अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवसः आखिर कब तक छोड़ी जाती रहेंगी विधवाएं मोक्ष के लिए

मोक्षनगरी के तौर पर जाने जाने वाले दुनिया के प्राचीनतम जीवित शहर काशी में मौत का इंतजार करती जर्जर काया वाली विधवाओं की अपनी अलग दुनिया है। ऐसी दुनिया, जिससे आंखें चुराकर निकलता यह समाज शायद ही संतोष के साथ शीशे में अपना चेहरा देख सके।

फोटोः सोशल मीडिया
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विजय नारायण सिंह

वह अकेली नहीं हैं। उनके दो-दो बेटे हैं। दोनों अच्छी नौकरी और बेहतर जीवन के लिए अमेरिका चले गए। इस बीच, उनके पति का निधन हो गया। बेटे नहीं आए, पड़ोसियों ने अंतिम संस्कार किया। करीब एक साल बाद बेटों को मकान वगैरह की चिंता हुई तो आए और बेचकर चले गए। लेकिन यह चिंता नहीं हुई कि उनके पीछे उनकी मां का जीवन कैसे चलेगा।

ऐसी तमाम कहानियां बनारस के वृद्धाश्रमों में घुट-घुटकर जिंदा हैं। कहीं अपनों से सताए जाने के मार्मिक कथानक को समेटे धीरे-धीरे क्लाइमेक्स की ओर बढ़ता किरदार तो कहीं गैरों के हाथों सबकुछ हारकर सांसों की खाली होती पोटली को संभाले आगे बढ़ते कदम। मोक्षनगरी के तौर पर जाने जाने वाले दुनिया के इस प्राचीनतम जीवित शहर में मौत का इंतजार करती इन जर्जर काया वाली विधवाओं की अपनी अलग दुनिया है। ऐसी दुनिया, जिससे आंखें चुराकर निकलता यह समाज शायद ही संतोष के साथ शीशे में अपना चेहरा देख सके।

काशी में ऐसे कई आश्रम हैं, जहां सैकड़ों विधवाएं ‘मोक्ष’ का इंतजार कर रही हैं। वे अतीत को भूलना तो चाहती हैं, लेकिन भूल नहीं पातीं। बातें करने पर आंसुओं का जलजला आ जाता है। भजन-कीर्तन में समय गुजारती हैं। अपनों की याद आती है तो किसी कोने में जाकर सिसक लेती हैं। हालांकि घाट के किनारे के विधवा आश्रमों में सन्नाटा पसरा हुआ है। कुछ साल पहले जर्जर हो चुके इन भवनों में अब कोई विधवा नहीं रहती। पहले यहां इन भवनों की खिड़िकयों से बुझी हुई जर्जर काया वाली आंखें गंगा की तरफ झांकती दिख जाती थीं। हां, एक और फर्क है, कुछ दशक पहले तक सिर मुंडाए बाल विधवाएं भी दिख जाती थीं जो अब कहीं नजर नहीं आतीं।

शिवाला घाट स्थित मदर टेरेसा अशक्त एवं वृद्धाश्रम में इलाहाबाद से आए एक दंपति ने अपनी पड़ोसी वृद्ध विधवा को यहां रखने की अपील आश्रम की सिस्टर से की, लेकिन आश्रम में जगह नहीं होने के कारण उनको निराश होना पड़ा। उन्होंने बताया कि उनके पड़ोस में भरा-पूरा एक परिवार रहता था। उनके दो बेटे नौकरी के लिए अमेरिका चल गए। इसी बीच वृद्धा के पति का निधन हो गया। वह अकेली हो गईं। पिता के निधन पर भी दोनों बेटे इलाहाबाद नहीं लौटे। उनका क्रियाकर्म इन्हीं पड़ोसियों ने किया।

इसके बाद वृद्धा की देखभाल यही लोग करने लगे। पिता के निधन के एक साल बाद उनके दोनों बेटे इलाहाबाद लौटे और मकान समेत सभी संपत्ति बेचकर वापस मां को अपने हाल पर छोड़कर अमेरिका चल गए। तब से यही परिवार उनकी देखभाल कर रहा है। उन्होंने बताया कि वे उनकी कितनी मदद करें आखिर। उन्होंने सोचा कि उन्हें किसी आश्रम में सुरक्षित रखवा दिया जाए। यहां से निराश होने के बाद ये लोग दुर्गाकुंड स्थित राजकीय अशक्त एवं वृद्धाश्रम पहुंचे, जहां उन्हें बताया गया कि वे पुलिस और मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही किसी वृद्धा को यहां रख सकते हैं।

राजकीय आश्रम में कुल 25 वृद्धाएं रह रही हैं। यहां असम, कोलकाता, चेन्नई, पटना, ओडिशा, इलाहाबाद जैसे विभिन्न इलाकों की विधवाएं रह रही हैं। राजस्थान निवासी बाला की उम्र करीब 70 साल है। वह राजस्थान में कहां की रहने वाली हैं, उन्हें ठीक से याद नहीं। वह हिंदी नहीं बोल पा रही थीं। अपनी ठेठ भाषा में वह जो कुछ बता पाईं उसके मुताबिक, उनके पति के बड़े भाई ने उनके पति समेत पूरे परिवार की हत्या कर दी और सारी संपत्ति हड़प ली।

