मां गंगा को भी दिया मोदी सरकार ने धोखा, स्वच्छ करने के नाम पर फूंके करोड़ों, लेकिन पहले से और मैली हो गई गंगा

बड़ी बात ये है कि गंगा को निर्मल रखने को की जा रही आंकड़ों की बाजीगरी पर जानते-बूझते हुए सभी जिम्मेदारों ने न सिर्फ चुप्पी साध रखा है, बल्कि ऐसा करने वालों की हां में हां मिला रहे हैं। यह स्थिति आपसी मिलीभगत के किसी बड़े खेल की ओर साफ इशारा कर रही है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

गंगा को निर्मल बनाने के तमाम प्रयासों की कलई उत्तराखंड में ही निकल जाती है। केंद्र और राज्य सरकार आंकड़ों की बाजीगरी कर देश को धोखा दे रही हैं। अकेले हरिद्वार-ऋषिकेश में ही निर्मल गंगा का दावा आंकड़ों की बाजीगरी की भेंट चढ़ गया है। सरकारी संस्थाएं गंगा में गिर रहे नालों की टैपिंग कर गंगा की निर्मलता का दावा तो कर रही हैं, लेकिन स्याह हकीकत यह है कि आज भी नालों और सीवरेज की गंदगी सीधे गंगा में ही जा रही है।

पहले यह गंदगी सीधे गंगा में जाती थी, अब इसे सीवरेज के पानी के साथ सरकारी खर्चे पर गंगा में डाला जा रहा। क्योंकि टैपिंग के नाम पर अधिकतर नालों को शहर के सीवरेज से जोड़ा दिया गया है। ऋषिकेश-हरिद्वार में एसटीपी (सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट) की क्षमता रोजाना निकलने वाले सीवरेज जल के आधे की भी ट्रीटमेंट करने की नहीं है, ऐसे में नालों के पानी सहित सीवरेज जल को भारी-भरकम सरकारी खर्च पर बिना किसी ट्रीटमेंट के निर्मल गंगा के दावों के साथ सीधे गंगा में बहा दिया जा रहा है।

बड़ी बात यह है कि गंगा को निर्मल रखने को की जा रही कागजों की इस बाजीगरी को जानते-बूझते और समझते हुए भी सभी जिम्मेदार न चुप्पी साधे हुए हैं, बल्कि ऐसा करने वालों की हां में हां मिलाने में लगे हुए हैं। यह स्थिति आपसी मिलीभगत के किसी बड़े खेल की ओर साफ इशारा कर रही है। कान को घुमाकर पकड़ने के इस खेल ने हरिद्वार में निर्मल गंगा के सरकारी प्लान को ही फेल कर दिया है। यहीं तक कि संसदीय समिति भी इसपर मुहर लगा चुकी है।

हरिद्वार की बात करें तो 45 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) सीवरेज जल और 27 छोटे-बड़े नाले का 35 एमएलडी गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे गंगा में डाला जा रहा है। इससे गंगा में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। पूर्व में संसदीय समिति भी इस बात को स्वीकार कर चुकी है। एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल), केंद्र सरकार और राज्य सरकार भी इस स्थिति पर आपत्ति और चिंता जता चुके हैं और अभी भी जता रहे हैं।

गंगा को गंदा कर रहे धर्मनगरी के 27 में से 22 नालों को पूर्ण या आंशिक रूप से टैप किए जाने का दावा निर्माण और अनुरक्षण इकाई 'गंगा' करती है। इस हिसाब से उसके अनुसार ही बाकी के पांच बड़े नालों का पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। खास बात यह है कि सरकारी दावों में टैप किए गए 22 नालों को पंपिंग स्टेशन के जरिए सीवरेज से जोड़ा गया है, जिससे उनका पानी गंगा में सीधे न जाकर सीवरेज पंपिंग स्टेशन को जाता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार हरिद्वार में रोजाना 110 एमएलडी सीवरेज जल का उत्सर्जन होता है, जिसमें इन नालों का पानी भी शामिल है, जबकि यहां पर सीवरेज जल के ट्रीटमेंट को स्थापित तीन एसटीपी की कुल क्षमता मात्र 63 एमएलडी ही है। ऐसे में बाकी का 47 एमएलडी पानी बिना किसी ट्रीटमेंट-शोधन के सरकारी खर्चे पर सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।

इसके विपरीत जिम्मेदार सरकारी विभाग आंकड़ों की बाजीगरी कर कागजों में 22 नालों की टैपिंग दिखा गंगा में इनका पानी न जाने देने का दावा कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में स्थिति जस की तस बनी हुई है और लगभग यही स्थिति ऋषिकेश की भी है। यहां पर ऋषिकेश, पौड़ी और टिहरी को लगने वाले क्षेत्र के 45 नालों और निकलने वाले सीवरेज जल के शोधन की पुख्ता व्यवस्था ही नहीं है।

खुले में गंगा में गिर रहे नालों की गंदगी का वायरल वीडियो तमाम मौकों पर सरकार की किरकिरी करा चुका है। इसके बावजूद निर्मल गंगा के सरकारी दावों में कहीं कोई कमी नहीं आई। ऋषिकेश से ऊपर देवप्रयाग जहां अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी तीनों के मिलने से गंगा अपने स्वरूप में आती है, के अलावा रूद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में भी यही हाल है। यानि, निर्मल गंगा के दावे सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी में हैं। आस्था की प्रतीक मोक्षदायिनी गंगा अब भी मैली की मैली ही है, पहले यह लोगों की गलती से मैली हो रही थी, अब पैसे फूंककर तैयार की गई सरकारी व्यवस्था के तहत।

(नवजीवन के लिए ज्योति एस की रिपोर्ट)

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