सुरक्षा का नहीं, कश्मीर राजनीतिक और भावनात्मक मुद्दा है, जिसका हल राजनीति से ही करना होगाः एएस दुलत

कश्मीर के ताजा हालात को लेकर पूर्व रॉ प्रमुख एएस दुलत का कहना है कि कश्मीर में जो भी हो रहा है, वह सही नहीं है और विपक्ष की चुप्पी चिंता पैदा करती है। उन्होंने कहा कि शुरू में राहुल गांधी ने इस पर बोला था और हाल में प्रियंका गांधी ने भी इस मुद्दे को उठाया।

फोटोः सोशळ मीडिया
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ऐशलिन मैथ्यू

पूर्व रॉ प्रमुख अमरजीत सिंह दुल्लत कश्मीर की वर्तमान स्थिति को लेकर चिंतित हैं। वह मानते हैं कि कश्मीर को जिस तरह बिल्कुल बंद करके रखा गया है, वह समस्या का समाधान नहीं है। सरकार और कश्मीर के लोग- दोनों ही समय का इंतजार कर रहे हैं। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह सब कब तक चलेगा। नवजीवन के लिए ऐशलीन मैथ्यू के साथ लंबी बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि वह निकट भविष्य में वहां चुनाव होता भी नहीं देख रहे हैं। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंशः

जब सरकार ने पिछले साल अगस्त में अनुच्छेद 370 हटा दिया, कश्मीर में नेताओं को हिरासत में ले लिया, दो केंद्र शासित क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं रोक दीं और लोगों के मूलभूत अधिकार तक भी निरस्त कर दिए, तब आपने सोचा था कि यह स्थिति इतने लंबे समय तक जारी रहेगी और हाल यहां तक बिगड़ जाएंगे?

कोई नहीं जानता कि कश्मीर में क्या हो रहा है और कि वहां की वास्तविकता क्या है। न यह कोई जानता है कि दिल्ली क्या सोच रही है। अगर कोई ज्ञानी दिल्ली क्या सोच रही है या कश्मीर क्या सोच रहा है, इस बारे में हमारी ज्ञान वृद्धि करे, तो फिर हम बताने की हालत में होंगे कि क्या सही या गलत है।

कुछ लोग मानते हैं कि जब दिल्ली कहती है कि कश्मीर में स्थिति ‘सामान्य’ है, तो इसका मतलब सिर्फ यह है कि लोगों ने हालात से समझौता कर लिया है। दूसरे लोग इसे असंतोष की कमी और विरोध प्रदर्शनों की अनुपस्थिति को भिन्न तरीके से देखते हैं। उदाहरण के तौर पर, लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राॅय ने इसे सबसे तीव्र आवाज वाला मौन कहा है।

एक बार जब घेराबंदी शुरू हुई, हम जानते थे कि यह लंबी चलेगी; यह तीन महीने या तीन साल तक भी चल सकती है, जब तक कि कोर्ट इस पर अपनी कोई राय नहीं बनाता है। अब, नेशनल काॅन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला की बहन अपने भाई को हिरासत में रखे जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई हैं और कोर्ट ने उनकी याचिका विचार के लिए स्वीकार कर ली है। कोर्ट को निर्णय लेने दें कि यह निर्णय कितना संवैधानिक है और कितना सही है, क्योंकि अन्यथा कोई नहीं जानता कि नई दिल्ली चाहती क्या है।

क्या आपने वहां से कश्मीरियों की बातें सुनी हैं?

कश्मीर से निकलने वाला कोई साफ नैरेटिव नहीं है। सरकार का नैरेटिव सामान्य स्थिति का है। कश्मीरियों के एक खास वर्ग में जरूर स्थिति से समझौता कर लेने का भाव है, लेकिन वहीं, यहां तक कि जिन लोगों ने हालात से समझौता करने की बात मान ली है, उनमें भी धोखा खाने की भावना है।

मैंने सुना है कि काफी सारे कश्मीरी कह रहे हैं कि उन लोगों ने भारत के लोगों से ऐसी उम्मीद नहीं की थी। कश्मीर की नई दिल्ली, केंद्र सरकार के साथ सब दिन समस्या बनी रही थी, लेकिन उनकी भारत के लोगों के साथ कोई समस्या नहीं थी। इसलिए भारत के लोगों ने उन्हें पूरी तरह क्यों त्याग दिया? काफी सारे कश्मीरी ऐसे हैं जो यह सवाल पूछ रहे हैं।

इस मामले में हमें अपने अंदर झांकना चाहिए। जब कश्मीर के लोग भी भारत के लोग ही हैं तो यह कश्मीर के लोग बनाम भारत के लोग-जैसी हालत क्यों बन गई? वे यह जरूर महसूस करते हैं कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है और उन्हें पता ही नहीं है कि उनकी गलती क्या है।


कश्मीरियों के साथ दिक्कत यह है कि जब उनसे कोई बात नहीं करता है, तब वे शिकायत करते हैं, लेकिन जब बातचीत का अवसर आता है, वे कुछ बोलेंगे नहीं, बल्कि अपने कंधे देखेंगे। एक काल्पनिक रेखा है जिन्हें कश्मीरियों ने खींच रखी है। कश्मीरी शांति कीआशा रखते हैं और इसके लिए लालायित रहते हैं, पर उनके दिमाग में जो मकड़जाल है, उसे भी साफ करने की जरूरत है; उन्हें इतिहास की बातों को दफन करना होगा। उन्हें आगे बढ़ना होगा।

2004-5 में डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार के समय कई बार बातचीत आयोजित की गई लेकिन कश्मीरी नहीं आए। डाॅ. सिंह भी इन बैठकों में आते थे। मुफ्ती तब फारूक अब्दुल्ला से बात भी नहीं करते थे। इसलिए, क्या तब कश्मीरी दिमाग में कोई समस्या नहीं थी?

