एक्सक्लूसिव: राम मंदिर निर्माण के नाम पर विहिप अयोध्या में चला रही शोषण की कार्यशाला

आज बाबरी मस्जिद गिराए जाने की 26 वीं सालगिरह है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है। अभी हाल में हम उस कार्यशाला में पहुंचे जिसे मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या में स्थापित किया गया था। इस दौरान हमारे सामने आई कार्यशाला में काम करने वाले प्रमुख कारीगर के शोषण की दास्तां। 

By विश्वदीपक

पिछले महीने यानी नवंबर महीने की 25 तारीख को अयोध्या में होने वाली विश्व हिंदू परिषद धर्मसभा से एक दिन पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कैमरे और प्रिंट पत्रकारों के झुंड रामसेवकपुरम के नाम से मशहूर वीएचपी की कार्यशाला में अपने-अपने लिए कहानियां तलाश रहे थे। अयोध्या में विवादित परिसर के नजदीक मौजूद रामसेवकपुरम वो जगह है, जहां राम मंदिर के लिए पत्थरों को तराशने का काम पिछले 26 सालों से जारी है।

दोपहर के वक्त जब सूरज ठीक सिर के ऊपर था, हल्की सर्दी के बीच कार्यशाला के अदंर ही लगाए गए एबीपी न्यूज चैनल के सेट पर मौजूद वक्ता, प्रवक्ता और एंकर राम मंदिर के मुद्दे पर गर्मागरम बहस में डूबे हुए थे।

उसी के सामानांतर, सैकड़ों की तादाद में महाराष्ट्र से भाड़े पर लाए गए शिवसैनिक भी कार्यशाला में पसरे विशाल पत्थरों के बीच मोबाइल से अपनी तस्वीरें खींचने में मशगूल थे। दरअसल, राम मंदिर के नाम पर हिंसा के लिए उतारू शिवसैनिक, शाम को चार बजे शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के कार्यक्रम में शामिल होने आए थे।

फोटो : विश्वदीपक
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कार्यशाला में पत्थरों के साथ फोटो खिंचवाता महाराष्ट्रसे आया एक शिवसैनिक

हर तरफ “जय श्री राम” के नारे गूंज रहे थे। ऐसा लग रहा था कि शिवसैनिकों के उत्साह, न्यूज़ चैनलों के उत्तेजक शोर-शराबे और पत्रकारों की खोजी निगाहों के बीच राम मंदिर का निर्माण बस कुछ ही मिनटों में शुरु हो जाएगा।

लेकिन हैरानी की बात थी कि 24 नवंबर की उस दोपहर, अयोध्या के हर गली कूचे की खाक छानने वाले न्यूज़ चैनलों ने उस शख्स को नहीं देखा जो चुपचाप सिर झुकाए लाल पत्थर के एक विशाल खंभे पर फूल जैसी कोई आकृति उकेर रहा था।

हथौड़े और छेनी से बेहद कठोर पत्थर को सेंटीमीटर दर सेंटीमीटर काटने वाले उस शख्स का नाम है, रजनीकांत सोमपुरा। उनकी उम्र है 53 साल। सोमपुरा विश्व हिंदू परिषद की कल्पना के मुताबिक अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर में लगने वाले खंभे को तराशने का काम कर रहे थे।

राजस्थान के धौलपुर से मंगाए गए पत्थर पर छेनी रखकर, सोमपुरा हथौड़े से वार करते और उसके बाद फूंक मारकर पत्थर टूटने से पैदा हुई धूल को भी उड़ाते। इस तरह वो एक साथ दो काम कर रहे थे। हालांकि बार-बार फूंक मारने की वजह से उनकी सांस कमजोर हो चली है, लेकिन फिर भी उनकी लगन कम नहीं हुई है। घंटों की मेहनत के बाद, सोमपुरा भविष्य के राम मंदिर में लगने वाले खंभे पर एक छोटे से फूल की पंखुड़ी बनाने में कामयाब हो गए।

कार्यशाला में राम मंदिर का जो मॉडल रखा है उसके मुताबिक दो मंजिल वाला राम मंदिर कुल 212 खंभों पर टिका होगा। इनमें से हर मंजिल पर 106 खंभों का इस्तेमाल किया जाएगा। इस दौरान मैंने देखा कि पत्थर तराशते-तराशते सोमपुरा के हाथ भी पत्थर जैसे कठोर हो चुके हैं। हां, उनकी आंखें सजहता और उत्सुकता से भरी हुई थीं।

फोटो : विश्वदीपक
फोटो : विश्वदीपक
कार्यशाला में रखा प्रस्तावित राम मंदिर का मॉडल

जब मैंने उनसे पूछा कि क्या आपको पता है पत्थर काटने से निकलने वाली धूल बेहद खतरनाक होती है, इससे टीबी हो सकता है? सकुचाते हुए सोमपुरा ने जवाब दिया- “हां, हमें सब पता है, लेकिन करें क्या?”

