किसान आंदोलन: वीकेंड्स पर बॉर्डर पहुंच रहे स्थानीय लोग, बच्चों को दिखाना चाहते हैं किसानों का संघर्ष

कृषि कानूनों के विरोध में टिकरी, सिंघु, शाजहांपुर और गाजीपुर बॉर्डर पर यूपी, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान के अलावा कुछ अन्य राज्यों के किसान भी धरने पर बैठे हुए हैं।

फोटो : IANS
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आईएएनएस

कृषि कानूनों के विरोध में टिकरी, सिंघु, शाजहांपुर और गाजीपुर बॉर्डर पर यूपी, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान के अलावा कुछ अन्य राज्यों के किसान भी धरने पर बैठे हुए हैं। हालांकि इन सभी बॉर्डरों पर पहले से ही काफी संख्या में भीड़ उमड़ी हुई है लेकिन शनिवार और रविवार पर ये तादाद और बढ़ जाती है। ठीक एक महीने पहले गाजीपुर पुल (एनएच-24) के नीचे ही सिर्फ किसान धरने पर बैठे हुए थे, लेकिन धीरे-धीरे किसान पुल के ऊपर भी बढ़ गए। मौजूदा हालात की बात करें तो गाजीपुर धरना स्थल से करीब एक किलोमीटर के क्षेत्र में किसानों के ट्रैक्टर ही ट्रैक्टर ही नजर आ रहे हैं। वैसे तो हर दिन दिल्ली-एनसीआर के लोग बड़ी संख्या में यहां घूमने आ आते हैं। लेकिन वीकेंड्स के चलते ये संख्या और बढ़ जाती है।

दिल्ली में शहादरा इलाके के रहने वाले जसपाल सिंह एक प्राइवेट कंपनी में काम करते है। अन्य दिन काम करने के कारण वह शनिवार या रविवार के दिन अपनी पत्नी और साढ़े तीन साल की बेटी के साथ इस आंदोलन में शरीक होते हैं। जसपाल ने आईएएनएस को बताया, मैं एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूं, शनिवार और रविवार को ही मेरी छुट्टी होती है, जिसके कारण मैं सिर्फ हफ्ते में एक दिन ही आ पाता हूं।

उसने कहा, किसान का बेटा होने के कारण इस आंदोलन को अपना समर्थन देता हूं। यहां आकर मैं और मेरी पत्नी किसानों की सेवा करते हैं। मैं अपनी बिटिया को भी लाता हूं ताकि ये भी सीखे कि हमारे धर्म में किस तरह सेवा की जाती है और इस आंदोलन को भी देखे।


हालांकि कुछ परिवार ऐसे भी है जो इस आंदोलन में पहले शरीक हो चुके हैं लेकिन वीकेंड्स होने के कारण अपने बच्चों को भी लेकर आए हैं। उत्तराखंड के रुद्रपुर से आई हरमनदीप कौर अपने पूरे परिवार के साथ आंदोलन में शामिल हुई है, वहीं अपने 2 साल के बेटे और 6 साल की बेटी को भी लेकर आई है। हालांकि हरमनदीप शुक्रवार को यहां पहुंची थी और शनिवार शाम फिर अपने घर वापस चली गईं। हरमनदीप ने आईएएनएस को बताया, हम इससे पहले भी एक बार आये थे लेकिन उस वक्त अपने बच्चों को लेकर नहीं आये थे।

उन्होंने कहा, हम बच्चों को दिखाना चाहते है हम किसानों के साथ क्या हो रह हैं। ये आंदोलन इतिहास बनेगा और ये बच्चे इनके गवाह होंगे।

दिल्ली के कृष्णा नगर इलाके के रहने वाले तेजिंदर सिंह सोनी भी अपने परिवार के साथ बॉर्डर पर आंदोलन में शरीक होने आए हैं,साथ ही अपनी बेटी और 2 साल की नातिन को गोद मे लेकर पहुंचे हुए हैं। तेजिंदर बीते 15 दिनों से हर हफ्ते किसी एक बॉर्डर पर पहुंच कर अपना समर्थन किसानों को देते हैं। आज अपनी 2 साल की नातिनि को लेकर आए हैं। तेजिंदर के अनुसार, हमें अपने बच्चों को इस आंदोलन के बारे में बताना होगा। ये कोई छोटा आंदोलन नहीं है। इसकी गूंज अगले 100 सालों तक रहेगी और हमारे बच्चों को पता होना चाहिए कि किसानों का संघर्ष कैसा रहा था।

