‘शाहीन बाग’ के साथ खड़ा है पूरा पंजाब, कलाकारों-लेखकों-किसानों ने दिल्ली से पंजाब तक खोला मोर्चा

शाहीन बाग से लौटे पंजाब के कई बुद्धिजीवियों और आला दर्जे के कलाकारों से बातचीत में पता चलता है कि इन दिनों पंजाबी समाज का एक बड़ा तबका बढ़ती असहिष्णुता से किस कदर चिंतित है और वह किसी भी कीमत पर देश के परंपरागत अमन-सद्भाव को अपने तईं बचाना चाहता है।

फोटोः अमरीक
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अमरीक

शाहीन बाग से पंजाब का रिश्ता साहित्य, संगीत और कला-संस्कृति के स्तर पर भी गहरा जुड़ रहा है। किसानों के साथ-साथ बुद्धिजीवी, साहित्यकार और संगीत से जुड़ी नामवर शख्सियतें शाहीन बाग जाकर संशोधित नागरिकता कानून (सीएएए) के खिलाफ जारी आंदोलन में शिरकत कर रही हैं। लोकतंत्र में विरोध का प्रतीक बन चुका शाहीन बाग पंजाब के लिए भी नया इतिहास रचने का अवसर बन गया है। फासीवाद के खिलाफ प्रतिरोध के ऐसे पुरजोर स्वर पंजाब से पहली बार उठ रहे हैं।

शाहीन बाग से शिरकत करके लौटे पंजाब के प्रमुख बुद्धिजीवियों और आला दर्जे के गीत-संगीत कलाकारों से बातचीत में पता चलता है कि इन दिनों पंजाबी समाज का एक बड़ा तबका बढ़ती असहिष्णुता से किस कदर चिंतित है। सूबे में रोज नागरिकता संशोधन कानून और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ लगने वाले मोर्चे और होने वाले सेमिनार भी इसकी गवाही शिद्दत से देते हैं। यह पंजाब का नया मोर्चा है, जो किसी भी कीमत पर देश के परंपरागत अमन-सद्भाव को अपने तईं बचाना चाहता है, जबकि खुद पंजाबी समाज बेशुमार जटिल समस्याओं से जूझ रहा है।

बीते 4 फरवरी को प्रगतिशील लेखक संघ की पंजाब इकाई का एक प्रतिनिधिमंडल शाहीन बाग गया था। विश्व स्तर पर गुरबाणी और उम्दा सूफी गायन के लिए ख्यात और अति सम्मानित मदन गोपाल सिंह भी साथ गए थे। मदन गोपाल सिंह के शाहीन बाग जाते ही वहां मंगलवार की रात 10:30 बजे से लगभग 1:00 बजे तक सूफी गायकी और गुरबाणी की 'चार यार' महफिल सजी।मदन गोपाल सिंह की गायन मंडली को 'चार यार' के नाम से इसलिए जाना जाता है कि इसमें उनके अलावा तबला वादक अमजद खान, गिटार वादक दीपक कैस्टोरीनो और सरोद वादक प्रीतम घोषाल हैं। यह 'चार यार' मंडली देश और सुदूर विदेशों में अपने नायाब संगीत की जादुई प्रस्तुतियां देती है।

4 फरवरी की रात 'चार यार' मंडली ने शाहीन बाग को अपने संगीत से सराबोर किया। वहां उस वक्त मौजूद संदीप कौर बाजवा के मुताबिक जब 'चार यार' मंडली ने सुर बिखेरे तो माहौल आम दिनों से अलहदा हो गया। लगभग ढाई घंटे के उस कार्यक्रम में कबीर, रूमी, बुल्ले शाह, अमीर खुसरो, फैज अहमद फैज और भरखरी हरि के कलाम सुनाए गए। यह शाहीन बाग के लिए तो अनूठा अनुभव था ही, खुद 'चार यार' और मदन गोपाल सिंह के लिए भी जिंदगी का एक विलक्षण अनुभव था।

खुद मदन गोपाल सिंह की जुबानी 4 फरवरी की रात शाहीन बाग के उनके अनुभव जानिए: "शाहीन बाग का माहौल एकदम अलग था। ऐसा जज्बा मैंने अन्यत्र नहीं देखा। उस माहौल में नई किसम की ऊर्जा है। वे श्रोता साधारण श्रोता नहीं थे। ऐसे नहीं थे, जो किसी गायक को श्रद्धा भाव से सुन रहे हों। वे हमारी गायकी का हिस्सा बन गए थे। वहां जज्बों का समुद्र बह रहा था। हम सोच कर कुछ और गए थे पर हुआ कुछ और। वहां जाकर हमें महसूस हुआ कि हमें अपने लोक-जज्बे में से पुराने गीत, काफिया और श्लोक सुनाने चाहिए, जिनसे लोक-जज्बा सशक्त हो।”