मैं कई वर्षों से कहता रहा हूं कि कश्मीर में सबसे तार्किक गठबंधन दोनों फारूकों (अवामी एक्शन कमेटी के मीरवाइज मौलवी फारूक और फारूक अब्दुल्ला) के बीच है जो 1986/87 में था और तब तक रहा जब तक फारूक अब्दुल्ला सत्ता में थे। लोग इसे दोहरे फारूक समझौता कहते थे। यह अब क्यों नहीं हो रहा है?

हम किसी तरह के प्रतिरोध के बारे में नहीं सुन रहे। इसका क्या स्पष्टीकरण है?

अनुच्छेद 370 हटाया जा चुका है और यह बात हो चुकी है। कश्मीरी भले ही इसे नहीं स्वीकारें, पर यह हो चुका है। कश्मीरियों को अब सोचना होगा कि आगे क्या, खास तौर से इसलिए क्योंकि हर व्यक्ति अपनी मांगों की तरफ लौटता दिखता है। हमें आगे बढ़ने और इसे दिशा देने की जरूरत है।

दो नैरेटिव हैंः पहला, हालात से समझौता कर लेना और दूसरा, कश्मीरी चतुर हो गए हैं। कश्मीरियों के लिए बाहर निकलने और मारे जाने या उलझने की जरूरत नहीं है, खास तौर से तब जब औसतन हर 30 नागरिकों पर एक सैनिक वहां तैनात है। यह इंतजार करते रहने का सवाल है। कश्मीरी इंतजार कर रहे हैं और नई दिल्ली भी इंतजार ही कर रही है। यह इंतजार के समय का खेल है। वहां न तो कोई गोली चल रही है, न हत्या हो रही है। हम सिर्फ अल्लाह से पूछ सकते हैं कि आगे क्या होगा।

कश्मीर में सेनाओं की तैनाती में कुछ भी राजनीतिक नहीं है और न यह समझ है कि यह कोई प्रमुख नुक्स है। कश्मीर को सिर्फ सेक्योरिटी के प्रिज्म के जरिये देखा जा रहा है लेकिन यह सिर्फ सिक्योरिटी का मसला नहीं है। यह राजनीतिक मुद्दा है, भावनात्मक मुद्दा है, मनोवैज्ञानिक मुद्दा है। देर सबेर, सरकार को उनके साथ राजनीतिक तरीके से ही निबटना होगा। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं, जो स्थायी समाधान की ओर जाता हो।

कश्मीर में राजनीति के कई मतलब हो सकते हैं, लेकिन मैं निकट भविष्य में वहां चुनाव होते नहीं देख रहा हूं। राजनीति को दूसरे तरीके से काम करना होगा, अन्यथा सरकार वहां अड़चन में पड़ी रहेगी। और इसे राजनीतिक तौर पर निबटाना सिर्फ बातचीत के जरिये संभव है। मैं एक कदम आगे बढ़ूंगा और कहूंगा कि हमें इस मुद्दे पर पाकिस्तान से भी बातचीत करनी चाहिए। यह अभी नहीं हो सकता और इसमें कई साल लग सकते हैं। लेकिन यह ‘मेरा रास्ता अपनाओ या फिर अपने रास्ते जाओ’ नहीं हो सकता; यहां बाईपास लेना ही होगा। आरएसएस के अनुयायी रहे पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी अपने समय में अलगाववादियों से बात की थी।


क्या आपको लगता है कि जम्मू-कश्मीर को जनविरोधी कानूनों और व्यवहारों के लिए प्रयोगशाला के रूप में बदला जा रहा है?

अगर आप इसे लैब टेस्ट के तौर पर देख रही हैं, तो उस टेस्ट का परिणाम आना बाकी है। जब अभी टेस्ट किया ही जा रहा है, तो आप इसे नकारात्मक या सकारात्मक क्यों देख रही हैं? जम्मू-कश्मीर में अब भी सब कुछ बंद है। जब आप पैथलैब में सैंपल को कल्चर के लिए भेजती हैं, तो यह तो समय लेता है।

यह बात मुझे खटकती है कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, वह सही नहीं है और आश्चर्यजनक तौर पर विपक्ष चुप है। पी. चिदंबरम के अलावा मैं अन्य किसी नेता के बारे में नहीं जानता जिसने उस तरह कहा हो जिस तरह उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर कहा है। राहुल गांधी शुरुआत में ही इस पर बोले और अभी कुछ दिनों पहले प्रियंका गांधी ने भी कश्मीर मुद्दे पर टिप्पणी की।

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