हिमाचल में भले ही बीजेपी जीती हो, लेकिन कांग्रेस अपना वोट प्रतिशत बरकरार रखने में सफल रही 

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में भले ही बीजेपी जीत गई हो, लेकिन सत्ता विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस अपना वोट प्रतिशत बचाने में सफल रही है।

फोटो: सोशल मीडिया
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राकेश लोहुमी

राजनीतिक रूप से परिपक्व हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं ने एक बार फिर राज्य में बदलाव के लिए मतदान किया है। राज्य में सत्ता विरोधी लहर के बीच बीजेपी के अलावा कांग्रेस को टक्कर देने के लिए कोई तीसरा मजबूत दल मौजूद नहीं था। राज्य में साल 1985 से अब तक कोई भी पार्टी 5 साल से ज्यादा सत्ता में नहीं रही है। हर पांच साल के बाद यहां सत्ता बदल जाती है। हिमाचल विकास कांग्रेस या हिमाचल लोकहित पार्टी की तरह कोई दूसरी पार्टी नहीं थी जो चुनाव के दौरान बीजेपी का जोरदार विरोध कर सके। और यही वजह रही कि जीएसटी जैसे तूफान में भी बीजेपी सत्ता हासिल करने में कामयाब रही है।

राज्य में बीजेपी सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में करने में बहुत हद तक सफल रही है। इस चुनाव में जीत के साथ ही बीजेपी का मतदान प्रतिशत 10.4 बढ़ गया है। राज्य में साल 2012 में हुए चुनाव में बीजेपी का मतदान प्रतिशत 38.47 था, जो इस बार बढ़कर 48.8 फीसदी हो गया है। वहीं इस बार के चुनाव में कांग्रेस का मतदान प्रतिशत घटा है। साल 2012 में हुए चुनाव में कांग्रेस का मतदान प्रतिशत 42.81 था जो अब घटकर 41.7 फीसदी हो गया है। इसके साथ ही कांग्रेस की सीटें भी घट गई हैं। 68 सीट वाली विधानसभा में कांग्रेस की सीट साल 2012 के 37 के मुकाबले घटकर 21 रह गई हैं। इस तरह कांग्रेस को एक फीसदी वोट शोयर के नुकसान पर 16 सीटें गंवानी पड़ी है, क्योंकि सत्ता विरोधी लहर में मतों का कोई बंटावारा नहीं हुआ।

हिमाचल लोक हित पार्टी के महेश्वर सिंह और कांग्रेस के सुखराम सिंह और उनके बेटे अनिल सिंह को पार्टी में शामिल करना बीजेपी की सोची-समझी रणनीति थी। लेकिन बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ने वाले महेश्वर सिंह अपनी परंपरागत कुल्ली सीट से हार गए। वहीं मंडी विधानसभा सीट से अनिल शर्मा सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में करने में सफल रहे। राज्य में जीत के साथ ही बीजेपी अब तक का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत हासिल करने में सफल रही है। पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार दो मुख्य पार्टियों का संयुक्त मतदान प्रतिशत 81.28 फीसदी से बढ़कर 90.5 प्रतिशत हो गया है। राज्य में अच्छी रणनीति और संगठित चुनाव प्रचार करने में अगर कांग्रेस सफल रहती तो नतीजे उसके हक में और बेहतर हो सकते थे। यह चुनाव बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के कुछ वरिष्ठ नेताओं के लिए बुरे सपने की तरह रहा। कई वरिष्ठ नेताओं को चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है।

राज्य में बीजेपी भले ही चुनावी जंग जीतने में कामयाब रही हो, लेकिन उसे उसके मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल और पार्टी अध्यक्ष सतपाल सत्ती की हार की वजह से भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। सिर्फ प्रेम कुमार धूमल ही नहीं, उनके कई करीबी नेताओं को भी हार का सामना करना पड़ा है, जिनमें धूमल के समधी गुलाब सिंह, रविंद्र रवि, महेश्वर सिंह और रणधीर शर्मा शामिल हैं। चुनाव प्रचार के दौरान प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना बीजेपी के लिए फायदेमंद नहीं रहा। राज्य में पार्टी के कार्यकर्ता नेतृत्व परिवर्तन चाहते थे, बीजेपी आलाकमान ने शुरूआत में ये फैसला भी किया था कि वे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा के बिना चुनाव में उतरेगी। लेकिन अचानक चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी ने धूमल को बतौर मुख्यमंत्री प्रत्याशी जनता के सामने पेश कर दिया।

चुनाव में भले ही कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन ना किया हो, लेकिन उसके बड़े नेताओं ने अच्छा प्रदर्शन किया। चुनाव में एक बार फिर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने एक जननेता रूप में खुद को साबित किया और जीत हासिल की। उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद उनके समर्थकों ने उनका साथ नहीं छोड़ा। वीर भद्र सिंह ने सिर्फ अपनी ही सीट नहीं जीती बल्कि अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को भी जीत दिलवाई। उन्होंने बेटे विक्रमादित्य सिंह के लिए अपनी शिमला देहात की सीट छोड़कर अर्की विधानसभा से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। अपनी परंपरागत सीट रोहडू के अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो जाने के बाद साल 2012 में उन्होंने शिमला देहात से चुनाव लड़ा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति का उन्होंने अकेले सामना किया। वे अकेले अपने दम पर राज्य में चुनाव लड़े। इतना ही नहीं वीरभद्र सिंह और उनके समर्थकों ने रोहडू और रामपुर में पार्टी के प्रत्याशियों को चुनाव जीतने में मदद भी की।

राज्य में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खु ने भी अपना चुनाव जीत लिया है। वहीं वीरभद्र सिंह के ज्यादातर विरोधी अपना चुनाव हार गए हैं, जिनमें स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर और परिवहन मंत्री जीएस बाली शामिल हैं। चुनाव में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को भी हार का सामना करना पड़ा है, इनमें वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी, शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा, मंत्री प्रकाश चौधरी जैसे दिग्गज शामिल हैं। हालांकि कृषि मंत्री सुजान सिंह पठानिया, मंत्री धनीराम शांडिल और उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने सत्ता विरोधी लहर में भी अपना परचम लहराया और अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे।

Published: 20 Dec 2017, 7:04 PM
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