आयुष्मान भारत योजनाः काश! कागजी घोड़े दौड़ाने से ही हो जाता इलाज...

मोदी सरकार की अन्य योजनाओं की तरह ही काफी शोर-शराबे के साथ शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना कागजों पर सिमट कर रह गई है। इलाज और भुगतान की प्रक्रिया पर भ्रम की वजह से अस्पताल मरीजों से कन्नी काट रहे हैं और आम लोग सरकारी दफ्तरों और अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

बीते साल मोदी सरकार ने काफी शोर-शराबे के साथ आयुष्मान भारत योजना लॉंच किया था। इस योजना को ‘मोदी केयर’ का नाम भी दिया गया। लेकिन इस योजना का भी वही हाल हुआ जो मोदी सरकार की दूसरी तमाम योजनाओं का हुआ है। यानी आधी-अधूरी तैयारी के कारण इसका फायदा लोगों को नहीं हो रहा है। अभी इलाज और इलाज के बाद भुगतान कैसे होगा, इसकी प्रक्रिया को लेकर तमाम भ्रम हैं, जिसके कारण निजी अस्पताल मरीजों के इलाज से कन्नी काट रहे हैं। नवजीवन देशभर में इस योजना की स्थिति पर एक विशेष रिपोर्ट की श्रंखला चला रहा है, जिसकी तीसरी कड़ी में आज महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में इस योजना की जमीनी हकीकत से हम पाठकों को रूबरू करा रहे हैं।

महाराष्ट्रः काश! कागजी घोड़े दौड़ाने से ही हो जाता इलाज तो क्या बात थी

महाराष्ट्र में आयुष्मान भारत योजना 23 सितंबर 2018 को शुरू की गई। राज्य में यह योजना स्वतंत्र रूप से लागू नहीं है बल्कि इसे महात्मा ज्योतिबा फुले जन आरोग्य योजना के साथ जोड़ दिया गया है। इस वजह से इस योजना को लेकर लोग जागरूक नहीं हैं और न ही राज्य सरकार की ओर से इसकी जागरूकता के लिए कोई प्रयास किया जा रहा है। इसी का असर है कि इस योजना के तहत तीन महीने में सिर्फ 1683 लोगों का इलाज किया गया। मगर इनमें भी 1321 लोग ही पांच लाख रुपये के अंदर उपचार करा पाए। इस योजना के पात्र मरीज अस्पतालों में पांच लाख तक के इलाज के लिए परेशानी में फंसना नहीं चाहते, बल्कि वे निजी अस्पतालों में महात्मा फुले योजना के तहत इलाज कराने पहुंच रहे हैं क्योंकि इस योजना की तरह आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत इलाज कराना आसान नहीं है।

महात्मा फुले योजना में लाभार्थी को डेढ़ लाख रुपये तक की ही इलाज की सुविधा मिलती है। एनजीओ सिटीजन हेल्थकेयर फोरम के रूग्णमित्र के अध्यक्ष विनोद साडविलकर का कहना है किआयुष्मान भारत योजना अभी कागज पर ही है। इसे पूरी तरह से जमीन पर अमल में नहीं लाया गयाहै। इसलिए इसके जो लाभार्थी हैं, उन्हें यह पता नहीं कि इसके तहत कैसे इलाज कराना है। इसलिए वे महात्मा फुले योजना का ही लाभ ले रहे हैं। जब राज्य के चिकित्सा निदेशक प्रवीण शिगड़े से यह जानने की कोशिश की गई कि आयुष्मान योजना के बारे में लोगों में जागरुकता क्यों नहीं फैलाई जा रही, तो उन्होंने कहा कि इसके लिए आप महात्मा फुले योजना के सीईओ सुधाकर शिंदे से भेंट कर लें क्योंकि वही आयुष्मान भारत के भी प्रभारी हैं और वही इस बारे में बात कर सकते हैं। लेकिन साडविलकर का कहना है कि अगर सरकारी अस्पतालों के प्रभारी चिकित्सा निदेशक इतने लापरवाह हों तो आयुष्मान भारत को भला कैसे सफलता मिल सकती है?

