असम को बीजेपी ने बनाया सियासी चौसर, मुसलमानों को ही बांटने का नया पैंतरा

केंद्र की मोदी सरकार ने असम को सियासी चौसर बना दिया है। असम से एक-एक घुसपैठिये को निकाल बाहर करने के ऐलान के साथ एनआरसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाली केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकारों ने ऐसा दांव खेला है, जिससे असम के बहुरंगी समाज में दरार पैदा हो सकती है।

फोटोः सोशल मीडिया
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दिनकर कुमार

संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर सरकार असम में क्या कर रही है और उसकी क्या योजना है, इसे समझने के लिए बिहार का रुख करना अच्छा होगा। बिहार में नीतीश कुमार ने दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए इसमें महादलित का एक वर्ग बनाया था, जिससे इसका सियासी फायदा उठाया जा सके। केंद्र की नरेंद्र मोदी और असम की सर्वानंद सोनोवाल सरकारें असम में कुछ ऐसा ही करने जा रही हैं।

एनआरसी के देशव्यापी विरोध में असम का उदाहरण दिया जाता है। वहां एनआरसी की प्रक्रिया में 19 लाख लोग इससे बाहर रह गए हैं। अब इन्हें साबित करना है कि वे वास्तव में भारत के नागरिक हैं। अनुमान है कि इसमें 5 लाख से ज्यादा हिंदू हैं। माना जाता है कि इन्हें सीएए के तहत नागरिकता दे दी जाएगी। मुसलमानों को चूंकि सीएए का फायदा मिलना नहीं है, इसलिए उन्हें अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा।

इस बीच सरकार ने अपना नया पैंतरा अपनाया है। वह मुसलमानों के बीच दरार डालकर इस आरोप से मुक्त होना चाहती है कि उसका यह कदम मुस्लिम-विरोधी है। सरकार कुछ जातियों के मुसलमानों को एनआरसी प्रक्रिया से बाहर करके अपने बचाव का रास्ता खोज रही है। इसी आधार परअसम में कुछ मुसलमान जातियों का सर्वेक्षण कराने की तैयारी की जा रही है। लेकिन यह फॉर्मूला कितना कारगर रहेगा, इस पर निगाह रखने की जरूरत है।

असम के अल्पसंख्यक कल्याण और विकास विभाग ने चार समुदायों की जनगणना करने की योजना की घोषणा की है, जिन्हें मोटे तौर पर 'असमिया मुसलमान' कहा जाता है। ये हैं गोरिया, मोरिया, देसी और जुलाह। इस सप्ताह इन समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक के बाद, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के मंत्री रंजीत दत्त ने कहा कि इससे इन समुदायों के विकास में मदद मिलेगी और 'गोरिया, मोरिया, देसी और जुलाह विकास निगम' की स्थापना भी की जाएगी।

पिछले वर्ष असम के बजट में समुदाय के ‘समग्र विकास’ के साथ-साथ ‘सामाजिक-आर्थिक जनगणना’ के लिए ‘स्वदेशी मुसलमानों के लिए विकास निगम’ की स्थापना का जिक्र भी था। 6 फरवरी, 2020 को अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने स्वदेशी मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक जनगणना के बारे में बैठक बुलाई। बैठक के बाद यह निर्णय लिया गया कि खिलोनजीया (स्वदेशी) शब्द विवादास्पद था और इसे चार विशिष्ट समुदायों के नामों से बदल दिया जाएगा।

बहरहाल, कौन से समुदाय स्थानीय हैं और कौन नहीं, इसके दस्तावेजी साक्ष्य बहुत कम हैं और परिभाषाएं अस्पष्ट, लेकिन समाज ने पारंपरिक रूप से गोरिया, मोरिया और देसी को स्वदेशी असमिया की परिभाषा के तहत रखा है। वैसे असम में मुसलमानों का इतिहास काफी पुराना है। इतिहास की प्रोफेसर और एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी में शांति अध्ययन पीठ की अध्यक्ष यास्मीन सैकिया कहती हैं कि मौखिक परंपराओं, सांस्कृतिक प्रथाओं और भाषाओं को ध्यान में रखते हुए बात की जाए तो कहा जा सकता है कि मुस्लिम कम से कम 600-700 साल पहले असम में बस गए थे। इस संभावना से भी इनकार नहीं कि मुस्लिम अहोम साम्राज्य से भी पहले से असम में रह रहे हों।