इतना ही नहीं गाजियाबाद इलाके में रहने वाले कुछ परिवारों के बॉर्डर पर आए किसानों के साथ घर जैसा व्यवहार बन गया है। इन्द्रापुरम इलाके के निवासी बलजीत कौर और मृणाली ढेम्बला के बीच मां-बेटी का रिश्ता है। बीते महीने भर में कई बार दोनों इस आंदोलन में शरीक हो चुकीं हैं। वहीं बॉर्डर पर किसानों से उनकी जरूरतों की चीजों को भी पूछ कर उनकी सहायता करती हैं।


मृणाली ने आईएएनएस को बताया, जिस तरह सरकार ये कानून लेकर आई है वो प्रकिया ही गलत थी, सरकार को किसानों की सुननी चाहिए। मैं बतौर ग्राहक भी इनका समर्थन करती हूं, क्योंकि भविष्य में हमें ही एक छोटी चीज के 3 से 4 गुना दाम चुकाने होंगे।

मेरा परिवार किसानों के समर्थन में खड़ा है और हम यहां कंबल मास्क भी बाट चुके हैं। हमने अभी किसानों से बात की, हम जल्द ही इन्हें 4 से 5 वाशिंग मशीन दान भी करेंगे।

मृणाली न्यू यॉर्क के एक कॉलेज में पढ़ाई करती है। लेकिन लॉकडाउन होने के कारण फिलहाल अपने परिवार के साथ गाजियाबाद ही रह रहीं है और यहीं से ऑनलाईन पढ़ाई कर रहीं हैं।

दरअसल बॉर्डर पर किसानों के लिए हर जरूरत के सामान को उपलब्ध कराया जा रहा है। खाने-पीने के अलावा गर्म पानी के देसी गीजर, कंबल, रजाई, सर्दी से बचने के हर तरह के कपड़े का इंतजाम यहां हो चुका है।

दिल्ली के झिलमिल कॉलोनी के रहने वाले अन्तरजोत सिंह नौवी कक्षा में पढ़ाई कर रहें हैं। क्रिसमस और नए साल पर छुट्टी होने के कारण गाजीपुर बॉर्डर पर आना शुरू कर दिया और यहां आए किसानों की सेवा कर रहें है। अन्तरजोत ने आईएएनएस को बताया, मैं रोज शाम अपने पिता के साथ वापस चला जाता हूं और अगली सुबह फिर आ जाता हूं। मेरी पढ़ाई अभी शुरू नहीं हुई है, छुट्टी होने के कारण मैं यहां आकर सेवा कर रहा हूं।

बॉर्डर पर कम से कम एक किलोमीटर तक किसानों के तंबू लगे हुए हैं। जगह-जगह बुजुर्ग किसान हुक्के और चाय के साथ सरकार से लड़ने की रणनीति तैयार करते रहते हैं।

अब इस आंदोलन में महिलाओं ने भी भारी संख्या में शरीक होना शुरू कर दिया है। इन सभी महिलाओं के लिए तंबू लगाए गए है।


बॉर्डर पर साफ-सफाई से लेकर हर चीज का यहां ख्याल रखा जा रहा है। नौजवानों के साथ बुजुर्ग किसान भी यहां आंदोलन कर सरकार से लोहा ले रहे हैं। लंगर के अलावा मेडिकल कैंप, एंबुलेंस यहां 24 घंटे तैनात रहती हैं। वहीं अब किसानों ने भी पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी संभाली हुई है।

जगह जगह नौजवान प्रदर्शनकारी हाथों में वॉकी टॉकी लेकर खड़े हुए हैं साथ ही एंट्री और निकासी पर चौकी की तरह बना रखी है जहां आने जाने वालों से उनके बारे में पूछा भी जाता है।

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