गुजरात के सुरेन्द्रनगर जिले के रहने वाले सोमपुरा पिछले पांच सालों से ऐसे ही हर दिन आठ घंटे से ज्यादा इस कार्यशाला में भविष्य में बनने वाले राम मंदिर के लिए पत्थर तराश रहे हैं। ये बात अलग है कि राम मंदिर कब बनेगा कोई नहीं जानता।

90 के दशक में वीएचपी के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल ने इस कार्यशाला की स्थापना की थी। उस वक्त वीएचपी नेताओं ने लोगों से राम मंदिर के लिए ईंटें दान करने की अपील की थी। हजारों ईंटे आज भी कार्यशाला के एक कोने में रखी हुई हैं, जिनमें अलग-अलग भाषाओं में “जय श्री राम” लिखा हुआ है। जानकार बताते हैं कि एक दौर में इस कार्यशाला में एक साथ करीब 150 कारीगर काम करते थे, लेकिन वक्त के साथ जैसे ही राम मंदिर आंदोलन की आंच ठंडी हुई, कारीगर भी कम होते चले गए। अब पत्थर तराशने के लिए बचे हैं सिर्फ रजनीकांत सोमपुरा।

राम मंदिर के नाम पर हजारों करोड़ का चंदा इकट्टा करने वाली विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने वाले सोमपुरा को जोखिम भरे और थकाऊ काम के बदले में हर दिन के हिसाब से मात्र 400 रुपये का भुगतान करती है। अगर सोमपुरा ने किसी दिन काम नहीं किया, तो उस दिन की मजदूरी नहीं मिलती। सोमपुरा की हैसियत उस अकुशल मजदूर जैसी है जो राम मंदिर निर्माण के महान कार्य में अपनी जिंदगी हवन कर रहा है।

फोटोः विश्वदीपक
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सोमपुरा के मुताबिक जान लगाकर काम करने के बाद भी बमुश्किल महीने में 11-12 हजार बनते हैं, जिससे उनके परिवार की जरूरतें तक पूरी नहीं होतीं।

सोमपुरा के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो बेटियां भी हैं, जो अयोध्या के ही एक सरकारी स्कूल में 10 वीं और 12वीं कक्षा में पढ़ती हैं। महंगाई और आर्थिक दबाव में जी रहे सोमपुरा के लिए राहत की थोड़ी बात ये है कि उन्हें कमरे का किराया नहीं देना पड़ता। वीएचपी ने सोमपुरा परिवार के रहने के लिए कार्यशाला परिसर में ही दो 2 कमरे का इंतजाम किया है। बेहद मामूली दिखने वाले इन दो कमरों में से एक को सोमपुरा परिवार खाना बनाने के लिए इस्तेमाल करता है, जबकि दूसरे कमरे को सोने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। दो छोटे-छोटे कमरों में वयस्क हो रही दो बेटियों के साथ जिंदगी बसर करने की कला, राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने से कम नहीं!

जब मैंने सोमपुरा से ये पूछा कि कभी शिकायत नहीं होती? जितना महीन और मेहनत का काम आप करते हैं, उस हिसाब से तो पैसा बहुत कम है? एक फीकी मुस्कान के साथ उन्होंने जवाब दिया, “ज्यादा पूछताछ मत कीजिए वर्ना मन और भी दुखी हो जाएगा।” जाहिर है, सोमपुरा के मन में ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिसे वह साझा नहीं करना चाहते।

वैसे तो विश्व हिंदू परिषद ने कार्यशाला में रामराज का एक छोटा सा मॉडल तैयार किया है, लेकिन इस मंदिर में भी उनके इस दुख को सुनने वाला कोई नहीं। राममंदिर बनना चाहिए या नहीं इस बारे में पूछने पर सोमपुरा ने कहा कि जल्दी बन जाए तो समस्या खत्म हो। प्रतीत होता है पत्थर तराशते-तराशते उनकी भावनाएं भी पत्थर जैसी हो चुकी हैं।

सोमपुरा के गुजरात से अयोध्या आने की कहानी भी एक संयोग ही है। पत्थर तराशने का काम पुश्तैनी है, जिसे सोमपुरा ने अपने बाप-दादा से सीखा था। किसी ज़माने में - राम मंदिर बन जाए, ऐसी तमन्ना भी हुआ करती थी, लेकिन अब वो दौर बीत चुका है। घर से हज़ारों किलोमीटर दूर आकर पत्थर तराशने का काम उन्हें उनकी ही बिरादरी के ठेकेदार अनु भाई सोमपुरा ने दिलाया था। कार्यशाला में पत्थर तराशने, कारीगर और मजदूरों की व्यवस्था का काम अनु भाई ही देखते हैं।

