आयुष्मान भारत योजनाः कैसा आयुष्मान भारत, जब इलाज न होने पर मरीज चाहे इच्छामृत्यु

मोदी सरकार ने काफी शोर-शराबे के साथ जिस आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत की थी, उसका भी वही हाल हुआ जो इस सरकार की अन्य योजनाओं का हुआ है। इलाज और भुगतान की प्रक्रिया पर भ्रम की वजह से अस्पताल मरीजों से कन्नी काट रहे हैं और आम लोगों को कोई फायदा नहीं हो रहा।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

पिछले साल बड़े जोर-शोर से आयुष्मान भारत योजना जब लॉंच की गई, तो इसे ‘मोदी केयर’ कहा गया। लेकिन इस योजना का भी वही हाल हुआ जो मोदी सरकार की दूसरी तमाम योजनाओं का हुआ है। यानी आधी-अधूरी तैयारी के कारण इसका फायदा लोगों को नहीं हो रहा है। अभी इलाज और इलाज के बाद भुगतान कैसे होगा, इसकी प्रक्रिया को लेकर तमाम भ्रम हैं जिसके कारण निजी अस्पताल इससे कन्नी काट रहे हैं। नवजीवन देशभर में इस योजना की स्थिति पर एक विशेष रिपोर्ट की श्रंखला चला रहा है, जिसकी दूसरी कड़ी में आज झारखंड और मध्यप्रदेश में इस योजना की जमीनी हकीकत से हम पाठकों को रूबरू करा रहे हैं।

झारखंडः कैसा आयुष्मान भारत, जब इलाज न होने पर मरीज चाहे इच्छामृत्यु

तीन बच्चों के पिताआरिफ अंसारी अब मौत चाहते हैं। वे यह जानने की कोशिश में लगे हैं कि इच्छामृत्यु की इजाजत के लिए क्या प्रक्रियाअपनानी पड़ती है। क्योंकि, वे स्वस्थन हीं हो पा रहे और अब उनके पास इलाज कराने के पैसे नहीं हैं। करंट लगने के कारण वह दो महीने से बीमार हैं। शुरू में तो स्वस्थ होने की इच्छा थी, लेकिन उनका इलाज करने के लिए कोई अस्पताल तैयार नहीं हुआ। इंदिराआवास योजना के तहत बने एक मकान में अपने बच्चों, पत्नी और मां-पिता के साथ रह रहे आरिफ की मां ने इन दो महीनों के दौरान अपने सारे जेवर बेच दिए लेकिन आरिफ अंसारी स्वस्थ नहीं हो सके। अब वे हताश हैं। आयुष्मान योजना का कोई लाभ उन्हें नहीं मिल सका। उन्होंने बड़ी उम्मीद से अपना गोल्डन कार्ड बनवाया था। वह झारखंड के सिंघानी गांव में रहते हैं। यह चतरा जिले के पत्थलगड़ा प्रखंड का हिस्साहै। उन्होंने अपने इलाज के लिए हजारीबाग, चतरा और रांची के कई अस्पतालों के चक्कर काटे। स्वस्थ नहीं हुए और पैसे भी खत्म हो गए तो उन्हें गांव वापस लौट जाना पड़ा।

आरिफ के पिता अब्दुल गफूर ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे के इलाज के लिए आधा दर्जन अस्पतालों के चक्कर काटे। गोल्डन कार्ड का हवाला दिया लेकिन किसी भी निजी अस्पताल ने भर्ती नहीं किया। तब वह झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) पहुंचे। यहां पहले तो आरिफ को एडमिट कर लिया गया। पांच दिनों तक इलाज चला। इसके बाद डॉक्टरों ने यह कहकर छुट्टी दे दी किअब वह ठीक हो जाएंगे। घर लौटने के बाद आरिफ की हालत दोबारा खराब हो गई। तब घरवाले उन्हें लेकर फिर रिम्स गए, लेकिन इस बार उन्हें भर्ती नहीं किया गया। पैसे थे नहीं, जो निजी अस्पताल ले जा सकें। सो, अब्दुल गफूर बेटे को लेकर घर लौट आए। अब गांव के लोग उनके स्वस्थ होने की दुआ कर रहे हैं। पत्थलगड़ा के प्रखंड प्रमुख धनुषधारी राम ने कहा किआरिफ के ममाले के उजागर होने के बाद लोगों का आयुष्मान भारत योजना से भरोसा टूटने लगा है, क्योंकि बड़े अस्पताल अपनी मनमानी चला रहे हैं।

