स्वतंत्रता सेनानियों की तीसरी पीढ़ी के लिए भी आरक्षण, इसलिए भी है जरूरी क्योंकि...

शुरुआती दौर में स्वतंत्रता सेनानी के रुप में 1 लाख 73 हजार परिवारों की पहचान की गई थी। स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना प्रति माह दो सौ रुपये से 1972 में शुरु की गई थी तब केन्द्र में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं।

फोटो: सोशल मीडिया
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अनिल चमड़िया

सरकारी नौकरियों में जाति, क्षेत्र, लिंग, शारीरिक कमजोरी आदि के आधार पर आरक्षण देने का संवैधानिक प्रावधान है। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रावधान करने से पहले विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण के प्रावधान के पीछे एक सामान बात यह देखने को मिलती है कि उस वर्ग के साथ इतिहास में सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार किस तरह का रहा है। गैर बराबरी के आधार पर विकसित हुए समाज में उन वर्गों के साथ भेदभाव वाला व्यवहार रहा है या सामाजिक कारणों से पिछड़ेपन के शिकार हुए हैं। इसीलिए देश में सामाजिक- राजनीतिक पीड़ित वर्गों की अगली पीढ़ियों के लिए सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर देने की व्यवस्था करने का सिद्धांत अपनाया गया। इसी सिद्धांत के तहत सरकारी नौकरियों में एक विशिष्ट वर्ग को शामिल किया गया जिसे स्वतंत्रता सेनानी के रुप में जाना जाता है।

स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को समानता की स्थिति में लाने के लिए सुविधा और विशेष अवसर स्वतंत्रता सेनानियों यानी भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के लिए जिन राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लड़ाईयां लड़ी, जेल गए, उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया गया है। स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा ब्रिटिश सत्ता के साथ गोवा को पुतर्गाली सत्ता से मुक्त कराने और हैदराबाद का संघर्ष एवं आईएनए में शामिल सदस्यों को भी प्राप्त है। भारत की नई सरकार ने उन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रति माह पेंशन देने और अन्य तरह की सुविधाएं देने की भी व्यवस्था की है। शुरुआती दौर में स्वतंत्रता सेनानी के रुप में 1 लाख 73 हजार परिवारों की पहचान की गई थी। स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना प्रति माह दो सौ रुपये से 1972 में शुरु की गई थी तब केन्द्र में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं।


यहां तक कि स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार के सदस्यों ने अखिल भारतीय स्तर पर अपना संगठन बना लिया है और समाज एवं सरकार से विभिन्न तरह की सुविधाएं और रियायत की मांग करती है और सरकार उनपर गौर भी करती है। अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी परिवार कल्याण परिषद के नेता नित्यानंद शर्मा बताते हैं कि बिहार, पंजाब, उतराखंड, हरियाणा और असम की राज्य सरकारों ने स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार के लिए आवाज उठाने वाले संगठनों को मान्यता दी है। केन्द्र सरकार ने किसी संगठन को मान्यता नहीं दी है। राज्य सरकारों ने स्वतंत्रता सेनानी के परिवार जनों को अलग से पहचान पत्र भी जारी किए हैं। केन्द्र और राज्यों में गृह मंत्रालयों में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए विभाग भी स्थापित किए गए है।

एक पीढ़ी का सामाजिक राजनीतिक स्तर पर पिछड़ने और समानता की स्थिति में लाने के रास्ते लेकिन पिछली जितनी पीढ़ियां सामाजिक–राजनीतिक दुर्व्यवहार की शिकार रही है इसका प्रभाव उतना ही अगली पीढ़ियों तक गहरा होता जाता है। यदि भारत को ब्रिटिश सत्ता से मुक्त कराने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ियों के साथ यही सिद्धांत स्वीकार किया गया है। इसीलिए उनकी तीसरी पीढ़ी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। पेंशन योजना में भी स्वतंत्रता सेनानियों की परिवार पर आश्रित बेटियों को शामिल किया गया था।

बिहार में केन्द्रीय चयन परिषद ने पुलिस के सिपाही संवर्ग में जिला पुलिस / बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस / अन्य इकाईयों में रिक्त पदों पर पुरुष एवं महिला उम्मीदवारों की सीधी नियुक्ति कर रही है जिसके लिए आवेदन देने की अंतिम तारीख 20 जुलाई 2023 थी। पुलिस के लिए 21,391 नागरिकों की भर्ती की जाएगी।


इनमें विभिन्न आधारों पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसमें सामान्य प्रशासन विभाग के संकल्प संख्या - 13185, दिनांक 03.09.2015 के अनुसार बिहार राज्य के वैसे स्वतंत्रता सेनानियों, जिन्हें केन्द्र सरकार द्वारा पेंशन स्वीकृत है, के पोता/पोती नाती/नतीनी के लिए नियुक्ति में 2 (दो) प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का प्रावधान लागू किया गया है। इस पृष्ठभूमि के सफल आवेदकों के बारे में यह स्पष्ट किया गया है कि स्वतंत्रता सेनानी परिवार की पृष्ठभूमि के चयनित उम्मीदवार जिस आरक्षित / गैर आरक्षित वर्ग से संबंधित होंगे, उनकी गिनती उसी आरक्षित/गैर आरक्षित वर्ग में की जायेगी।

बिहार पुलिस में सिपाही संवर्ग के 21391 पदों के लिए होने वाली नियुक्तियों में स्वतंत्रता सेनानी पृष्ठभूमि के आवेदकों के लिए 428 पद आरक्षित किए गए हैं। नित्यानंद शर्मा का कहना है कि स्वतंत्रता के बाद देश के संसाधनों में स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की हिस्सेदारी होनी चाहिए। स्वतंत्रता सेनानियों की तीसरी पीढ़ी के लिए आरक्षण का समाज में स्वागत किया गया है।

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