साडविलकर को महात्मा फुले योजना और आयुष्मान भारत के संयोजक डॉक्टर वारिस ने जानकारी दी थी कि बीएमसी के अस्पताल सायन, नायर और केईएम के अलावा जेजे अस्पताल और टाटा कैंसर अस्पताल में आयुष्मान भारत योजना लागू है। लेकिन छानबीन करने पर अस्पतालों की सूची में ये अस्पताल नहीं दिखे। सायन और केईएम अस्पताल के समाज विकास विभाग के कर्मचारियों का भी कहना है कि घोषणा अभी कागज पर है, इसे अभी अमल में लाया जाना है।

आयुष्मान भारत के तहत लाभार्थी को पांच लाख रुपये तक की उपचार की सुविधा देने की योजना है। लाभार्थी को इलाज के दौरान यह रकम अदा नहीं करनी है बल्कि स्वास्थ बीमा कंपनी को इलाज पर खर्च राशि का भुगतान सीधे अस्पताल को करना होता है। इसके लिए सरकार टेंडरिंग के जरिेये बीमा कंपनी का चयन करती है। राज्य में महात्मा फुले योजना से नेशनल इंश्योरेंस कंपनी जुड़ी हुई है। इस कंपनी के एक अधिकारी का कहना है कि अगर राज्य सरकार ने महात्मा फुले योजना के साथ आयुष्मान भारत को भी लागू किया है, लेकिन इसके लिए सरकार ने अब तक टेंडर तो नहीं निकाला है। क्योंकि महात्मा फुले योजना में डेढ़ लाख तक के इलाज की सुविधा है जबकिआयुष्मान भारत के लिए पांच लाख की। इसलिए अतिरिक्त साढ़े तीन लाख रुपये की बीमित राशि की व्यवस्था तो करनी होगी। नई टेंडरिंग में आयुष्मान भारत योजना हासिल करने के बाद ही नेशनल इंश्योरेंस लाभार्थी के पात्र को यह सुविधा दिलाने में सहयोग कर पाएगी।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सितंबर में सह्याद्रि गेस्ट हाउस में राज्यपाल सी. विद्यासागर राव और स्वास्थ मंत्री डॉ. दीपक सावंत की उपस्थिति में आयुष्मान भारत की घोषणा की थी। उस समय डॉ. सावंत ने आयुष्मान भारत को महात्मा फुले योजना के साथ संयुक्त रूप से लागू करने की जानकारी दी थी। उनके मुताबिक 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति के आधार पर की गई जनगणना के आंकड़ों से राज्य के 83.72 लाख परिवारों का चयन किया गया है और उन्हें पांच लाख रुपये तक का मुफ्त उपचार मिलेगा। पहले चरण में सरकारी और मेडिकल कॉलेजों में यह सुविधा मिलेगी और दूसरे चरण में निजी अस्पतालों में। आयुष्मान भारत के लिए राज्यभर में फिलहाल 81 सरकारी अस्पताल चुने गए हैं और कुल 419 अस्पताल प्रस्तावित हैं। विपक्ष की ओर से आयुष्मान भारत के लाभार्थी परिवार के चयन पर भी सवाल खड़ा किया गया है क्योंकि महात्मा फुले योजना का लाभ गरीबी रेखा के नीचे के 2.23 करोड़ परिवारों को दिया जा रहा है तो आयुष्मान भारत में 1.25 करोड़ परिवारों को वंचित क्यों रखा जा रहा है?

छत्तीसगढ़ः निजी अस्पतालों ने आयुष्मान भारत के तहत मरीजों का इलाज ही बंद कर दिया

पूरे देश की मुफ्त चिकित्सा के लिए केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना से नागरिक भले ही लाभ न उठा पा रहे हों, वोट की फसल उगाने वाले राजनीतिक दल और चिकित्सा बीमा के नाम पर करोड़ों का प्रीमियम लेकर बीमा कंपनियां जरूर इसका फायदा उठा रही हैं। योजना की हालत यह है कि छत्तीसगढ़ में 43 नर्सिंग होमबंद हो गए हैं। लगभग 56 करोड़ रुपये के चिकित्सा भुगतान का अतापता नहीं है। लगभग 4000 चिकित्सा मामलों को भुगतान योग्य नहीं माना गया। राज्य के डॉक्टर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं और पहली जनवरी से सभी निजी चिकित्सकों और नर्सिंग होम ने आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत इलाज बंद कर दिया है।