महीने के लगभग 11000-12000 रुपए, दो कमरों के घर के अलावा वीएचपी की तरफ से सोमपुरा को खाना पकाने के लिए मिट्टी का तेल भी दिया जाता है। हालांकि, सोमपुरा ने अपने लिए एक गैस चूल्हे का इंतज़ाम कर लिया है, लेकिन कार्यशाला में काम करने वाले दूसरे लोग सोमपुरा जैसे धनी नहीं !

सोमपुरा के अलावा कार्यशाला में पांच-छह सहायक भी रहते हैं। ये सब लोग पत्थर तराशने के काम में सोमपुरा की मदद करते हैं। सोमपुरा ने बताया कि इन्हें 200 रुपये और कुछ लोगों को 300 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से पैसा दिया जाता है। जिस दिन सहायक काम नहीं करते, उस दिन का पैसा उन्हें भी नहीं दिया जाता है। इन सहायकों के घर में बहु प्रचारित उज्जवला योजना की गैस नहीं, बल्कि मिट्टी का तेल जलता है, तब जाकर उनके पेट की आग बुझती है। ये एक त्रासदी है पर ऐसी ही अनेक त्रासदियों का नाम शायद अयोध्या है।

फोटोः विश्वदीपक
फोटोः विश्वदीपक

सोमपुरा के मुताबिक एक दौर था जब कार्यशाला में पत्थर तराशने वाले कई कारीगर थे लेकिन अब सिर्फ वही बचे हुए हैं। इसकी वजह है अदालत के फैसले में लगने वाली देरी। सिर झुकाए हुए सोमपुरा ने कहा कि कार्यशाला में काम धीमा हो गया था क्योंकि बीच में समाजवादी पार्टी की सरकार ने पत्थर की आमद पर प्रतिबंध लगा दिया था। 2017 के बाद जब से योगी सरकार आई है, फिर से राजस्थान से पत्थर आने लगे हैं। सोमपुरा के मुताबिक 25-27 ट्रक पत्थर योगी सरकार के आने के बाद मंगाए गए हैं। हालांकि पत्थरों को तराशने वाले वही इकलौते कारीगर हैं।

एक अनुमान के मुताबिक राम मंदिर के निर्माण में कुल 1.75 लाख क्यूबिक फीट पत्थरों की जरूरत होगी। इसमें से करीब 1 लाख क्यूबिक फीट पत्थर अयोध्या में जमा हो चुका है। लोकल मीडिया ने वीएचपी प्रवक्ता शरद शर्मा के बयान के आधार पर दावा किया था कि अब तक वीएचपी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा कर रही थी, इसीलिए और कारीगरों को नहीं लगाया गया था। पर अब जबकि सर्वोच्च अदालत ने फैसले को आगे खिसका दिया है, वीएचपी जमीन पर गोलबंदी करने में लगी हुई है।

सोमपुरा ने बताया कि विहिप के लोग कारीगरों के संपर्क में हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक वीएचपी ने पत्थर तराशने वाले 12 और कारीगरों से संपर्क किया है। इनमें से कई प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात से हैं। ये पूछे जाने पर कि आखिर सब कुछ गुजरात का ही क्यों है? गुजरात का ही ठेकेदार, गुजरात के ही कारीगर, गुजरात के ही पीएम और कुछ दिन पहले तक वीएचपी के उग्र नेता प्रवीण भाई तोगड़िया भी गुजरात के ही थे। सोमपुरा ने कहा, गुजरात के लोग धार्मिक होते हैं शायद इसलिए।

पर क्या धार्मिकता से इंसान का पेट भरा जा सकता है ? इसके जवाब में सोमपुरा ने कहा – नहीं, पेट तो सिर्फ मेहनत और कला से ही भरा जा सकता है। उन्होंने कहा, “अब तो उम्र हो गई है। हाथ धीरे-धीरे चलते हैं। नज़र भी कमजोर हो चुकी है। असल में पत्थर तराशने का काम जवानी का है, लेकिन क्या करें। हमें इसके अलावा कोई और काम आता ही नहीं। राम मंदिर बनेगा या नहीं कोर्ट जाने। मैं चाहता हूं कि समाज में शांति रहे।” यह कहते हुए सोमपुरा फिर पत्थर तराशने के काम में जुट गए।

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