वह अर्धविक्षिप्त अवस्था में किसी तरह जान बचाकर वहां से भाग सकीं। बनारस कैसे पहुंचीं, उन्हें नहीं पता। वह अपने को कभी जयपुर के प्रतापगढ़ तो कभी इंदौर की निवासी बताती हैं। जब उनसे बातें हो रहीं थीं तो वह पति और बच्चों की याद आते ही फफक-फफक रोने लगीं। आश्रम के केयर टेकर ने हमें रोका और कहा कि ज्यादा मत कुरेदिए।

ऐसी ही कहानी बलविंदर कौर की है। वह पंजाब या दिल्ली की रहने वाली हैं। उनकी भी मानसिक स्थिति ठीक नहीं लगी। वह कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुईं। केयरटेकर ने बताया कि1984 के सिख विरोधी दंगों में उनके पूरे परिवार की हत्या कर दी गई थी। जब भी उनसे बीते दिनों की बात की जाती है, वह गहरे सदमें में चली जाती हैं। वह भी वाराणसी कैसे पहुंचीं, उन्हें नहीं पता। उन्हें भी पुलिस ने स्टेशन से लाकर मजिस्ट्रेट के आदेश पर यहां पहुंचाया था। उन्हें यहां रहते करीब 10 साल हो चुके हैं।

प्रतापगढ़ के किसी गांव की रहने वाली जयंती ने बताया कि उनके पति की हत्या उनके पति के ही एक भाई ने कर दी और करीब ढाई बीघा जमीन पर कब्जा कर लिया। दो छोटे बच्चों को लेकर वह इलाहाबाद पहुंची। यहां उहोंने आनंद भवन के बगल में सड़क के किनारे चाय-पान की गुमटी लगाई। इसी बीच उनकी बेटी और दामाद की बीमारी से मौत हो गई। कुछ दिन बाद सरकारी आदेश पर उनकी जैसी सभी गुमटियों को हटा दिया गया। इसके बाद उनके आर्थिक हालात बेहद खराब हो गए और दोनों बेटों को पढ़ाना-लिखाना संभव नहीं हो सका। अंततः पास में ही रहने वाले वाराणसी के एक परिवार नें उन्हें पुलिस के जरिए राजकीय वृद्धाश्रम पहुंचा दिया। यहां वह खुश हैं।

हालांकि अतीत की याद आते ही उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उनके दोनों बेटे अब वहीं ठेला लगाकर जीवन बसर कर रहे हैं। एक पूरी-सब्जी का ठेला लगाता है तो दूसरा चाय का ठेला लगाता है। उन्होंने बताया कि छोटा बेटा तीन साल पहले मिलने आया था। उसके बाद से यहां तन्हाई में ही जीवन बिता रही हैं। यह पूछने पर कि वे स्वयं इलाहाबाद बेटों के पास जा सकती हैं तो उन्होंने कहा कि बेटे किसी तरह अपना गुजारा कर रहे हैं, वह उन पर बोझ नहीं बनना चाहतीं।

मदर टेरेसा आश्रम में हाल ही में आंध्र प्रदेश की एक महिला आई हैं। वह सिर्फ तेलुगू बोलती हैं। सिस्टर ने बताया कि उनको उनके पति और बेटों ने मारपीट कर घर से निकाल दिया। सिस्टर ने जब पूछा कि ऐसा क्यों हुआ तो वह मौन हो जाती हैं। पति और बेटों ने टिकट थमाकर उन्हें बनारस की ट्रेन में बैठा दिया। यहां स्टेशन पर वह भटक रही थीं। तब पुलिस ने उन्हें यहां आश्रम में पहुंचा दिया। बातचीत के दौरान लगातार उनकी आंखों से आंसू बहते रहे। पर वे अपने पति और बच्चों के बारे में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुईं। सिर्फ इतना बता पाईं कि उनके मायके से उन्हें कुछ संपत्ति मिली थी, जिसे बेचने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा था।

बंगाल की ज्योत्सना भी करीब 60 साल की हो चुकी हैं। उनके पति ने ही उन्हें घर से निकाल दिया। उनकी दो बेटियां और एक बेटा था। सबसे पहले बड़ी बेटी को ससुराल वालों ने दहेज के लिए जलाकर मार डाला। इसके बाद बीमारी से इकलौता बेटा भी चल बसा। छोटी बेटी का जीवन भी उसके ससुराल वालों ने नरक बना रखा है। इन सब हादसों के लिए पति अपनी पत्नी की तकदीर को जिम्मेदार मानता रहा, जबकि बेटी और बेटे की मौत से वह खुद गहरे सदमें में थीं। पति ने इस हालत में उनका साथ देने की बजाय उन्हें घर से निकाल दिया। अब भी वह सदमे से बाहर नहीं आ पाई हैं। किसी तरह वाराणसी पहुंच गईं। यहां पुलिस ने उनको इस आश्रम में पहुंचा दिया। अब वे यहां से वापस घर नहीं जाना चाहतीं।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को यहां आश्रम में पहुंचा दिया। उनका एक बेटा डॉक्टर है, जबकि दूसरा बेटा सरकारी अधिकारी। बेटों ने भी मां का साथ नहीं दिया। बेटे भी पिता से अलग रहते हैं। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वह कम पढ़ी-लिखी हैं और अपने पति को रोजाना शराब पीने से मना करती थीं। स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें काफी समझाया-बुझाया कि पत्नी को वापस ले जाएं, लेकिन वह तैयार नहीं हुए। इसके बाद अधिकारियों ने पुलिस की मदद ली तब जाकर प्रोफेसर पत्नी को घर ले गए।

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