नागररिकता कानूनः देश की छात्र-युवा शक्ति ही नाकाम करेगी इस विभेदकारी प्रयास को

दिल्ली के जामिया यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, लखनऊ के नदवा कॉलेज में जो कुछ कल से अब तक हुआ, उसमें एक विशेष प्रबंध दिखता है। छात्रों का यह स्वत: स्फूर्त आलोड़न बता रहा है कि ‘तानाशाही’ लंबे समय तक नहीं चलने वाली।

फोटोः सोशल मीडिया
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तसलीम खान

अब यह साबित हो चुका है कि संशोधित नागरिकता कानून से देश सहमत नहीं है। देश को समझ आ गया है कि इस कानून का मकसद वह नहीं जो सरकार दावा कर रही है। पूर्वोत्तर से उठीं विरोध की आवाज़ें अब देश भर में सुनाई दे रही हैं, और सबसे मुखर प्रतिरोध छात्र-युवा कर रहे हैं, जो केंद्र में स्थापित मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है।

असम, मेघालय और त्रिपुरा समेत पूरे पूर्वोत्तर में पहले से ही तनावपूर्ण हालात थे, लेकिन बीजेपी के अहंकार को यह दिखा ही नहीं, और अब साफ होता जा रहा है कि मोदी सरकार ने संशोधित नागरिकता कानून को लाने में गलती कर दी है। बंगाल पहले दिन से विरोध कर रहा है, और दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में भी छात्र अब सड़कों पर निकल रहे हैं।

ध्यान रहे कि बीजेपी ने पूर्वोत्तर में राजनीतिक जगह भले बना ली हो, लेकिन उसकी पहचान देश के इस हिस्से में हिंदू पार्टी की ही है। यही कारण है कि असम और पूर्वोत्तर में भाषायी, सांस्कृतिक आधार पर लोग एकजुट हो कर कर्फ्यू की परवाह न करते हुए सड़कों पर हैं और जान तक की बाजी लगा रहे हैं। बीजेपी ने शायद ही ऐसा सोचा हो कि सरकार के विरूद्ध इस तरह का आंदोलन असम में चले 80 के दशक के आंदोलन से प्रबल हो जाएगा। पूर्वोत्तर में बीजेपी की हिंदू-मुस्लिम विभाजन की विभेदकारी राजनीति पिटती दिख रही है।

दिल्ली के जामिया यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, लखनऊ में नदवा कॉलेज में जो कुछ भी कल से अब तक हुआ, उसमें एक विशेष प्रबंध नजर आता है। कौन जिम्मेदार है, कौन दोषी है, यह जांच का विषय है, लेकिन छात्रों का स्वत:स्फूर्त आलोड़न बता रहा है कि ‘तानाशाही’ लंबे समय तक नहीं चलने वाली। रविवार रात जामिया और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्रों पर पुलिसिया कहर की गूंज थमने से पहले ही दिल्ली में ही छात्रों का जमावड़ा पुलिस मुख्यालय पर हो गया था। मुंबई, हैदराबाद, भोपाल और अन्यत्र छात्र सड़कों पर निकल आए थे।

बात अमित शाह के गृह मंत्रालय की रणनीति के इतर जा पहुंची थी। सोशल मीडिया पर छाए पुलिस बर्बरता के वीडियो देख-सुनकर छात्र आक्रोशित थे। बात हाथ से निकल रही थी, जिस डिजायन के तहत जामिया, अलीगढ़, लखनऊ में पुलिस एक्शन कराया गया था, वह फेल हो चुका था, मजबूरी में रात में ही उन सभी छात्रों को छोड़ना पड़ा जिन्हें हिरासत में लिया गया था। यह छात्र-युवा शक्ति की जीत थी।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सही कहा है कि, “मोदी जी को पता होना चाहिए कि जब-जब देश की छात्र और युवा शक्ति जागी है, तो देश में बदलाव हुआ है। बीजेपी के अहंकार और पुलिस का युवाओं और छात्रों पर हमला मोदी सरकार के अंत की शुरुआत है।”

नागरिकता कानून को लेकर देश भर से उठ रहीं असहमति और विरोध की आवाजों को अब तक अनसुना करते रहे प्रधानमंत्री भी तब बोले जब बात हाथ से निकल गई। लोगों से शांति की अपील करते वक्त वह शायद भूल गए कि एक दिन पहले ही उन्होंने जनसभा में कहा था कि आग लगाने वालों के कपड़े देखकर पहचानो। किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री कम से कम ऐसे वक्तव्य नहीं देता।

स्थितियां बिगड़ चुकी हैं, ऐसे में शाही सलाह (गृह मंत्रालय की) भी राज्यों के लिए जारी हुई है। कहा गया है कि हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से तत्परता से निपटा जाए। साथ ही कहा गया है कि सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने वालों पर भी सख्ती हो। लेकिन इस सलाह को जारी करने से पहले शायद गृह मंत्रालय को याद नहीं रहा कि बीजेपी मीडिया सेल के प्रभारी और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता से लेकर तमाम बीजेपी नेता और कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर एक ऐसे वीडियो को प्रसारित करते रहे जिससे छेड़छाड़ की गई थी।

पूरा देश अब इस कानून के खिलाफ गोलबंद हो रहा है। विश्वविद्यालयों में आंदोलन हो रहा है। नागरिकता कानून के विरूद्ध 19 दिसम्बर 2019 को राष्ट्रव्यापी विरोध का आह्वान किया गया है और इस संघर्ष को तब तक जारी रखा जाएगा, जब तक कि कानून वापस नहीं हो जाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसका ऐलान कर चुकी हैं, यह कहते हुए कि चाहे तो उनकी सरकार बर्खास्त कर दी जाए लेकिन वह न तो नया नागरिकता कानून मानेंगी और न ही एनआरसी को लागू होने देंगी।

इस कानून का विरोध होना ही चाहिए क्योंकि इसके पीछे मंशा सही नहीं है। जैसा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है, “मोदी सरकार की मंशा साफ है, अस्थिरता और हिंसा का माहौल देश में फैलाओं, युवाओं के अधिकार छीनो, धार्मिक उन्माद पैदा करो और फिर उससे राजनीतिक रोटियां सेंको। और इस सबके सूत्रधार और कोई नहीं, खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह हैं।”

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