‘सौभाग्य’ योजनाः झारखंड का हाल, गांव तो गांव राजधानी रांची में भी लोग करते रहते हैं बिजली का इंतेजार

मोदी सरकार ने जब बड़े-बड़े नारों के साथ ‘सौभाग्य’ योजना की घोषणा की थी तो लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब उनके घरों में भी रौशनी पहुंचेगी। लेकिन इस योजना का झारखंड में हाल ये है कि गांव तो गांव राजधानी रांची में भी लोग बिजली की बाट जोहते रहते हैं।

रवि प्रकाश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब घर-घर बिजली पहुंचाने का सपना दिखाते हुए अपनी महत्वाकांक्षी योजना 'सौभाग्य' की घोषणा की तो लोगों के मन में उम्मीद जगी कि अब उन्हें बिजली नसीब होगी। अब सरकार का दावा है कि हर घर में बिजली देने का सौ फीसदी लक्ष्य पा लिया गया है। लेकिन सच्चाई यह है कि जमीन पर इस योजना का भी वही हाल है जो मोदी सरकार की अन्य बड़ी योजनाओं का है। जमीनी सच्चाई ये है कि कई जगहों पर बिजली के खंभे नहीं डाले गए और कई जगह खंभे तो लग गए, लेकिन तार नहीं डाले और यहां तक की कई जगहों पर खंभे और तार तो पहुंच गए, लेकिन बिजली नहीं आती। इस योजना की जमीनी हकीकत से पाठकों को रूबरू कराने के लिए नवजीवन एक श्रंखला चला रहा है, जिसकी इस कड़ी में आज झारखंड में योजना का हाल बयान किया जा रहा है।

झारखंड में ‘सौभाग्य’ का हालः बिजली के लिए राजधानी के लोग भी करते हैं इंतेजार

रंग-बिरंगी फाइलों में गुंथे सफेद कागजों पर अंकित काले शब्द कहते हैं कि झारखंड में अब कहीं अंधेरा नहीं है। बीजेपी शासित इस राज्य के सभी गांवों में बिजली आ गई है। सभी घरों में बल्ब जल रहे हैं। लेकिन, ऐसी ही एक फाइल में लगे कागजों की चुगली है कि झारखंड के कुल 3597 स्वास्थ्य उपकेंद्रो (हेल्थ सब सेंटर्स) में से 3100 में बिजली नहीं है।

ऐसे अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों का इलाज टार्च की रोशनी में होता है या फिर उन्हें किसी बड़े अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है। ऐसे स्वास्थ्य-उपकेंद्र सिर्फ रेफरल अस्पताल की भूमिका निभा रहे हैं। वजह है बिजली का न होना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महात्वाकांक्षी सौभाग्य योजना की झारखंड में यही हकीकत है।

राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास के जिम्मे बिजली मंत्रालय का भी काम है। उनका दावा है कि 31 दिसंबर, 2018 तक राज्य के सभी गांवों का विद्युतीकरण कर दिया गया, सौभाग्य योजना के कारण गांवों में लोग लालटेन या ढिबरी की जगह बल्ब की रोशनी में जिंदगी गुजार रहे हैं। लेकिन, उन्हीं का मंत्रालय यह नहीं बता पाता कि जब सारे काम इतनी तेजी से हुए तो राज्य में बिजली आपूर्ति का काम देख रही दो कंपनियों में से एक आईएल एंड एफएस का ठेका क्यों रद्द कर दिया गया?

सरकार का यह भी दावा है कि साल 2022 तक झारखंड बतौर पावर हब अपनी पहचान बना लेगा। फिलहाल झारखंड के कुल 29,376 गांवों के संपूर्ण विद्युतीकरण का दावा किया जा रहा है। लेकिन, मुख्यमंत्री के ही जनसंवाद केंद्र में संथाल परगना प्रमंडल के एक गांव बागडुबी (जिला-दुमका) के ग्रामीणों ने बिजली नहीं होने को लेकर अपनी शिकायत दर्ज करवाई है। अभी इसकी जांच की जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके गांव में बिजली के पोल और नए तार तो टांग दिए गए लेकिन आपूर्ति शुरू नहीं की गई।

जनसंवाद केंद्र के अधिकारियों ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया है कि जल्दी ही उस गांव में बिजली आपूर्ति करवा दी जाएगी। संथाल परगना इलाके के ही पश्चिम बंगाल से सटे रानेश्वर प्रखंड के एक गांव के लोगों की शिकायत है कि उनके यहां पिछले छह-सात साल से बिजली नहीं है। इसके बावजूद उनके पास भारी-भरकम बिजली का बिल भेज दिया गया। ग्रामीणों के विरोध और शिकायत के बाद इस बिल को निरस्त कर दिया गया।

इस बीच, सरकार का दावा है कि 10 अक्टूबर, 2017 से 4 अक्टूबर, 2018 के दरम्यान 9 लाख 46 हजार 167 घरों में बिजली के नए कनेक्शन दिए गए। यही वह समय है जब सौभाग्य योजना लागू की गई थी। हालांकि, दिसंबर 2017 में इस योजना की झारखंड मे विधिवत लांचिंग के वक्त मुख्यमंत्री रघुवर दास ने घोषणा की थी कि साल 2018 की दीवाली तक झारखंड के सभी घरों में बिजली के बल्ब जलने लगेंगे। तब उन्होंने कहा था कि अगर उनकी सरकार ऐसा नहीं कर सकी, तो वह दोबारा वोट मांगने नहीं आएंगे। हकीकत यह है कि दीवाली तक झारखंड के सिर्फ चार जिलों (रांची, धनबाद, बोकारो और रामगढ़) में ही सौ प्रतिशत विद्युतीकरण हो सका था।

पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने इसपर चुटकी लेते हुए ट्वीट किया था कि अगर मुख्यमंत्री को उनका वादा याद नहीं हो तो हम याद दिला देते हैं। आप वोट मांगने किस मुंह से आएंगे? हेमंत सोरेन के इस ट्वीट के सैकड़ों री-ट्वीट हुए और बिजली के मुद्दे पर सरकार को किरकिरी झेलनी पड़ी। जाहिर है, 2018 की दीवाली पर झारखंड के करीब सात लाख घर अंधेरे में रहे। इस बीच, सरकार ने दावा किया कि उसने 2525 ऐसे गांवों में भी बिजली पहुंचा दी, जहां आजादी के बाद से आजतक कभी बिजली नहीं आई थी।

दरअसल, सरकारी दावों और हकीकत के बीच बड़ा फासला है। गांवों की बात छोड़िए, राजधानी रांची में भी बिजली आपूर्ति की स्थिति ठीक नहीं है। राज्य में मौजूद पावर प्लांट्स की कई यूनिट ठप हैं और अल्ट्रा मेगा पावर प्लांट्स की हालत खस्ता है। सरकार भी मानती है कि पतरातू में निर्माणाधीन पावर प्लांट के पूरा होने में कम से कम दो साल लगेंगे।

तेनुघाट स्थित टीवीएनएल के विस्तारीकरण का काम अभी शुरू ही नहीं किया जा सका है। पावर फॉर आल के लिए बने 14,000 करोड़ रुपये के एक्शन प्लान को इस साल पूरा कर लिया जाना है लेकिन यह काम पूरा होगा, इसपर संदेह के पुख्ता कारण हैं। एक्शन प्लान के मुताबिक साल 2019 मे 24 घंटे बिजली के लिए झारखंड में 5696 मेगावाट बिजली की जरूरत है, लेकिन झारखंड मे विद्युत उत्पादन की वर्तमान क्षमता सिर्फ 3255 मेगावाट ही है।

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