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केसीआर ने तोड़ी तेलंगाना के लोगों की उम्मीदें, टीआरएस नेता महसूस कर रहे घुटन: के विश्वेश्वर रेड्डी

हाल ही में टीआरएस से नाता तोड़ने वाले सासंद के विश्वेश्वर रेड्डी का कहना है कि टीआरएस नेता के चंद्रशेखर राव अपने बेटे के टी राव को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। उनका कहना है कि टीआरएस में लोकतंत्र नहीं बचा है और सांसदों-विधायकों तक की नहीं सुनी जाती।

फोटो : सोशल मीडिया

नवजीवन डेस्क

क्या आपको टीआरएस में रहते हुए अपनी आवाज़ उठाने से रोका गया। क्या पार्टी आलाकमान अपनी मनमानी करती थी।

ऐसा नहीं है। कई मुद्दों पर हमें बोलने का मौका दिया गया। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आप संसद में स्पीकर की इजाजत से भी बोल सकते हैं। लेकिन कुछ ऐसे मद्दे थे जिस पर हमें सिर झुकाना पड़ा क्योंकि टीआरएस सदस्यों ने जो रुख संसद में लिया था, तेलंगाना में पार्टी ने उन मुद्दों पर अलग रुख अपनाया और हमें इसकी खबर तक नहीं मिली। इन मुद्दों में तीन तलाक का मुदद् भी शामिल था। इसके अलावा कालेश्वरम नेशनल प्रोजेक्ट और एफआरबीएम का मुद्दा भी था। ऐसे तीन चार मामले हुए जब टीआरएस सदस्यों को संसद में सिर झुकाना पड़ा।

इससे पहले टीआरएस के सदस्य दो-तीन साल सासद में अच्छा काम कर रहे थे। लेकिन फिर राज्य सरकार के रवैये में बदलाव हो गया। राज्य सरकार हमें संसद के लिए बोलती कुछ थी और तेलंगाना में कुछ और होता था।

केटीआर और कविता जी के बारे में आप क्या कहना चाहते हैं।

दोनों बहुत स्मार्ट हैं। दोनों को नॉलेज है, अच्छे वक्ता हैं, बात कर सकते हैं, लेकिन राजनीतिक में सिर्फ इससे काम नहीं चलता। लोगों का दिल पहचानना चाहिए, वे लोगों का दिल नहीं पहचान सके। लेकिन अगर लोगों का दिल पहचानना सीखें तो आगे उनका भविष्य हो सकता है।

केटीआर और कविता का व्यवहार कैसा है। आप लोगों के साथ कैसे बात करते थे।

बातचीत में वे व्यवहार कुशल हैं। लोगों को सम्मान देकर बात करते हैं। लेकिन कथनी और करनी में फर्क है। ज्यादातर समय उनसे बात करना मुश्किल होता है। उनतक पहुंचना पहुंच मुश्किल है। उनका पीएस तक उपलब्ध नहीं होता। जब उनकी मर्जी होती है तो हम लोगों से मिलते हैं, लेकिन हमारी मर्जी से वे कभी हमसे नहीं मिलते।

केसीआर इस बार अगर चुनाव जीते तो केटीआर को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, ऐसी खबरें हैं। क्या यह सच है।

अंदर की बात किसी को नहीं मालूम है। लेकिन राजनीतिक और सोशल सर्किल में यह चर्चा है कि अगला सीएम केटीआर बनने वाला है। चुनाव जीतकर केसीआर सरकार बनाएंगे और बेटे को पहले केयरटेकर सीएम बनाएंगे, और फिर बाद में पूरा जिम्मा उन्हें दे देंगे। मुझे भी लगता है कि अगर टीआरएस जीतती है तो शायद उनकी यही योजना होगी।

