हाईकोर्ट ने जैसे ही सुनाई बीजेपी विधायक अशोक सिंह चंदेल को उम्रकैद, पलक झपकते कोर्ट से फरार हो गए नेताजी

हमीरपुर से बीजेपी विधायक अशोक सिंह चंदेल को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 5 लोगों की हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। सजा की घोषणा होते ही अशोक चंदेल कोर्ट से फरार हो गए।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हमीरपुर से भारतीय जनता पार्टी के विधायक अशोक सिंह चंदेल और उनके 9 साथियों को 12 साल पुराने बहुचर्चित हत्याकांड मामले में शुक्रवार को इलाहबाद कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। बीजेपी विधायक और उनके साथियों को 5 लोगों की हत्या में दोषी पाए जाने पर कोर्ट ने सजा सुनाई है। सजा की घोषणा होते ही विधायक अशोक चंदेल कोर्ट से गायब हो गए।

साल 1997 में हमीरपुर के रोडवेज बस स्टैंड के पास बीजेपी नेता राजीव शुक्ल के भाई राकेश समेत एक ही परिवार के पांच लोगों की निर्मम हत्या कर दी गयी थी। इस दौरान पांच अन्य लोग जख़्मी भी हुए थे। इस मामले में बीजेपी विधायक अशोक सिंह चंदेल समेत नौ लोगों के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा चल रहा था। अशोक के ड्राईवर रुक्कू को इस मामले में पहले ही आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी थी। इस हत्याकांड मामले में ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त किया था।

गौरतलब है कि हमीरपुर में 26 जनवरी 1997 की शाम 7:30 बजे पुरानी रंजिश के चलते राजेश शुक्ला, राकेश शुक्ला, अम्बुज उर्फ गुड्डा, वेद नायक और श्रीकांत पांडेय की हत्या कर दी थी। इस घटना में राजीव कुमार शुक्ला, रविकांत पांडेय, विपुल, चंदन और हरदयाल घायल हो गए थे। घायल राजीव कुमार शुक्ल ने उसी रात 9:10 बजे इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

बीजेपी विधायक अशोक सिंह चंदेल हमीरपुर हत्याकांड के अलावा कानपुर के किदवई नगर में कारोबारी रणधीर गुप्ता की दिनदहाड़े हत्या के मामले में भी आरोपित है। इसके आलवा गोविन्द नगर थाने में अशोक के ऊपर सीओ के साथ दबंगई दिखाने का मामला भी दर्ज है।

बता दें कि साल 1989 में निर्दलीय विधायक चुने जाने के बाद अशोक 1993, 2008 में भी विधायक रहे। इसके बाद बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर साल 1999 में लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने थे। साल 2017 में मोदी लहर को देखते हुए अशोक चंदेल ने बीजेपी ज्वाइन कर ली। हालांकि उस दौरान बीजेपी सांसद एवं केंद्रीय मंत्री उमा भारती समेत कई बीजेपी नेताओं ने इनका विरोध किया था लेकिन यूपी संगठन में बैठे नेताओं के आगे उनकी एक नहीं चली थी।

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