“फिर हमने बुल्ले शाह की काफिया सुनाईं और एक अन्य काफी 'होरी (होली) खेलूंगी कह बिस्मिल्लाह' सुनाया। हमने लोगों को बताया कि कैसे पंजाब का यह शायर बिस्मिल्लाह कहकर होली मनाते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता को शानदार अभिव्यक्ति देता है। हमने उन्हें अमीर खुसरो का 'आज रंग है री' भी सुनाया। मुझे गायन का ऐसा आनंद इससे पहले पाकिस्तान में बाबा बुल्ले शाह की मजार पर ग्रामीण लोगों की मौजूदगी में आया था, जब लोग झूमकर 'तेरा शाह मेरा शाह बुल्ले शाह' गाने लगे थे।”

“मशहूर गांधीवादी निर्मला देशपांडे भी उस शाम वहां थीं। शाहीन बाग में 'चार यारों' ने भरखरी हरि के संस्कृत शिलांग गाए, जिनमें बताया गया है कि नफरत करने वालों के पास न विद्या होती है, न तप; ऐसे लोगों के पास नम्रता, धर्म या अन्य कोई मानवीय गुण भी नहीं होते। शाहीन बाग में हमने फैज की नज़्म 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे' गाई तो लोग बहुत जोश में आ गए। इसी तरह हम चारों यारों ने कबीर का शबद 'आनंद मंगल गाओ मेरी सजनी... प्रभात बीत गई रजनी' गाई। इस पर भी लोग झूमने लगे और हमारे साथ गाने लगे। उन्हें लगा कि रजनी (रात) बीत गई है और प्रभात आने वाली है। शाहीन बाग में प्रस्तुति देना मेरे लिए जीवन भर का अद्भुत अनुभव रहेगा।"

मदन गोपाल सिंह आगे बताते हैं कि मंगलवार की रात शाहीन बाग में शुभा मुद्गल, कुशा कपिला, नवीन, मूंगफली बैंड सहित अन्य गायन मंडलियों ने भी प्रतिरोध की आवाज को बुलंद किया। चार फरवरी की ऐतिहासिक संगीत प्रस्तुतियों को यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया पर डाला जा रहा है।

अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव डॉ सुखदेव सिंह सिरसा ने बताया कि लेखक संघ की पंजाब इकाई का एक प्रतिनिधिमंडल शाहीन बाग गया था। कुछ और लेखक भी वहां जा रहे हैं। वहां गुरशरण सिंह के नुक्कड़ नाटकों, पाश, संतराम उदासी और लाल सिंह दिल की कविताओं/गीतों की प्रस्तुति की जाएगी। सिरसा के मुताबिक विदेशों में बसे भारतीय प्रगतिशील बुद्धिजीवी और साहित्यकार भी नागरिकता संशोधन विधेयक और बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं।

पंजाब में प्रगतिशील लेखक संघ बुद्धिजीवियों को एकजुट करके शहर दर शहर सीएए के खिलाफ बड़े सेमिनार और अन्य समागम कर रहा है। बुधवार को जालंधर, पटियाला, लुधियाना, अमृतसर, चंडीगढ़, मानसा और बठिंडा में बुद्धिजीवी और साहित्यकारों ने सीएए और असहिष्णुता के खिलाफ प्रतिरोधी सेमिनार किए। पंजाब के प्रमुख लेखक और सांस्कृतिक संगठनों ने 16 फरवरी को मलेरकोटला में सीएए के खिलाफ प्रस्तावित विशाल समागम में सक्रिय हिस्सेदारी करने का फैसला किया है।

उधर, 5 फरवरी को शाहीन बाग आंदोलन में शिरकत के लिए दिल्ली गए पंजाब के किसान संगठनों के कुछ प्रतिनिधियों को दिल्ली पुलिस द्वारा जबरन रोकने और शाहीन बाग न जाने देने के लिए अपनाए गए हथकंडों के खिलाफ राज्य भर में बुधवार को रोष प्रदर्शन किए गए। बड़ी तादाद में किसानों और आम लोगों ने इनमें शिरकत की। सूबे में मोदी सरकार की अर्थीयां फूंकी गईं। इस मौके पर हर जगह 'इंकलाब-जिंदाबाद. फासीवाद मुर्दाबाद', 'कहीं लड़ांगे साथी' (पाश की कविता की पंक्तियां) के नारे गूंजे।

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