयुष्मान भव!’

सब्जी बेचने वाली एक महिला अपनी बेटी के साथ ट्रेन से जा रही थी। बेटी ट्रेन से गिर गई और उसे सिर में गंभीर चोट आई। जिंदगी पर खतरा था। बिहार में अमूमन गरीब औरतें आंचल के कोने में ही पैसे बांधकर रखती हैं, लेकिन इस मां के आंचल में इतने पैसे भी नहीं थे कि किसी डॉक्टर से दिखा सके। भटकते-भटकते इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) पहुंची। मेडिकल सुपरिटेंडेंट अपने कक्षके बाहर निकले ही थे कि उनके पैरों पर गिर पड़ी। अस्पताल के अधिकारी ने हालत पर तरस खाकर अपने पैसे से अस्पताल में उसका रजिस्ट्रेशन कराया कि डॉक्टर देख लें। अचानक किसी ने कहा कि महिला के पास आधार है। फिंगर प्रिंट मैच कराया गया तो आयुष्मान भारत योजना के लाभार्थी के रूप में उसकी पुष्टि हुई। फिर क्या था, इलाज हुआ और उसे देखने सूबे के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय भी पहुंचे। मामला सुर्खियों में आया। लेकिन यह कहानी यहां तक ही अच्छी है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की असल कहानी तो यहां से शुरू होती है। लड़की का इलाज तो शुरू हो गया, लेकिन अस्पताल बीमार नजर आने लगे। बिहार में संसाधन और सिस्टम तैयार किए बगैर ही आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत करने के कारण इलाज करने वाले अस्पताल सरकार से पैसे की भरपाई (प्रतिपूर्ति) के लिए परेशान हैं।

बाकी की कौन कहे, एम्स तक परेशान

प्रधानमंत्री जन आरोग्य के तहत आयुष्मान भारत योजना 4 सितंबर से ट्रायल के बाद 23 सितंबर से शुरू हुई। खूब प्रचार हुआ और सरकार ने हर स्तर पर तैयारी की जानकारी दी। लेकिन, अब सामने आ रहा है कि बिहार में पूरा सिस्टम तैयार किए बगैर न केवल इसकी लांचिंग की गई, बल्कि तीन महीने से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी कुछ भी ट्रैक पर नहीं आ सका है। बड़े निजी अस्पताल शुरू में ही इस आशंका के कारण योजना से जुड़ना नहीं चाह रहे थे। जो जुड़े, वे भुगत रहे हैं। केंद्र और राज्य, दोनों में एनडीए की सरकार होने के बावजूद योजना पूरी तरह फिट नहीं दिख रही। मल्टी स्पेशिएलिटी निजी अस्पताल योजना से जुड़ भी गए हैं तो सरकार की ओर से भुगतान में देर के कारण कोई न कोई बहाना बनाकार आयुष्मान भारत के मरीजों से दूरी बनाने की फिराक में होते हैं। सरकारी अस्पताल ऐसे मरीजों को भर्ती कर उनका इलाज कर भी रहे हैं तो सरकार से भरपाई (प्रतिपूर्ति) नहीं ले पा रहे। बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीएमसीएच हों या गवर्निंग बॉडी के तहत सरकारी सुविधा देने वाला आईजीआईएमएस, परेशान सभी हैं लेकिन इसके अधिकारी मजबूरीवश मुंह नहीं खोल रहे। अनौपचारिक बातचीत में एम्स तक के प्रबंधकीय अधिकारी बता रहे हैं कि मरीजों का इलाज तो अप्रूवल आ जाने पर कर दिया जा रहा है, लेकिन उसी अप्रूवल के आधार पर जब भरपाई (प्रतिपूर्ति) के लिए सरकार के पास फरियाद लगाई जाती है तो लंबे समय तक कोई रिस्पांस नहीं मिलता। योजना राशि से ही इसकी भरपाई की जानी है और सरकार कई बार कह चुकी है कि इसके लिए धन पर्याप्त है, फिर भी भरपाई नहीं हो पा रही है। नतीजा है कि अस्पताल के बिल लगातार पेंडिंग होते जा रहे हैं और फंड के अभाव में अस्पताल इलाज में परेशानी की आशंका से भी डरे हुए हैं।

दवा वालों को लेकर सबसे ज्यादा परेशानी

अस्पताल आयुष्मान भारत योजना के लाभार्थियों के इलाज के दौरान दवा खर्चको लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं। एक बड़े सरकारी अस्पताल के प्रबंधकीय अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया किअस्पताल आईसीयू, सर्जरी या नर्सिंग मद का भुगतान तो कुछ समय के लिए बर्दाश्त कर लेता है, लेकिन दवाओं का भुगतान रोकना संभव नहीं होता। ज्यादातर अस्पतालों में सरकारी दवा दुकान या तो नहीं है और है भी तो सारी दवाएं नहीं मिलतीं। ऐसे में अस्पताल योजना की मजबूरियों के कारण मरीज से पैसे न लेकर कहीं से भी दवा ले तो उसे भुगतान करना पड़ता है। अस्पताल अपने फंड से दवा दुकान को भुगतान कर भी फंस जाता है, क्योंकि उसे आयुष्मान भारत के फंड से प्रतिपूर्ति नहीं मिल पा रही है। जिन सरकारी अस्पतालों में सेमी-गवर्नमेंट व्यवस्था के तहत दवा दुकानें हैं, वहां दुकान प्रबंधन अपने स्तर से फिलहाल इसे बर्दाश्त कर रहा है।

सारा फोकस पटना पर, बाकी का हाल बुरा

बिहार में पटना के अलावा भी भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया, समस्तीपुर, बेगूसराय, पूर्णिया, मुंगेर, दरभंगा, मोतिहारी जैसे ठीक-ठाक शहर हैं, लेकिन मेडिकल सुविधा के मामले में नीतीश सरकार ने इन जगहों पर काम न के बराबर किया है। हालत यह है कि भागलपुर जैसे पुराने और बड़े शहर के सरकारी अस्पताल जेएलएनएमसीएच में ब्रेन इंजुरी के केस आते ही पटना रेफर करने की तैयारी रहती है। आयुष्मान भारत योजना को लेकर भी मरीजों को यही परेशानी झेलनी पड़ती है। योजना का लाभ लेने के लिए ज्यादातर लोगों को पटना का रुख करना पड़ता है, जिसके कारण पीएमसीएच, आईजीआईएमएस, इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान जैसे बड़े अस्पतालों में आईसीयू और एचडीयू के लिए हमेशा मारामारी रहती है।

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