DPDP कानून को चुनौती देने वाली DNPA की याचिका पर केंद्र को नोटिस, खोजी पत्रकारिता पर असर को लेकर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने DPDP कानून और नियमों को चुनौती देने वाली DNPA की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया है। याचिका में खोजी पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आजादी पर असर की आशंका जताई गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन कानून को चुनौती देने वाली DNPA की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया।
DNPA का कहना है कि कानून सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित कर सकता है।
याचिका में आशंका जताई गई है कि कानून से खोजी पत्रकारिता और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने मामले की सुनवाई की।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मंगलवार को अदालत ने इस कानून और इससे जुड़े नियमों को चुनौती देने वाली डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर नोटिस जारी किया। DNPA ने आशंका जताई है कि कानून का असर पत्रकारों की खोजी रिपोर्टिंग और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलीलें पेश कीं।
DNPA ने कानून को क्यों दी चुनौती?
DNPA का कहना है कि डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन कानून संविधान के तहत मिले सूचना के अधिकार और बोलने व अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकारों को सीमित कर सकता है। संगठन ने कानून के साथ-साथ इससे जुड़े नियमों को भी चुनौती दी है।
याचिका में आशंका जताई गई है कि इस कानून के कारण पत्रकारों के लिए गड़बड़ियों और गलत कामों की जांच करना मुश्किल हो सकता है। इससे उन खबरों की रिपोर्टिंग प्रभावित होने का खतरा है, जिनमें सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की पड़ताल की जाती है।
खोजी पत्रकारिता और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा का सवाल
DNPA के मुताबिक, कानून का असर खोजी पत्रकारिता पर पड़ सकता है। संगठन ने गोपनीय सूत्रों की पहचान सुरक्षित रखने को लेकर भी चिंता जताई है। पत्रकारों के लिए कई मामलों में सूत्रों की पहचान गोपनीय रखना रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा होता है।
अब सुप्रीम कोर्ट में इस चुनौती पर आगे की सुनवाई होगी। केंद्र सरकार को नोटिस जारी होने के बाद मामले में उसका पक्ष सामने आएगा। याचिका का प्रमुख सवाल यह है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों का पत्रकारिता और मौलिक अधिकारों पर क्या असर पड़ सकता है।
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