सरकारी दावों की निकली हवा! श्रमिकों से 630 की जगह लिया 710 रुपये ट्रेन किराया, 24 घंटे के सफर में बस एक बार दी खिचड़ी

सोमवार की देर रात साबरमती से जौनपुर पहुंची ट्रेन के यात्रियों ने किराया माफी के सरकारी दावों को खारिज कर दिया। मजदूरों ने बताया कि उनसे अहमदाबाद से जौनपुर की यात्रा के लिए 710 रुपए लिए गए है, जबकि टिकट 630 रुपए का है।

फोटो : सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

कोरोना लॉकडाउन के चलते अलग अलग राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों को घर लाने के लिए भले ही सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई हो, लेकिन उस ट्रेन से आम दिनों की तरह ही मजदूरों को घर जाना पड़ रहा है, यानी जैसे अमूमन किराया वो देते हैं ऐसे ही मौजूदा स्थिति में देना पड़ रहा है। पिछले दो दिनों से अलग-अलग टीवी चैनलों पर सरकार के नुमाइंदों द्वारा चीख-चीख कर ये कहा जा रहा है कि ये किराया मजदूरों से नहीं वसूला जा रहा है बल्कि इसमें कुछ प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकारें दे रही है और कुछ प्रतिशत केंद्र, लेकिन चीखने चिल्लाने से गलत सही तो नहीं हो जाएगा ना.. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सरकार के द्वारा जो भी दावे किए जा रहे हैं खोखले साबित हो रहे हैं।

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इसका ताजा उदाहरण गुजरात के साबरमती से जौनपुर के बीच यात्रा कर रहे मजदूरों का है। दरअसल, लॉकडाउन के चलते दूसरे प्रदेशों में फंसे प्रवासी श्रमिकों को वापस लाने के लिए स्पेशल ट्रेन चलाई गई है। सोमवार की देर रात साबरमती से जौनपुर पहुंची ट्रेन के यात्रियों ने किराया माफी के सरकारी दावों को खारिज कर दिया। मजदूरों ने बताया कि उनसे अहमदाबाद से जौनपुर की यात्रा के लिए 710 रुपए लिए गए है, जबकि टिकट 630 रुपए का है। मजदूरों ने बताया कि इसमें से 60 रुपए रास्ते में खाना-पानी के लिए लिए थे, लेकिन 24 घंटे के सफर में उन्हें एक बार खिचड़ी और दो बोतल पानी ही दिया गया। ट्रेन का टिकट 630 रुपए का है, जबकि यात्रियों से 710 रुपए लिए गए। उन्हें यह बताया गया था कि बाकी पैसे से रास्ते में खाने की व्यवस्था होगी। हालांकि यात्रा की तमाम दुश्वारियों के बावजूद यात्रियों में इस बात का सुकून था कि वह अपने घर लौट रहे हैं।


जानकारी के मुताबिक ट्रेन में सर्वाधिक 165 यात्री जौनपुर के थे। इनके अलावा अमेठी, प्रतापगढ़, गोरखपुर, जालौन, औरैया के मजदूरों की संख्या भी अधिक रही। आठ यात्री बिहार और एमपी के सवार थे। स्पेशल ट्रेन से यात्रा करने वाले मजदूरों ने लॉकडाउन के कारण परदेश में होने की दुश्वारियों का जिक्र किया तो उनके गले रुआंसे हो गए। कई यात्रियों के पास ट्रेन का किराया चुकाने को भी पैसे नहीं थे। अन्य सहयोगियों से उधार लेकर उन्होंने ट्रेन का टिकट खरीदा। एक हिंदी वेबसाइट की माने तो औरैया निवासी सर्वेश कुमार ने बताया कि अहमदाबाद में फैक्ट्री बंद होने के बाद कमरे के अंदर कैद होकर रह गए थे। जेब में जो भी पैसे थे, वह धीरे-धीरे खत्म हो गए। लग रहा था कि अब यहीं जिंदगी खत्म हो जाएगी।

वहीं सुमित ने बताया कि 710 रुपए में ट्रेन का टिकट खरीदा है। जेब में यही पैसे ही बचे थे। अब यहां तक आ गए, आगे की कोई चिंता नहीं। सीधे घर नहीं जाएंगे, जिससे घर वालों में संक्रमण की आशंका बने। डोभी के अर्पित पटेल ने बताया कि ट्रेन के किराए में भी 60 रुपए रास्ते मे खाने और पानी के लिए भी लिया गया था, मगर भोजन के नाम पर सिर्फ एक बार खिचड़ी मिली। दिहाड़ी मजदूर पिंटू ने बताया कि काम जब तक चालू था तब तक सेठ ने उनका ख्याल रखा। लॉक डाउन होने के बाद हमारे हाल पर छोड़ दिया।

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