भक्तु रविदास का दर्द

सितंबर 2018 में योजनाके शुरू होने के कुछ ही दिन बाद जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेमोरियल अस्पताल (एमजीएम) में भर्ती एक महिला काइलाज करने से डॉक्टरों ने इसलिए मनाकर दिया था किउनके पास आयुष्मान योजना का कार्ड नहीं था। कहा गया कि पहले गोल्डन कार्ड बनवाए। लिहाजा, भक्तु रविदास अपनी मां को वहीं वार्ड में छोड़कर गोल्डन कार्ड बनवाने गए। भक्तु के कार्ड बनवाकर लौटने से पहले ही उस महिला की मौत हो गई। हताश भक्तु ने अस्पताल में ही उस गोल्डन कार्ड को फाड़कर फेंक दिया था। भक्तु रविदास आज भी उस दिन को याद कर रोने लगते हैं। उनका मानना है किसरकार सिर्फ दिखावे के लिए काम कर रही है। अगर वह सचमुच गरीबों का भला करना चाहती तो उसकी मां जिंदा होतीं।

बात दरअसल सिर्फ आरिफ अंसारी या भक्तु रविदास की नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब आयुष्मान भारत योजना का लाभ गरीबों को नहीं मिल पाया है। इससे खफा झारखंडके स्वास्थ्य सचिव नितिन मदन कुलकर्णी ने सभी सिविल सर्जनों को पत्र लिखकर इसे सुनिश्चित कराने को कहा है। उन्होंने कहा है कि इस योजना के क्रियान्वयन के लिए बनी एडवाइजरी कमेटी की मीटिंग होने वाली है। इससे पहले सारी व्यवस्थाएं सुधार ली जाएं।

इसके उलट झारखंड के 100 से अधिक निजी अस्पतालों ने इस योजना के तहत अपना इम्पैलनमेंट ही नहीं कराया है। इनमें मेदांता समेत रांची के 35 अस्पताल शामिल हैं। वहीं, रांची के एक अस्पताल ने अपना नाम सूचीबद्ध कराने के बाद अब इससे अलग होने काआवेदन दिया है। रांची स्थित हिल व्यू हॉस्पिटल की प्रबंध निदेशक डॉ. नितेश प्रियाने तर्क दिया कि इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण उनका अस्पताल आयुष्मान भारत योजना के तहत आने वाले मरीजों के इलाज में खुद को अक्षम महसूस कर रहा है। रांची के सिविल सर्जन डॉ. विजय बिहारी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि विभाग ने अभी इसपर कोई निर्णय नहीं लिया है।

सरकारी दावा और हकीकत

इस बीच मुख्यमंत्री रघुवर दास ने दावा किया है कि उनकी सरकार ने 57 लाख परिवारों का स्वास्थ्य बीमा इस योजनाके तहत कराया है। सरकारी दावे के मुताबिक 23 सितंबर से दिसंबर तक राज्य के करीब 18,000 मरीजों का इलाज आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत किया गया। वहीं, जानकारों का कहना है कि सरकार ने इंश्योरेंस कंपनी के पास 57 लाख परिवारों का प्रीमियम तो जमा करा दिया लेकिन इनका इलाज कहां और कैसे होगा इसकी समुचित व्यवस्था नहीं की। इस कारण लोग इसका समुचित लाभ नहीं ले पा रहे हैं।

मध्य प्रदेश में निजी अस्पतालों ने योजना से बनाई दूरी, गरीब मरीजों की आई आफत

पिछले साल 23 से शुरू हुई मोदी सरकार की फ्लैगशिप 'आयुष्मान भारत योजना’ यानी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना मध्यप्रदेश के गरीब मरीजों के लिए परेशानी का सबब बन गई है। उन्हें इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। दरअसल, इस योजना में विभिन्न बीमारियों के इलाज के पैकेज रेट्स इतने कम हैं कि निजी अस्पताल योजना में शामिल होने से बच रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार प्रदेश में अब तक सिर्फ 67 निजी अस्पताल ही इस योजना में शामिल हुए हैं। रही-सही कसर राज्य की तत्कालीन बीजेपी सरकार की एक शर्त ने पूरी कर दी है। सरकार ने शर्त रखी थी कि एनएबीएच से मान्यता प्राप्तअस्पताल ही योजना के लिए सूचीबद्ध हो सकेंगे। प्रदेश में ऐसे निजी अस्पतालों की संख्या सिर्फ 80 है, जबकि निजी अस्पतालों की संख्या एक हजार से ज्यादा है। केंद्र सरकार की ओर से जारी गाइडलाइन में कहा गया है कि राज्य सरकार एनएबीएच संबद्ध अस्पतालों को इलाज के लिए तय पैकेज रेट से 15 प्रतिशत ज्यादा राशि दे सकती है, लेकिन राज्य सरकार ऐसा नहीं कर रही थी और इस कारण निजी अस्पताल योजना में रुचि नहीं दिखा रहे। सरकारी अस्पतालों में न तो इलाज की पर्याप्त सुविधा है और न ही विशेषज्ञ डॉक्टर। आयुष्मान भारत योजना शुरू होने के बाद सवा तीन महीने में इस योजना के तहत 11 हजार 171 मरीजों को इलाज किया गया है।

