'ग्रेट निकोबार परियोजना विशुद्ध व्यावसायिक', मोदी सरकार पर प्रोपेगैंडा कैंपेन चलाने का आरोप, कांग्रेस ने घेरा

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी कहा कि इस मामले को चीन से जोड़कर सरकार पाखंड का परिचय दे रही है क्योंकि वह खुद इस पड़ोसी देश के सामने निरंतर समर्पण की नीति पर अमल कर रही है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश
i
user

नवजीवन डेस्क

google_preferred_badge

कांग्रेस ने बुधवार को सरकार पर ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को लेकर आवाज उठाने वालों के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाने का आरोप लगाया और कहा कि यह एक विशुद्ध व्यावसायिक परियोजना है जिसमें मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर का कोई तत्व नहीं जुड़ा है।

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी कहा कि इस मामले को चीन से जोड़कर सरकार पाखंड का परिचय दे रही है क्योंकि वह खुद इस पड़ोसी देश के सामने निरंतर समर्पण की नीति पर अमल कर रही है।

रमेश ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर पोस्ट किया, "मोदी सरकार अब अपने तंत्र के जरिए एक दुष्प्रचार अभियान चला रही है, जिसमें ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना से होने वाली पर्यावरणीय तबाही को लेकर चिंता करने वालों को 'चीन के प्रति नरम' दिखाने की कोशिश की जा रही है।"

उन्होंने दावा किया कि यह पाखंड की पराकाष्ठा है, क्योंकि यही सरकार चीन के प्रति 4सी यानी "कन्टिन्यूइंग, कैलिब्रेटेड कैपिचुलेशन टू चाइना" वाली नीति (चीन के प्रति निरंतर और सुनियोजित समर्पण की नीति) अपना रही है।


कांग्रेस नेता ने कहा, "19 जून 2020 को खुद प्रधानमंत्री ने चीन को एक तरह से क्लीन चिट दे दी थी, जो लद्दाख में शहीद हुए 20 जवानों का सीधा अपमान था।"

रमेश ने दावा किया कि चीन के साथ बातचीत में मोदी सरकार ने लद्दाख के कई इलाकों में पारंपरिक गश्त और उन इलाकों में पशुओं को चराने के अधिकार छोड़ दिए हैं।

उनका कहना है, "प्रधानमंत्री की निगरानी में ही 2025-26 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड लगभग 115 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय उद्योगों, खासकर एमएसएमई को हुआ। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की प्रतिक्रिया की योजना, निगरानी और उसे कार्यान्वित करने में चीन की निर्णायक भूमिका को लेकर वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के खुलासों पर भी प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा।"

उन्होंने कहा, "सच्चाई यह है कि भारत को चीन की आर्थिक और रणनीतिक चुनौती का लगातार कई मोर्चों पर सामना करना है। लेकिन ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना मुख्य रूप से एक व्यावसायिक परियोजना है, और इसका जो ट्रांसशिपमेंट पोर्ट हिस्सा है, उसमें सैन्य अवसंरचना का कोई तत्व नहीं है। आईएनएस बाज और अंडमान एवं निकोबार कमांड के अन्य ठिकानों पर सैन्य ढांचे के विस्तार के सुझाव दिए गए हैं, लेकिन उन्हें लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है, क्योंकि जिस ग्रेट निकोबार परियोजना को प्रधानमंत्री बुलडोजर चलाकर आगे बढ़ा रहे हैं, उसके मोदानी कारोबारी साम्राज्य का हिस्सा बनने की पूरी संभावना है।"

रमेश ने कहा, " दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इसका पर्यावरण और मानवीय स्तर पर बेहद विनाशकारी असर पड़ेगा।"

पीटीआई के इनपुट के साथ

Google न्यूज़व्हाट्सएपनवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia