15 ट्रक फूलों से सजाने के लिए पुरी के जगन्नाथ मंदिर में ठोक दी गईं बेशुमार कीलें, भारतीय पुरातत्व विभाग ने जताई आपत्ति

इस बार रथ यात्रा के अवसर पर विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर में फूलों की सजावट को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ। इस बार सजावट के लिए बारहवीं शताब्दी के इस मंदिर में कई जगहों पर कीलें ठोकी गयीं थीं जिस पर भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकारीयों ने आपत्ति जताई है।

फोटो: सोशल मीडिया
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आशुतोष मिश्रा

इस बार रथ यात्रा के अवसर पर विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर में फूलों की सजावट को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ। इस बार सजावट के लिए बारहवीं शताब्दी के इस मंदिर में कई जगहों पर कीलें ठोकी गयीं थीं जिस पर भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकारीयों ने आपत्ति जताई है। विभाग पर मंदिर के रख रखाव की जिम्मेदारी है लेकिन न तो सजावट करने वालों ने न ही मंदिर प्रशासन ने इसके लिए पुरातत्व अधिकारियों की अनुमति ली थी ।

सूत्रों के मुताबिक दिल्ली के एक व्यापारी के के शर्मा ने 15 ट्रक फूलों से मंदिर के सिंहद्वार, नाट्य मंडप, भोग मंडप और अन्य कुछ जगहों पर सजावट करवाई थी । इसमें केले, सेब और संतरे जैसे फलों का भी प्रयोग हुआ था। इस काम में शर्मा ने 200 लोगों को लगाया था। इन लोगों ने जगह-जहाज पर चढ़ कर कीलें ठोकी और फूलों की मालाएं लटकाई थीं। सजावट करने वालों को मंदिर के पुराने और कमजोर होने के विषय में विशेष कुछ मालूम नहीं था और मंदिर प्रशासन ने भी उनके काम पर नजर रखने की कोई कोशिश नहीं की।


भारतीय पुरातत्व विभाग, भुवनेश्वर सर्किल के अधीक्षण पुरातत्व अधिकारी अरुण मलिक के अनुसार उनके विभाग का मंदिर में ऐसी सजावट से कुछ भी लेना देना नहीं है। उनकी जिम्मेदारी मंदिर के ढांचे को सुरक्षित रखने की है। उनके अनुसार अगर कीलें ठोकी गयी हैं तो इससे मंदिर के ढांचे को नुकसान होने की संभावना है, लेकिन कैसा और कितना नुकसान हुआ है यह फूल निकले जाने के बाद ही पता चलेगा।

दूसरी ओर मंदिर के मुख्य प्रशासक पी के महापात्र ने इसे एक मामूली मसला बताते हुए कहा है कि जगन्नाथ मंदिर एक बहुत बड़ा ढांचा है और इसमें ऐसी सजावट से कोई क्षति होने की सम्भावना नहीं है। मंदिर के जनसम्पर्क अधिकारी लक्ष्मीधर पूजापांडा ने कहा की भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस मामले में अब तक मंदिर प्रशासन से कोई शिकायत नहीं की है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक मलिक ने इस विषय में अपने विभाग के डायरेक्टर जनरल को पत्र लिखा है और उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया है।

विश्व के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिन्दू मंदिरों में गिने जाने वाले जगन्नाथ मंदिर का ढांचा निरंतर कमजोर होता जा रहा है। मंदिर में विभिन्न स्थानों से पत्थर गिरने की कई घटनाएं हो चुकी हैं। मंदिर की स्थिति पर ओडिशा सरकार ने भी कई बार चिंता व्यक्त की है। भारतीय पुरातत्व विभाग फिलहाल इसके ढांचे की मरम्मत में लगा है।


इसके पहले मंदिर के गर्भगृह और जगमोहन (बीच के हिस्से) में कमजोरियां पायी गयी थीं। गर्भगृह में मरम्मत का कुछ काम हुआ है, लेकिन दूसरे कई हिस्सों की मरम्मत बाकी है । इस बीच मंदिर के पुजारियों और सेवकों को कस्तूरी के लगातार घटते हुए स्टॉक की चिंता खा रही है । कस्तूरी का प्रयोग लकड़ी से बनी प्रभु जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र तथा देवी सुभद्रा के मुख श्रृंगार के लिए किया जाता है । इसके प्रयोग का दूसरा लाभ यह है की इससे प्रतिमाओं में कीड़े नहीं लगते। लेकिन मंदिर में कस्तूरी का स्टॉक लगातार घटना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक बची हुई कस्तूरी सिर्फ दो से तीन साल तक चलेगी। कमी की वजह से अब इसका प्रयोग प्रतिमाओं के मुख श्रृंगार में रथ यात्रा जैसे विशेष आयोजनों में ही किया जाता है। मंदिर को कस्तूरी मुख्यतः नेपाल से मिलती थी जहां के राजपरिवार का मंदिर में पूजा का विशेष अधिकार है। लेकिन अब नेपाल सरकार ने भी कस्तूरी मृग को मारने पर रोक लगा दी है।

भूतपूर्व नेपाल नरेश वीरेंद्र ने 1996 और 1999 में जगन्नाथ मंदिर को काफी कस्तूरी दी थी। लेकिन नेपाल में 2001 में हुए शाही हत्याकांड में वीरेंद्र के मारे जाने के बाद से मंदिर को इस पडोसी देश से कस्तूरी की सप्लाई बंद है। सूत्रों के मुताबिक थोड़ी सी कस्तूरी 2007 में एक नागा साधु ने दान की थी लेकिन उसके बाद कुछ भी नहीं मिला है । मंदिर के वरिष्ठ सेवायत रामचंद्र दस मोहपात्रा के अनुसार चंदन के साथ प्रतिमाओं पर कस्तूरी का लेप करने से न सिर्फ उनमे एक विशेष चमक आ जाती है बल्कि इससे उनसे कीड़े मकोड़े भी दूर रहते हैं । वे कहते हैं, " ये प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से बनती है लेकिन फिर भी समय के साथ उनमें कीड़े लगने की सम्भावना रहती है । ऐसे में कस्तूरी का प्रयोग लाभकारी है।"

सूत्रों के मुताबिक मंदिर की तरफ से नेपाल से दर्शन के लिए आने वाले विशिष्ट अतिथियों को बार बार कस्तूरी की सप्लाई दोबारा शुरू करने के लिए अनुरोध किया जाता है लेकिन यह अब तक संभव नहीं हो पाया है ।

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