बख्तियारुद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद असम में 13वीं शताब्दी के शुरू में मुस्लिम बस्तियों के प्रमाण मिले हैं। अखिल असम गोरिया-मोरिया देसी परिषद के महासचिव अजीजुल रहमान कहते हैं कि जिसे हम अबगोरिया कहते हैं, उसकी जानकारी 13 वीं शताब्दी के अहोम राजाओं के समय भी मिलती है। कई मुस्लिम आक्रमणकारी सेनाओं के साथ आए और युद्ध में पकड़े गए। जब उन्हें रिहा किया गया, तो वे मुख्यधारा के समाज के साथ घुलमिल गए। इसलिए आज भी, उनकी अधिकांश सांस्कृतिक परंपराएं असमिया रीति-रिवाजों से मेल खाती हैं। एडवर्ड गैटने की “हिस्ट्री ऑफ असम” पुस्तक में गोरिया समाज के बारे में कहा गया है कि यह बंगाल के ही गौड़ इलाके में रहता था।

रहमान का कहना है कि मोरिया 1500 ईस्वी के आसपास असम आए। वे असाधारण रूप से दक्ष कारीगर थे, विशेष रूप से बेल मेटल के निर्माण कार्य में वे पारंगत थे। प्रो. सैकिया का मानना है कि जुलाह मुस्लिम 'बिहारऔर यूपी' के लोग थे, जो ब्रिटिश शासन के दौरान रेलवे विस्तार के साथ असम आए थे। प्रो. सैकिया कहते हैं, "जब तिनसुकिया और लिडो के लिए गाड़ियां आईं, तो तम्बू बनाने वाले, रस्सी बनाने वाले, बुनकर, मशीन ड्रिलर के रूप में जुलाह मुस्लिम आए।' हालांकि, मंत्री दत्त ने साफ किया है कि जनगणना केवल उन जुलाह लोगों की होगी जो 'चाय जनजाति के हैं और मुख्य रूप से गोलाघाट और जोरहाट में रहते हैं।'

गोरिया, मोरिया और जुलाह खास तौर पर ऊपरी और मध्य असम में बसे थे, जबकि देसी निचले असम से नाता रखते हैं, जो अविभाजित गोवालपारा जिला हुआ करता था। कहा जाता है कि उनके पूर्वजों को 13वीं शताब्दी की शुरुआत में कोच राजबंशी साम्राज्य के काल में धर्मांतरित किया गया था। पी बी कॉलेज, धुबरी में सहायक प्रोफेसर परवीन सुल्ताना का मानना है, “हम जानते हैं कि अली मेच नाम के एक आदिवासी सरदार ने इस्लाम अपनाया था। उनके अनुयायी भी धर्मांतरित हुए। ये लोग देसी भाषा बोलते हैं, जो कोच राजबंशी की भाषा से काफी मिलती-जुलती है, और इनकी आबादी लगभग 20 लाख है।” लेकिन समस्या यह है कि दस्तावेजी सबूतों की कमी के कारण कई असमिया मुस्लिमों के बारे में यह कहना मुश्किल होता है कि वे किस गुट से अपने नाते को प्रमाणित कर सकते हैं।

