#MeToo में ढेर हुए एम जे अकबर के इस्तीफे की यह है इनसाइड स्टोरी

अकबर के इस्तीफे की असली वजह उन पर आरोप लगाने वाली महिला पत्रकारों की बढ़ती संख्या के साथ ही सोशल मीडिया पर होती सरकार की किरकिरी और खिलाफ बनता माहौल है। 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, इसके बाद आम चुनाव होने हैं, ऐसे में मोदी सरकार के पास अकबर की बलि देने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं था।

फोटोः सोशल मीडिया
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जो काम कई दिन पहले हो जाना था, वह आखिरकार बुधवार को हुआ। वरिष्ठ पत्रकार रहे विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर ने अंतत: इस्तीफा दे दिया। अकबर पर #MeToo अभियान के तहत कम से कम दो दर्जन महिलाओं ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। अकबर का इस्तीफा इस अभियान की कामयाबी के बतौर देखा जा रहा है।

वैसे तो रविवार को जब एम जे अकबर अपने अधिकारिक नाइजीरिया दौरे से भारत लौटे तो दो-एक न्यूज चैनलों ने उनके इस्तीफे की खबर दे दी थी, लेकिन दिन ढलते-ढलते इस खबर का खंडन आ गया कि इस्तीफा नहीं हुआ है। एम जे अकबर ने बयान जारी कर कहा कि, वे इस मामले में उन पर आरोप लगाने वाली महिलाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे। सोमवार को एम जे अकबर ने उन पर आरोप लगाने वाली पहली महिला पत्रकार प्रिया रमाणी के खिलाफ दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया।

तो फिर क्या हुआ कि अचानक एम जे अकबर ने इस्तीफा दे दिया?

सूत्रों के मुताबिक सरकार में अंदरखाने इस मुद्दे पर अकबर के नाईजीरिया से लौटने से पहले ही विचार-विमर्श शुरु हो गया था। इस मुद्दे पर 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले साल के लोकसभा चुनाव में पार्टी के नफा-नुकसान का हिसाब भी लगाया गया था। लेकिन चर्चा किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी। यही कारण था कि अकबर पर पूछे सवाल के जवाब में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बिल्कुल खामोश रहीं थीं। लेकिन मोदी सरकार की दो महिला मंत्रियों ने इस पर प्रतिक्रिया दी थी। स्मृति ईरानी ने कहा था कि वे महिलाओं के साथ हैं, लेकिन इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया आरोपी व्यक्ति (एम जे अकबर) ही दे सकते हैं। वहीं महिला कल्याण और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने तो इस पर बाकायदा जजों की एक कमेटी बनाने की बात कह दी थी।

सूत्रों का कहना है कि जब रविवार को एम जे अकबर के इस्तीफे की खबर सामने आई तो भले ही इसका खंडन हो गया, लेकिन सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री ने ही कुछ न्यूज चैनलों को इस बारे में ‘ब्रीफिंग’ की थी। यह खबर जब सारे मीडिया में आई तो आनन-फानन प्रधानमंत्री ने पीएमओ में प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र को तलब किया और इस पर कैफियत पूछी। इसके बाद एम जे अकबर के इस्तीफे की खबर का खंडन हुआ। साथ ही अकबर के बयान के साथ ऐलान भी किया गया कि वे अदालत जाएंगे।

रणनीति यह थी कि अकबर के अदालत में जाने से शायद #MeToo मुहिम पर दबाव बनेगा। लेकिन हुआ इसका उलटा और ज्यादा महिलाएं सामने आने लगीं। रही सही कसर उस वीडियो ने पूरी कर दी जिसमें पार्टी के प्रवक्ता और सरकार की तरफ से ओएनजीसी में डायरेक्टर नियुक्त किये गए संबित पात्रा एम जे अकबर के सवाल पर चुप्पी साधकर भागते नजर आए।

इसके बाद प्रधानमंत्री ने कुछ खास मंत्रियों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के साथ मंत्रणा की। मंगलवार को अजित डोवाल को एम जे अकबर के पास भेजकर प्रधानमंत्री के संदेश से अवगत कराया गया। सूत्रों का कहना है कि अजित डोवाल ने मंगलवार को एमजे अकबर से मुलाकात करने के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी। इसके बाद डोवालबीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मिले। अमित शाह से मुलाकात के दौरान बीजेपी के संगठन महामंत्री रामलाल भी मौजूद थे।

इन मुलाकातों के बाद तय हो गया कि अकबर द्वारा दायर मुकदमे की पहली सुनवाई से पहले ही उनके इस्तीफे का ऐलान कर दिया जाए। और बुधवार दोपहर बाद ऐसा ही हुआ। अकबर ने इस्तीफे के संबंध में जो बयान जारी किया, उसमें यही लिखा कि, “मैंने निजी हैसियत से अदालत में न्याय की गहार लगाई है, इसलिए मैं समझता हूं कि मेरा विदेश मंत्रालय के राज्यमंत्री पद से इस्तीफा देना सही होगा।”