आप अपना कारोबार और राजनीति दोनों में सामंजस्य कैसे बिठाते हैं।

सौभाग्य से मेरा बेटा है और वह भी इंजीनियर है, अभी हाल में उसकी शादी हुई है। मेरा ज्यादातर कारोबार इंजीनियरिंग से जुड़ा है। मैं जब राजनीति में आया तो मैंने मोटे तौर पर खुद को कारोबार से अलग कर लिया था। मैं कुछ क्षेत्रों में रिसर्च कर रहा था जो मेरी अपनी रुचि के हिसाब से है, मैं कुछ नए पेटेंट पर काम कर रहा था। उसे मुझे ही जारी रखना होगा, क्योंकि कोई दूसरा उसे नहीं कर सकता। बाकी सारे कारोबार को मैंने प्रोफेशनल्स के हाथों में दे दिया है, और अब मेरा बेटा भी कारोबार के देखेगा। ज्यादातर कंपनियों से मैं इस्तीफा दे चुका है, सिर्फ कुछ पुरानी एकाध कंपनी में ही मैं डायरेक्टर हूं। अब मेरा 90 फीसदी फोकस लोगों की भलाई की राजनीति में है। और सिर्फ 10 फीसदी ही रिसर्च पर है।

इस रिसर्च के पूरा होने पर मेरा 100 फीसदी ध्यान राजनीति पर होगा। मैं अपने इंजीनियरिंग बैकग्राउंड को राजनीति में इस्तेमाल करता हूं। जैसे मुझे लगता है कि बायोगैस हमारी ईंधन की जरूरतों को पूरा कर सकता है। इससे बायो फर्टिलाइज़र्स बन सकते हैं। गांवों में रोजगार पैदा हो सकता है। इससे यूरिया पर हमारी निर्भरता कम हो सकती है। मैं ऐसा प्लांट लगाने की कोशिश कर रहा हूं कि सिर्फ एक परिवार नहीं बल्कि पूरा गांव एलपीजी छोड़कर बायोगैस का इस्तेमाल करना शुरु कर दे।

मेरी दिलचस्पी वॉटर स्पोर्ट्स में है। मैं विखाराबाद में वाटर स्पोर्ट्स शुरु करने की योजना बना रहा हूं। इससे 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलेगा।

आपकी तरह क्या टीआरएस को और भी बड़े नेता टीआरएस छोड़ना चाहते हैं।

मैं सीनियर नहीं हूं। मैंने हाल ही में राजनीति शुरु की है। मुझसे बडे और सीनियर बहुत से लोग हैं। सबके सब असंतुष्ट हैं। बहुत से लोग टीआरएस से बाहर आना चाहते हैं, बस समय और अवसर का इंतज़ार कर रहे हैं। वे विधानसभा चुनाव के बाद फैसला लेंगे। अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो उनके लिए फैसला लेना आसान होगा। उनके मुताबिक मैंने रिस्क लेकर पार्टी छोड़ी है।

तेलंगाना बनने के बाद राज्य की कमान केसीआर के हाथों में आई। लोगों को उनसे बहुत उम्मीदें थी, लेकिन वे नाकाम हो गए। आखिर क्यों।

बहुत सारी उम्मीदें थी, कि तेलंगाना बनेगा तो लोगों की जिंदगी बेहतर होगी। बहुत सारी समस्याएं थीं, और सबसे बड़ी समस्या थी कि तेलंगाना में रोजगार मिलना मुश्किल था। यह समस्या सिर्फ युवाओं की ही नहीं है, बल्कि पूरे परिवार की समस्या है। क्योंकि घर में युवा है और बेरोजगार है तो पूरा परिवार दुखी होता है। एक तो केसीआर ने नए रोजगार पैदा नहीं किए, और जो रोजगार और नौकरियां थी, उनमें भर्तियां नहीं कीं। इसके अलावा तेलंगाना ने 2 लाख करोड़ का कर्ज ले लिया। फिर यह पैसा कहां गया। न नौकरियां मिलीं, न वेतन में यह पैसा गया, यह पैसा बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में गया। वह भी प्राथमिकता है, लेकिन पहली प्राथमिकता नहीं है। केसीआर ने पहली प्राथमिकता को आखिरी प्राथमिकता बना दिया। तेलंगाना अमीर राज्य है, उसके लोगों को समस्या से दो-चार कर दिया। सरकार लोगों से दूर हो गई, और लोगों की समस्या सुनना बंद कर दी। मुख्यमंत्री सिर्फ लोगों से ही दूर नहीं हुए, लोगों को प्रतिनिधि से भी दूर हो गए। बहुत सारे विधायक उनसे मिलने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे नहीं मिलते। इस सबके कारण टीआरएस की जो मूल विचारधारा थी, वह बदल गई। इसकी नीति पहले लोगों के हित के लिए थी, अब जनविरोधी हो गई है।

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