कश्मीर की महिला फोटो पत्रकार को ‘मुखबिर’ बताकर ऑनलाइन किया जा रहा है बदनाम

मसरत जहरा ने ऑनलाइन अभियान को शर्मनाक बताया है

फोटो पत्रकार मसरत जहरा के समर्थन में बुधवार को सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग आगे आए, लेकिन इसके बावजूद अभी भी सोशल मीडिया पर कई लोग ऐसे हैं जो उन्हें बदनाम और परेशान कर रहे हैं।

मसरत जहरा आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच होने वाली भीषण मुठभेड़ों के दौरान घटनास्थल पर फोटो खींचती रही हैं। वह श्रीनगर की सड़कों पर पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों और आंदोलनकारियों के बीच हिंसक झड़पों को भी कवर करती रही हैं। लेकिन, संघर्ष क्षेत्र में अपनी ड्यूटी निभाने में तमाम चुनौतियों का बहादुरी से सामना करने के बावजूद यह फोटो पत्रकार अपने खिलाफ ऑनलाइन चलाए जा रहे बदनामी के अभियान का सामना कर पाने में मुश्किलों का सामना कर रही है।

खुद के खिलाफ चलाए जा रहे इस साइबर अभियान पर बुधवार  को प्रतिक्रिया देते हुए मसरत ने इसे शर्मनाक और निराशाजनक बताया। ‘राइजिंग कश्मीर’ और ‘द क्विंट’ के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम करने वाली मसरत ने अपने फेसबुक पर लिखा, “पिछली रात मैंने एक मुठभेड़ स्थल से अपनी एक तस्वीर डाली और कुछ ही देर में लोगों ने उस फोटो के कैप्शन में मुखबिर लिखकर अपने पेज और वाल पर शेयर कर दिया। यह सच में हैरान करने वाला है। उस दिन मैं गंभीर रूप से घायल थी और मेरे पैर और कंधे में गहरी चोट लगी थी, इसके बावजूद मैंने अपना काम किया और टूटे हाथ से तस्वीरें खींची। यहां तक कि मेरा ट्राउजर भी फटा हुआ था और अब इस घटना को डेढ़ महीने होने को आ रहे हैं और मैं अब तक इससे नहीं उबर पा रही हूं। और ईमानदारी से कहूं तो मेरे माता-पिता अब नहीं चाहते हैं कि मैं इस क्षेत्र में रहूं”

विवाद का कारण बनी तस्वीर में मसरत एक मुठभेड़ स्थल के पास सैनिकों की तस्वीर लेने के लिए तैयार हो रही हैं। ‘दुश्मन’ सैनिकों के साथ देखे जाने की वजह से लोग सोशल मीडिया पर उन्हें जासूस और गद्दार बताते हुए उनकी तस्वीर साझा कर रहे हैं।

मसरत के कई वरिष्ठ सहयोगियों ने उनके साथ एकजुटता दिखाते हुए ऐसी घटिया सोच वाले लोगों को बुरी तरह फटकार लगायी है। वरिष्ठ पत्रकार और ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी ने फेसबुक पर लिखा, “हमारी युवा फोटो पत्रकार मसरत जहरा जिस कटु अनुभव से गुजर रही हैं, उस पर फेसबुक पर कुछ दोस्त (वे सिर्फ फेसबुक के दोस्त साबित हुए) जो चिंता जाहिर कर रहे हैं, उन्हें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि वे लोग भी ऐसे तत्वों के द्वारा की जाने वाली इस तरह की फतवेबाजी के लिए जिम्मेदार हैं। इनमें से कुछ लोग फर्जी खातों की आड़ लिए बैठे हैं, लेकिन एक दिन उनका भंडाफोड़ हो जाएगा और उन्हें खुदा के क्रोध का सामना करना होगा। कृपया अब आंसू ना बहाएं। कोई भी देख सकता है कि आप किस तरह ऐसे पागलों को बढ़ावा देते रहे हैं। लेकिन मैं मसरत ज़हरा के साथ खड़ा हूं और सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे इस दुर्भावनापूर्ण अभियान की निंदा करता हूं।”

इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए इश्तेयाक डार नाम के एक फेसबुक यूजर ने लिखा, “युद्ध के मैदान में इस तरह की घटनाएं देशभक्ति या इसके विपरीत कारणों की वजह से होती हैं।”

