आम चुनाव से पहले देश के हर हिस्से में गहरे होने लगे हैं कट्टरता और उग्र राष्ट्रवाद के साए

वैचारिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के प्रति असहिष्णुता, धार्मिक कट्टरता और उग्र-राष्ट्रवादः आम चुनावों से पहले ये मुद्दे सुलगने लगे हैं। लेकिन आलोचना और विरोध को दबाना चुनावी हथकंडा है या कोई लंबी परियोजना?

फोटो : सोशल मीडिया
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डॉयचे वेले

भारत में दक्षिणपंथी कट्टरवाद अपनी उग्रता दिखाने में लगता है रोज नए उदाहरण पेश कर रहा है। विचार और अभिव्यक्ति की आजादी पर तो यह उग्रता खासी हमलावर है। महाराष्ट्र के साहित्य सम्मेलन के विवाद के बाद कर्नाटक के धारवाड़ में बीजेपी युवा मोर्चा ने हंगामा कर दिया। जानेमाने समाजशास्त्री और विचारक शिव विश्वनाथन के भाषण के विरोध में तोड़फोड़ की गई। प्रसिद्ध दलित चिंतक और बिग डैटा एनालिस्ट आनंद तेलतु्म्बड़े पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है।पिछले कुछ वर्ष भारत में सामाजिक-राजनीतिक तौर पर खासे इम्तहान, आक्रोश और सब्र के वर्ष रहे हैं।

आम जनता को त्रस्त करने के लिए महंगाई, फसल की गिरती कीमतें, पीने के पानी की किल्लत, भुखमरी, बीमा संकट, नोटबंदी, कर्ज जैसी आर्थिक दुश्वारियां और दहेज, हत्या, लूटपाट, बलात्कार, यौन उत्पीड़न जैसी सामाजिक बुराइयां ही मानो कम न थी कि कुछ नए किस्म के हथियारों से समाज को डराने के प्रकट-अप्रकट अभियान से छिड़ गए हैं।

अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ते हमले, लव-जेहाद और गो-रक्षा के नाम पर मुसलमानों पर जुल्म, दलितों पर अत्याचार, राजनीतिक विरोधियों की प्रताड़ना, अर्बन नक्सली कहकर सिविल सोसायटी के नुमाइंदों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों का दमन, देशद्रोह का ठप्पा लगाकर विरोध को दबाने मिटाने की कोशिशें देखकर लगता है कि कहीं देश में लोकतांत्रिक विचार डगमगाने तो नहीं लगा है, जिसकी दुहाई देते देते सत्तर साल गुजर गए।

पिछले दिनों धारवाड़ के एक साहित्य समागम में दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं के एक गुट ने हंगामा और तोड़फोड़ कर दी। जानेमाने समाज विज्ञानी शिव विश्वनाथन की कश्मीर में सुरक्षाबलों के रवैये को लेकर एक सख्त टिप्पणी से ये लोग नाराज बताए गए थे। विश्वनाथन को राष्ट्रविरोधी और सेना विरोधी बताते हुए, दोबारा न बुलाने की धमकी भी आयोजकों को दी गईं। पुलिस ने किसी तरह मामला शांत कराया।

इस घटना से कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के यवतमाल में भी ऐसे ही एक साहित्य सम्मेलन में प्रख्यात अंग्रेजी लेखिका नयनतारा सहगल को मुख्य अतिथि के तौर पर आने से रोक दिया गया। सहगल की अनुपस्थिति में श्रोतागण उनका मुखौटा पहने सम्मेलन में आए। सांकेतिक विरोध दर्ज कराने का यह अपनी तरह का एक पहला मामला था। इस तरह ‘भावनाओं से खिलवाड़' की आड़ में कट्टरपंथी, समूची रचनाधर्मिता को निशाना बनाने पर तुले हैं।

तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन के साथ भी यही हुआ था। उनकी किताब जलाई गई, उन्हें अपमानित किया गया, और प्रदर्शन किए गए. कोर्ट के जरूरी हस्तक्षेप के बाद ही मुरुगन लेखक के रूप में वापसी कर पाए, वरना वो कह चुके थे कि लेखक मुरुगन मर गया। कट्टरपंथ का बोलबाला संस्कृति के अन्य क्षेत्रों में दिखता रहा है। कहीं नाटक और फिल्म या कला प्रदर्शनी पर रोक की मांग होने लगती है तो विज्ञान कांग्रेस जैसे गंभीर सम्मेलनों में पोंगापंथियों के कुतर्क, आसमान को ढांपने की कोशिश करते हैं।

धार्मिक कट्टरवाद और अंधविश्वास के ये नजारे, खेती किसानी की समस्याओं और सामाजिक बुराइयों से निपटने की जगहों को भी दैवी प्रकोप बन कर घेर लेते हैं। इस कट्टरवादी ग्रंथि और उन्माद की प्रवृत्ति में थोड़ा गहराई से देखें तो पता चल सकता है कि ये दरअसल वर्चस्व की उस राजनीति का भी हिस्सा है जो आम जन को उसकी मौलिक लड़ाइयों, अधिकारों और जरूरतों से दूर करने के लिए सक्रिय रही है।

धर्म और राष्ट्र के नाम पर बरगला कर राजनीतिक स्वार्थ पूरे किए जाते हैं. चाहे वो मंदिर का मामला हो या गो-रक्षा का या अभिव्यक्ति का- अचानक उन्मादी और क्रोधी भीड़ प्रकट हो जाती है और तोड़फोड़ मचाकर, गालियां बरसाकर, लिंचिंग कर और भय और भयानकता का माहौल बनाती है और फिर गायब हो जाती है।

भारतीय संदर्भों में अगर देखा जाए तो सांप्रदायिक वैमनस्य, मानवाधिकारों पर हमला, धार्मिक कट्टरता और उग्र- राष्ट्रवाद के लक्षण चुनावों की समयावधि के आसपास ज्यादा सघन होने लगते हैं। वे जैसे मतदाता को प्रभावित करने और उस पर शिकंजा कसने की तैयारियां हैं। जयरस बानाजी जैसे विचारकों ने इसे ‘इलेक्टोरल फासिज्म' कहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या मतदाता या आम जन इतने निरीह और नासमझ होते हैं कि ऐसे वितंडा के चक्कर में फंस जाते हैं? क्या वास्तव में वे मीडिया की और मीडिया इतर एजेंडा सेटिंग के झांसे में आ जाते हैं?

ऊपरी तौर पर दिखता तो यही है कि जनता को बरगलाने में ये शक्तियां बड़ी हद तक कामयाब हो जाती हैं, लेकिन भारत की समकालीन राजनीति का इतिहास यह भी बताता है कि एक समय तक भ्रम और भय काम करते दिख सकते हैं, लेकिन दीर्घ अवधि में बुनियादी अधिकारों की लड़ाई ही निर्णायक साबित होती है। ठोस चुनावी मुद्दे वही हो सकते हैं जिनका संबंध जनता की तकलीफों के निराकरण से हो। और ये तकलीफ सड़क, बिजली, मकान, भोजन, पानी, रोजगार, स्वास्थ्य से जुड़ी है। तकलीफ इस बात की है कि देश की बहुसंख्यक आबादी गरीब और उत्पीड़ित है, जबकि एक हिस्सा अमीर और अमीर होता जा रहा है, मध्यवर्ग के लिए विकास की अलौकिकताएं बिछी हुई हैं, लेकिन गरीब मानो इस समूचे विकास मॉडल से खदेड़ा जाता हुआ दिखता है.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने पिछले दिनों प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण से मजाक में कहा था कि इतना भी नकारात्मक न हुआ कीजिए, सकारात्मक पहलू भी देखिए, दुनिया बेहतर दिखेगी. उन्होंने सही कहा, लेकिन विनम्रता से ये पूछा ही जा सकता है कि इन हालात में सकारात्मकता कैसे देखी जाए. हां ये जरूर संभव है कि सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखी जाए क्योंकि लोकतंत्र की हिफाजत में वही काम आएगी.

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