आयुष्मान भारत योजना लागू होने के साथ ही मध्य प्रदेश राज्य बीमारी सहायता निधि योजना को इसमें मर्ज कर दिया गया है। इस योजना में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों को 25 हजार से दो लाख तक की वित्तीय सहायता दी जाती थी। एक लाख रुपये तक राशि मंजूर करने का अधिकार कलक्टर को और 2 लाख रुपये तक काअधिकार संभाग आयुक्त को था। इस योजना में बड़ी संख्या में गरीब मरीजों को आसानी से इलाज उपलब्ध हो जाता था, लेकिन योजना बंद होने से वे परेशान हैं।

आयुष्मान भारत योजना में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों को कैशलेस इलाज का प्रावधान है। मध्य प्रदेश में करीब 77 लाख बीपीएल परिवार हैं। सरकार ने योजना में असंगठित श्रमिक और लघु किसान परिवारों को भी जोड़ लिया है। इससे प्रदेश के करीब एक करोड़ परिवार योजना के दायरे में आ गए। खास बात यह है कि प्रदेश में सिर्फ 196 सरकारी और निजी अस्पताल इस योजनाके लिए इम्पैनल्ड हैं। इन एक करोड़ परिवारों को योजना के अंतर्गत इलाज के लिए इन्हीं अस्पतालों पर निर्भर रहना होगा। इस सूची के तमाम सरकारी अस्पतालों की स्थिति यह है कि वहां सामान्य बीमारी के इलाज की भी सुविधा नहीं है। ऐसे में समझा जा सकता है कि गंभीर बीमारियों के इलाज का क्या होता होगा।

मरीजों के स्वास्थ्य से नहीं खेल सकते

राजधानी के निजी चिरायु मेडिकल ने करीब दो महीने पहले योजना में रजिस्ट्रेशन तो करायाहै, लेकिन इसके तहत अब तक इक्का-दुक्का मरीजों का ही इलाज किया। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों का कहना है कि इस योजना में सामान्य बीमारी जैसे प्रोस्टेट, हर्निया, एपेंडिक्स आदि का इलाज निजी अस्पतालों में नहीं कराने का प्रावधान है। इन बीमारियों का इलाज सरकारी अस्पतालों में ही कराना होगा, लेकिन लोगों का भरोसा सरकारी अस्पतालों पर नहीं है, यही वजह है कि योजना सफल नहीं हो रही है। गंभीर बीमारियों की बात करें तो उनके पैकेज रेट्स इतने कम हैं कि उस रेट में इलाज करना संभव नहीं है। हम मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं कर सकते, चाहे वह अमीर हों या गरीब। यही वजह है कि हम चाहकर भी मरीजों का इलाज नहीं कर रहे हैं। अन्य प्राइवेट अस्पतालों का भी यही हाल है।

संगठन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

भले ही बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव में सभी सीटें जीतने की बात कह रहा है, लेकिन चुनाव में हार के बाद प्रदेश संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। चुनाव में हार के लिए प्रदेश संगठन को जिम्मेदार माना जा रहा है। यही वजह है कि केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश संगठन से नाखुश है। जल्द ही संगठन में फेरबदल किए जाने के आसार हैं। दरअसल, मध्य प्रदेश में चुनाव से 6 महीने पहले ही प्रदेश अध्यक्ष को बदला गया था। अप्रैल में नंद कुमार सिंह चौहान को हटाकर राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। पार्टी का यह फैसला गलत साबित हुआ। इससे पहले की राकेश सिंह पार्टी नेताओं और प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को ठीक से समझ पाते चुनाव आ गया। चुनाव में पार्टी के बागियों को नहीं मना पानाऔर भितरघात प्रदेश संगठन की बड़ी चूक मानी जा रही है। केंद्रीय नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी खुशनहीं है। यही वजह है कि केंद्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री चौहान की प्रस्तावित आभार यात्रा पर ब्रेक लगा दिया था। चुनाव परिणाम आने के बाद चौहान ने मीडिया से चर्चा में कहा था कि वे जल्द ही रीवा से आभार यात्रा शुरू करेंगे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की मनाही के बाद शिवराज को यात्रा निरस्त करना पड़ा।

(झारखंड से रवि प्रकाश और मध्य प्रदेश से रुकमणि सिंह की रिपोर्ट)

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