जनगणना के दायरे से मिया मुस्लिम समुदाय को अलग रखा गया है- जिसमें पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के प्रवासियों के वंशज शामिल हैं। 1826 में असम को ब्रिटिश भारत में शामिल किए जाने के बाद, अंग्रेजों ने 1850 के दशक से संयुक्त बंगाल प्रांत के प्रवासियों को असम में बसाया। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद से लगातार सीमा पार से लोग आए और दिक्कत यह है कि जो मुसलमान यहां अंग्रेजों के समय से ही रह रहे हैं, उन्हें भी अक्सर अवैध प्रवासी मान लिया जाता है। यह स्पष्ट नहीं है कि दक्षिणी असम की बराक घाटी के मुसलमानों के बारे में सरकार की क्या योजना है। इस क्षेत्र में अविभाजित बंगाल के सिलहट जिला (बांग्लादेश) का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। असम अल्पसंख्यक विकास बोर्ड के अध्यक्ष सैयद मुमिनुल ऐवल ने कहा कि मुस्लिमों के इन वर्गों पर आगे चर्चा की जानी है।

2011 की जनगणना के अनुसार, असम की 3.12 करोड़ जनसंख्या में मुसलमानों की तादाद एक तिहाई (34.22%) है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि मुसलमानों में सबसे बड़ा समूह मिया मुसलमान है। गुवाहाटी विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त सांख्यिकी प्रोफेसर अब्दुल मन्नान का कहना है, “प्रत्येक उप-समूह के संख्यात्मक आकार का अनुमान लगाने के लिए एक गहन अध्ययन की आवश्यकता है। ऐसा कोई सर्वेक्षण अभी तक नहीं किया गया है।”

इसे समझा भी जा सकता है, क्योंकि जनगणना के आंकड़ों से यह तो पता चल जाता है कि किस जिले में किस धर्म के कितने लोग हैं, लेकिन इनमें बांग्लाभाषी मुसलमान कितने हैं और असमिया भाषी कितने, इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। वैसे, खास तौर पर निचले असम में बांग्लाभाषी मुसलमानों की संख्या असमिया भाषी मुसलमानों की तुलना में अधिक है, इसे देखा-महसूस किया जा सकता है। ऐवल कहते हैं कि सर्वेक्षण के काम को आगे बढ़ाने के लिए इसके तौर-तरीकों पर जल्द ही विचार-विमर्श किया जाएगा। जहां तक गोरिया और मोरिया की बात है, उनकी सामाजिक पहचान उस भाषा से निर्धारित की जा सकती है जो वे बोलते हैं और जिन इलाकों में रहते हैं।

बहुतों को नहीं लगता कि यह संभव है। चरचापोरी साहित्य परिषद के अध्यक्ष हाफिज अहमद कहते हैं, “आप झूला समुदाय को ही लें। वे भी बुनकर हैं। लेकिन इनमें कुछ स्वदेशी हैं और कुछ प्रवासी; कुछ असमिया बोलते हैं तो कुछ बांग्ला। ऐसी स्थिति में आप उनकी गणना कैसे और किस खाने में करेंगे? ” वह अपनी बात भी करते हैं कि, 'पिछले आर्थिक सर्वेक्षणों में मैं अपने परिवार को झूला के रूप में सूचीबद्ध करता रहा हूं क्योंकि मेरे पूर्वज बुनकर थे, लेकिन मैं भी बांग्लाभाषी मिया समुदाय से ताल्लुक रखता हूं - इसलिए मैं इस जनगणना में कहां खड़ा हूं?'

सुल्ताना ने भी कहा: “उदाहरण के लिए देसी समुदाय एक धार्मिक-भाषाई समुदाय है। यह एक जातीय समुदाय नहीं है। धुबरी में अधिकांश मुस्लिम, जिनमें मिया समुदाय भी शामिल है, वे आपस में ज्यादातर देसी में ही बातचीत करते हैं। ऐसी स्थिति में आप उन्हें कैसे अलग करते हैं? इसके अलावा एक और स्थिति आती है जब दो समुदायों के बीच वैवाहिक संबंध बनते हैं। ऐसे विवाहों से जन्म लेने वाले बच्चों का क्या होगा? मान लीजिए कि एक वैसे मुस्लिम समुदाय जिसे देसी माना गया हो और किसी वैसे मुस्लिम समुदाय, जिसे विदेशी माना गया हो, के बीच वैवैहिक संबंध बनते हैं तो उस जोड़ी से होने वाले बच्चों को देसी माना जाएगा या विदेशी?