सूत्र बताते हैं कि एम जे अकबर इस्तीफा देंगे या नहीं देंगे, यह फैसला कम से कम अकबर का तो नहीं ही था। अकबर बड़े पत्रकार रहे हैं, उन्हें पता है कि उनके इस्तीफा न देने से क्या हो सकता है, फिर भी नाइजीरिया से वापसी पर इस्तीफा न देने में उनकी मर्जी तो शामिल नहीं रही होगी। अब जबकि उन्होंने इस्तीफे का ऐलान कर दिया है, तो भी तय है कि इसमें भी न तो उनकी बुद्धि या मर्जी की कोई भूमिका है।

संभावना तो यही है कि अब बीजेपी के सारे नेता-प्रवक्ता उछल-उछलकर प्रचारित करेंगे कि प्रधानमंत्री ने एम जे अकबर को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया। यह भी चर्चा होगी कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के हाथों प्रधानमंत्री ने एम जे अकबर को इस्तीफा देने का संदेश क्यों भेजा? गौरतलब है कि अजित डोवाल ने मंगलवार को ही एम जे अकबर से मुलाकात की थी।

तो क्या एम जे अकबर के इस्तीफे में अजित डोवाल की कोई अहम भूमिका है? अगर ऐसा ही है तो यह काम तो रविवार को ही हो सकता था। तो फिर यह सवाल भी उठेगा कि अजित डोवाल ने किस हैसियत से एम जे अकबर को इस्तीफा देने के लिए कहा होगा? अजित डोवाल का काम राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले देखना है, न कि विदेश मंत्रालय मंत्रियों के कामकाज या चरित्र के आधार पर उनका आंकलन करना।

फिर इस इस्तीफे का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जाएगा। तो सवाल यह उठेगा कि प्रधानमंत्री की कैबिनेट का एक अहम सदस्य दो दिन पहले ही अपने बचाव में अदालत का दरवाज़ा खुद अपनी मर्जी से कैसे खटखटा सकता है? क्या विदेश राज्यमंत्री पर प्रधानमंत्री का कोई नियंत्रण नहीं है? क्या अकबर इतने ताकतवर थे कि वे प्रधानमंत्री के नियंत्रण में न रहें और बिना उनकी मर्जी के अदालत चले जाएं?

दरअसल अकबर के इस्तीफे का असली कारण उन पर आरोप लगाने वाली महिला पत्रकारों की बढ़ती संख्या के साथ ही सोशल मीडिया पर होती सरकार की किरकिरी और उसके खिलाफ बनता माहौल है। 5 राज्यों में विधानसभा सिर पर हैं, इसके बाद आम चुनाव होने हैं, ऐसे में मोदी सरकार के सामने अकबर की बलि देने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं था।

संभवत: सरकार की रणनीति अकबर के मामले में कुछ और ही थी, जो बुरी तरह नाकाम रही। सरकार को लगता था कि अकबर के अदालत में जाने के बाद महिलाओं में कुछ डर पैदा होगा, और अदालती कदम के चलते मीडिया भी इस मामले में एहतियात बरतेगा। लेकिन हुआ इससे एकदम उलट। अकबर के अदालत जाते ही दो दर्जन महिला पत्रकारों ने प्रिया रमाणी का साथ देने का ऐलान कर दिया। पूरी पत्रकार बिरादरी भड़क उठी और #MeToo अभियान में तेज़ी आने लगी। इस उफनते आक्रोश के देख मोदी सरकार दबाव में आ गई।

ध्यान होगा कि बीते दिनों बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बयान दिया था कि ‘आरोप लगाने से कोई दोषी नहीं हो जाता, देखना पड़ेगा कि कौन सही है कौन गलत।’ इस बयान से यह कयास लगने लगे थे कि सरकार अकबर का इस्तीफा लेने के मूड में नहीं है।

लेकिन, जब पत्रकारों ने बीजेपी नेताओं और प्रवक्ताओं को घेर-घेर कर अकबर के बारे में सवाल पूछना शुरु कर दिए, तो सरकार को लगा कि बस अब और देर नहीं।

लेकिन एक आशंका भी सामने है कि #MeToo मुहिम थमने वाली नहीं है। अकबर के इस्तीफे से उत्साहित अब वह महिलाएं भी उम्मीद हैं कि सामने आएंगी जो अब तक किन्हीं कारणों से अपनी आपबीती नहीं कह पाई थीं। अकबर के इस्तीफे के बाद यह भी संभावना है कि बीजेपी अब इसी मुद्दे को जोर-शोर से उठाकर आक्रामकता दिखाएगी।

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