कांग्रेस ने IDBI बिक्री प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठाए सवाल, जयराम बोले- फेयरफैक्स की बोली खुलने वाले दिन ही...
जयराम रमेश ने सवाल किया कि सरकार के अपने पहले के न्यूनतम मूल्य के मुकाबले करीब 8,800 करोड़ रुपये कम मूल्य पर बैंक की बिक्री की स्थिति क्यों बनी और यह निर्णय किसके कहने पर लिया गया।

कांग्रेस ने आईडीबीआई बैंक की प्रस्तावित बिक्री की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर शनिवार को सवाल उठाते हुए सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि बैंक के शेयर का न्यूनतम मूल्य कथित तौर पर कम करने का फैसला किन परिस्थितियों और नियमों के तहत किया गया।
जयराम रमेश ने IDBI को लेकर क्या दावा किया?
पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में दावा किया कि आईडीबीआई के शेयर की न्यूनतम कीमत पहले 94.42 रुपये तय की गई थी, जिसे बाद में घटाकर 75.99 रुपये कर दिया गया।
उन्होंने सवाल किया कि सरकार के अपने पहले के न्यूनतम मूल्य के मुकाबले करीब 8,800 करोड़ रुपये कम मूल्य पर बैंक की बिक्री की स्थिति क्यों बनी और यह निर्णय किसके कहने पर लिया गया।
रमेश ने यह सवाल भी उठाया कि फेयरफैक्स की बोली खुलने वाले दिन ही न्यूनतम कीमत में बदलाव क्यों किया गया और इसके लिए किन नियमों का पालन किया गया। उन्होंने पूछा कि नयी कीमत तय करने वाले लोगों को क्या फेयरफैक्स की बोली की जानकारी पहले से थी।
कांग्रेस नेता ने भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के स्वतंत्र निदेशक गुरुमूर्ति महालिंगम की भूमिका को लेकर भी संभावित हितों के टकराव का सवाल उठाया।
उन्होंने ‘बिजनेसवर्ल्ड’ की खबरों का हवाला देते हुए दावा किया कि महालिंगम करीब सात महीने तक एलआईसी और फेयरफैक्स नियंत्रित थॉमस कुक इंडिया, दोनों के बोर्ड में रहे तथा वह एलआईसी की निवेश समिति के सदस्य भी थे।
रमेश ने कहा कि इसी अवधि में एलआईसी ने आईडीबीआई में अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी और फेयरफैक्स बैंक के लिए बोली लगाने वालों में शामिल थी।
उन्होंने सरकार से यह भी पूछा कि आईडीबीआई की बिक्री प्रक्रिया शुरू होने के बाद फेयरफैक्स समूह की कंपनियों में कथित तौर पर 10 पूर्व सरकारी एवं नियामक अधिकारियों की नियुक्ति की क्या जांच कराई गई।
'असली मुद्दा बड़े सरकारी सौदों में पारदर्शिता की'
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि मुद्दा केवल आईडीबीआई की बिक्री का नहीं, बल्कि बड़े सरकारी सौदों में पारदर्शिता, नियामक एवं सार्वजनिक संस्थानों की स्वतंत्रता तथा संभावित हितों के टकराव से निपटने की व्यवस्था का भी है।
उन्होंने सवाल किया कि मूल्यांकन, सलाहकारों की नियुक्ति और निर्णय प्रक्रिया का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाता है या नहीं तथा ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर सरकार संसद के प्रति अपनी जवाबदेही किस तरह सुनिश्चित करती है।
पीटीआई के इनपुट के साथ