असम में लोगों की निगाहें 1985 के असम समझौते के अनुच्छेद 6 पर टिकी हैं, जो यह कहता हैः “असमिया लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा और संरक्षण के लिए जो भी संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक उपाय उपयुक्त हो सकते हैं, प्रदान किए जाएंगे।” केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त समिति रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही है जिसमें "असमिया लोगों" की परिभाषा को बदला जाएगा, लेकिन इससे कितनी स्पष्टता आएगी और कितनी दरार पैदा होगी, यह देखने की बात होगी। वैसे, ऐवल का मानना है कि "जनगणना से स्वदेशी असमिया मुसलमानों को न केवल अनुच्छेद 6 से लाभ होगा, बल्किअन्य योजनाओं में भी मदद मिलेगी।"

गोरिया-मोरिया देसी परिषद ने इसका स्वागत किया है। महासचिव रहमान का दावा है कि यह एक "पहचान संकट" को समाप्त करेगा। रहमान का मानना है कि इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि असम का आम मुसलमान जो यहां सैकड़ों साल से रह रहा है, उसकी पहचान का संकट खत्म होगा। आज ऐसे भी मुसलमान को बांग्लादेशी मान लिया जाता है, लेकिन तब यह बात साफ हो जाएगी कि कौन देसी और कौन विदेशी। लेकिन यहां भी बड़ा सवाल यही है कि पहचान का यह मसला कहीं सामाजिक ताने-बाने में दरार पैदा करने का कारण न बन जाए।

सुल्ताना ने कहा कि अगर जनगणना किसी समुदाय की संस्कृति को रिकॉर्ड करने और संरक्षित करने के इरादे से की जाती है, तो यह 'अच्छा हो सकता है।' उदाहरण के लिए, अनुसंधान, अनुदान आदि के माध्यम से समुदाय के बारे में जागरूकता बढ़ रही है, क्योंकि लोग देश के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। लेकिन उन्हें इसका इस्तेमाल एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ नहीं करना चाहिए। जबकि मोदी सरकार के इस फैसले से इस बात की आशंका तो है ही कि इससे मुसलमानों में ही एक ऐसा समुदाय तैयार होगा जो दूसरे के खिलाफ होगा।

प्रो. सैकिया भी मोदी सरकार के इस कदम को लेकर संशकित हैं। वह कहते हैं कि तात्कालिक रूप से लोग सोच सकते हैं कि यह एक अच्छा विचार है और देसी मुसलमानों के लिए पहचान का संकट खत्म हो जाएगा, लेकिन लंबे समय में इसका परिणाम नकारात्मक ही होगा। उनका मानना है कि 'एक ऐसे समुदाय के लिए जिसने खुद को असम का मुसलमान माना है, उसे छोटे-छोटे समुदायों में बांट देने से लोगों के मन में असुरक्षा की भावना भी पैदा होगी।'

हाफिज अहमद कहते हैं कि सरकार का यह कदम मिया समुदाय की पीठ दीवार से लगा देने जैसा है। वह कहते हैं, 'बांग्लाभाषी असमिया 19वीं शताब्दी से असम में रह रहा है। अगर सरकार का इरादा उसके विकास में सहायता करना है तो यह योजना उन बांग्लाभाषी मुस्लिमों के लिए क्यों नहीं है जो चरक्षेत्रों में रहते हैं?' जाहिर है, मोदी सरकार की योजना असम के मुसलमानों में दरार पैदाकर एनआरसी पर अपने स्टैंड को वाजिब ठहराने का है। लेकिन इस क्रम में वह समाज में दरार पैदा कर रही है जिसके आने वाले समय में खतरनाक परिणाम सामने आ सकते हैं।

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