उभर रही फोटो पत्रकार मसरत जहरा को मुखबीर बताते हुए उन्हें ऑनलाइन बदनाम करने की घटना कोई नई बात नहीं है। यह हमारे समाज के बीमार होने का पुराना संकेत है जिसने इस काम के बारे में कपोल कथाओं को प्रश्रय दिया और उसका इस्तेमाल किया और नामकरण और मुखबीर नामों का सहारा लिया है क्योंकि ऐसा करना बहुत आसान है। मसरत का मुखबीर कहना उसी मानसिकता की पैदाइश है जो इस फोटो पत्रकार को शोक और प्रदर्शनकारी महिलाओं की तस्वीरें लेने से रोकने की धमकी देता है। ‘वैंडे’ पत्रिका के संपादक इरफान मेहराज ने कहा, "तथ्य यह है कि मसरत एक महिला है जो उस पर हमला करने को आसान बनाता है और कहीं न कहीं हमारे समाज द्वारा स्वीकृत भी हो जाता है।"

एक अन्य पत्रकार मजीद मकबूल ने लिखा "यह चौंकाने वाला, पूरी तरह से घृणास्पद और खतरनाक है। इस तरह की घटना मसारत जैसी युवा और उम्मीदों से भरी फोटो पत्रकार (ऐसे लोग बहुत ज्यादा नहीं हैं) के लिए निराशाजनक हो सकता है, जो यहां कठिन परिस्थितियों में अपना काम करने की कोशिश कर रही हैं। कृपया ऐसे फेसबुक पेज, अकाउंट को रिपोर्ट करें, ब्लॉक करें। मैंने हाल के दिनों में भी देखा है कि कई बार अपना काम ईमानदारी और लगन से करने वाले हमारे मेहनती, बहादुर और शानदार युवा फोटो पत्रकारों को किस तरह मारा जाता है, धक्का दिया जाता है और लोगों द्वारा शक की निगाह से देखा जाता है। इसे रोकने की जरूरत है।"

मसरत को मिल रहे जबरदस्त समर्थन के बावजूद, ऐसे ऑनलाइन यूजर भी हैं जो अभी भी उनके साथ सहानुभूति दिखाते हुए उन्हें यह कहते हुए कि यह क्षेत्र मजबूत पुरुषों के लिए है, अपने पेशे को बदलने की सलाह दे रहे हैं।

सैयद बासित मसूदी लिखते हैं, "लड़िकयों के लिए तय क्षेत्र में होना बेहतर है, अपने आपको जोखिम में क्यों डालना है... क्या यह लैंगिक समानता की पश्चिमी परिभाषा नहीं है जिसका आप अनुसरण कर रही हैं, अपने धर्म का पालन करें, आप कभी भी अपनी गरिमा नहीं खोएंगी।"

दूसरे लोग उन्हें इसलाम का सख्ती से पालन करने की सलाह देते हुए उनके महिला होने पर हमला कर रहे हैं। हमजा हिजबी ने लिका, "घर पर रहें, यह आपका काम नहीं है। हजरत फातिमा की तरह बनने की कोशिश करें। इस्लाम आपको यह काम करने की इजाजत नहीं देता है।"

लेकिन यह पहली बार नहीं है कि जब एक महिलाकर्मी का ऑनलाइन अपमान किया जा रहा है और डराया जा रहा है। कुछ दिनों पहले नेशनल हेराल्ड को दिए एक साक्षात्कार में कश्मीर घाटी की जुड़वां बहन गायिका उज्मा अहमद और बुशरा अहमद ने भी अपने काम, अपने जुनून के लिए लैंगिक संबंधी धमकियां मिलने की शिकायत की थी।

इश्तियाक बहनों के फेसबुक पेज पर आयीं टिप्पणियां और यूट्यूब वीडियो साइबर उत्पीड़न के बारे में उनकी शिकायतों की पुष्टि करते हैं। धमकियों के अलावा ज्यादातर टिप्पणी करने वाले उन्हें गालियां देते हैं या उनका मजाक उड़ाते हैं। अफसोस की बात है कि, कश्मीर के लोगों की ऐसी टिप्पणियों बहुत कम दिखायी देती हैं, जिसमें उनके काम की प्रशंसा की गई हो या उन्हें वह काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता हो जो वह करना पसंद करती हैं, यानी गाना।

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