कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकील बोले- क्रास और बिंदी की अनुमति है तो फिर हिजाब की क्यों नहीं?

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता रवि वर्मा कुमार ने कहा कि केवल हिजाब का ही जिक्र क्यों है, जब क्रास, पगड़ी और बिंदी जैसे अनेकों धार्मिक प्रतीक चिन्ह लोगों द्वारा रोजाना पहने जाते हैं।

फोटो: IANS
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नवजीवन डेस्क

हिजाब विवाद को सुलझाने के लिए गठित तीन न्यायाधीशों की कर्नाटक हाईकोर्ट की पीठ ने बुधवार को मामले की सुनवाई की। इस दौरान याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता रवि वर्मा कुमार ने कहा कि केवल हिजाब का ही जिक्र क्यों है, जब क्रास, पगड़ी और बिंदी जैसे अनेकों धार्मिक प्रतीक चिन्ह लोगों द्वारा रोजाना पहने जाते हैं। उन्होंने कहा, सरकारी आदेश में किसी अन्य धार्मिक प्रतीक पर विचार नहीं किया जाता है, केवल हिजाब ही क्यों? उन्होंने कहा कि मुस्लिम लड़कियों के साथ भेदभाव विशुद्ध रूप से उनके धर्म पर आधारित है।

उन्होंने आगे कहा कि सैकड़ों धार्मिक प्रतीक हैं और सरकार केवल हिजाब को ही क्यों चुन रही है? वरिष्ठ वकील कुमार ने पीठ के समक्ष तर्क दिया कि हिंदुओं और सिखों के अपने-अपने धार्मिक प्रतीक हैं, फिर इन गरीब मुस्लिम लड़कियों को ही क्यों चुन रहे हैं? क्या यह उनके धर्म के कारण नहीं है?

उन्होंने कहा, "हमें (मुस्लिम लड़कियों को) तुरंत दंडित किया जाता है। क्या हमें क्लास से बाहर करने और सड़क पर खड़ा करने के लिए उन्हें शिक्षक कहा जा सकता है? यह पूर्वाग्रह से भरा है।"

उन्होंने प्रस्तुत किया, "शिक्षा का लक्ष्य बहुलता है, वर्दी को बढ़ावा देना नहीं। कक्षा को राष्ट्र की विविधता का प्रतिबिंब होना चाहिए, जिस बिंदु को सर्वोच्च न्यायालय ने मान्यता दी है। समाज की विविधता और बहुलता में विविधता और एकता बनाए रखना शिक्षा का आदर्श वाक्य है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम की वैधता चुनौती के दायरे में आ गई है।"

उन्होंने कहा कि अगर पगड़ी पहने लोग सेना में हो सकते हैं, तो हिजाब पहनने वाली इन लड़कियों को कक्षाओं में जाने से क्या चीज रोकती है?

कुमार ने कहा, "यह केवल उनके धर्म के कारण है कि याचिककर्ता को क्लास से बाहर भेजा जा रहा है। बिंदी लगाने वाली लड़की को बाहर नहीं भेजा जा रहा, चूड़ी पहने वाली लड़की को भी नहीं। क्रॉस पहनने वाली ईसाइयों को भी नहीं, फिर केवल इन्हीं लड़कियों को ही क्यों बाहर भेजा जा रहा है? यह संविधान के आर्टिकल 15 का उल्लंघन है।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम छात्रों के खिलाफ पुलिस बल का भी इस्तेमाल किया गया।

उन्होंने आगे कहा, "स्कूल विकास और प्रबंधन समिति (एसडीएमसी) को शिक्षा अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त नहीं है। विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, वर्दी का निर्धारण अवैध है। दिशानिर्देशों में यह भी कहा गया है कि स्कूल एवं कॉलेज के प्रधानाचार्य के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, यदि वह वर्दी पर जोर देते हैं, लेकिन यहां वे हिजाब पहनने के खिलाफ हैं।"

उन्होंने दलील पेश करते हुए कहा कि प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज शिक्षा छात्र के जीवन की रीढ़ है। एसडीएमसी का गठन मुख्य रूप से फंड के उपयोग, शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए किया गया है। ऐसे निकाय को छात्रों को अनुशासित करने के लिए पुलिस की शक्ति सौंपी जाती है। महाविद्यालय विकास समिति को यूनिफॉर्म निर्धारित करने का कोई अधिकार नहीं है।

उनकी दलीलों के बाद मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी ने सवाल किया कि क्या वर्दी बनाए रखना शैक्षणिक मानकों को बनाए रखना नहीं है?

कुमार ने अपनी समापन टिप्पणी में कहा कि मुस्लिम लड़कियां सबसे कम शिक्षित हैं, कम से कम लड़कियां कक्षाओं में आ तो रही हैं। अगर उन्हें वापस भेज दिया जाता है, तो यह उनके लिए कयामत साबित करने वाला है। याचिकाकर्ताओं की ओर से मुंबई से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता युसूफ मुच्छला ने कहा कि लड़कियां हिजाब पहनना अपना अधिकार मानती हैं और सरकार को इसका सम्मान करना चाहिए।

तमाम दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी, न्यायमूर्ति कृष्णा एस. दीक्षित और न्यायमूर्ति खाजी जयबुन्नेसा मोहियुद्दीन की पीठ ने सुनवाई गुरुवार तक के लिए स्थगित कर दी।

बता दें कि मुस्लिम छात्राओं को शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनकर प्रवेश से रोकने को लेकर कुछ समय पहले तब विवाद शुरू हुआ था, जब कर्नाटक के उडुपी जिले की कुछ छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में प्रवेश नहीं करने दिया गया था। इसके बाद छात्राओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और वे अदालत पहुंच गईं।

आईएएनएस के इनपुट के साथ

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