योजना के कारण गरीब और असहाय वर्ग सरकार द्वारा दी गई आधी-अधूरी और गलत जानकारी का खामियाजा भुगत रहा है और डॉक्टरों को बीमा कंपनी के इंस्पेक्टर राज का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा डॉक्टरों को योजना को सफल बनाने के लिए डाले जा रहे सरकारी दबाव और धमकियों का सामना भी करना पड़ रहा है। आयुष्मान भारत योजना की खामियों के बारे में बताते हुए दुर्ग में अमृत कलश नर्सिंग होम के संचालक डॉ. अनुप अग्रवाल बताते हैं कि योजना ही गलत बनाई गई है। सभी बीमारियों के इलाज की दर तय है जो बेहद कम है और यह बात आम लोगों को पता नहीं है जिस कारण आए दिन अस्पताल में बवाल होता है। मरीजों, विशेषकर महिलाओं की निजता समाप्त हो गई है क्योंकि उसके गुप्त इलाज की जानकारी भी बीमा कंपनी को सचित्र देनी पड़ती है इससे चिकित्सा शपथ का भी उल्लंघन हो रहा है।

राज्य में हॉस्पिटल बोर्ड के चेयरमैन डॉ. राकेश गुप्ता सरकारी मशीनरी को सीधे तौर पर दोषी बताते हुए कहते हैं कि सरकार और बीमा कंपनी की सांठ-गांठ में चिकित्सा व्यवसाय बन रही है और मरीज कस्टमर बन गया है। उन्होंने राज्य के चिकित्सा संचालक प्रसन्ना और स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा प्रमुख बिजेंद्र कटरे पर मनमानी करने, बदसलूकी करने और केस रिजेक्शन मामले में भारी भ्रष्टाचार करने के साथ गत बीजेपी सरकार में शामिल मंत्रीऔर विधायक के नजदीकी गैर चिकित्सक लोगों द्वारा संचालित नर्सिंग होम को लाभ पहुंचाने का भी आरोप लगाया।

राज्य के आईएमए के अध्यक्ष डॉ. अशोक त्रिपाठी ने बताया कि योजना शुरू से ही खामियों से भरी है। योजना के सॉफ्टवेयर में तमाम दिक्कतें हैं, फार्म भरने, डिस्चार्ज करने में दो से तीन घंटे का समय लग जाता है। आयुष्मान मित्र नाम के कार्यकर्ताओं को भी पूरी जानकारी नहीं है, जबकि बीमा कंपनी साफ कहती हैं हम चैरिटी करने नहीं बैठें हैं। कोई दावा क्यों खारिज किया गया, इसका ऑडिट नहीं किया जाता जिससे यह पता चलता कि गड़बड़ी कहां है। इन सबमें सबसे अजीब स्थिति डॉक्टरों की हो जाती है। हर ओर से उन्हें ही शिकार होना पड़ता है और इसी कारण वे धरना-प्रदर्शन के लिए मजबूर होते हैं। त्रिपाठी ने कहा कि सरकार की योजना अव्यावहारिक है और इसमें संवेदनशीलता का तत्व नहीं है इसलिए मजबूर होकर काम बंद करना पड़ा है।

योजना के हिसाब से सरकारी जिला चिकित्सालय, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर आदि भी तैयार नहीं हैं। दुर्ग के नोडल अधिकारी डॉ. आशीष शर्मा और सीएचएमओ डॉ. ठाकुर ने बताया कि जिले में कुल 40 सरकारी सेंटर हैं जिनमें से अब तक सिर्फ 11 में मरीजों की पहचान सुनिश्चित करने वाली बायोमीट्रिक मशीन लग पाई है। इनमें आज तक किसी भी बड़ी बीमारी का इलाज नहीं हुआ। कुल मिलाकर जिले में सात हजार लोगों को योजना का लाभ मिला है, जिसमें से सिर्फ दो हजार का इलाज सरकारी अस्पतालों में हुआ। जो सात हजार इलाज हुए, उनमें ज्यादातर डिलिवरी के केस हैं। आम लोगों को इस योजना के बारे में जिस तरह बताया जाता है, दरअसल सच्चाई इसके एकदम उलट है। आम आदमी को इसकी खामियों का अंदाजा तब होता है, जब वह इसके अंतर्गत इलाज के लिए अस्पताल जाता है।

(महाराष्ट्र से नवीन कुमार और छत्तीसगढ़ से प्रमोद अग्रवाल की रिपोर्ट)

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