महागठबंधन की संभावना से डरी बीजेपी, उत्तर प्रदेश को चार छोटे राज्यों में बांटने पर कर रही है विचार

उत्तर प्रदेश को चार छोटे राज्यों में बांटने पर बीजेपी कर रही है विचार

बीजेपी के रणनीतिकार यूपी को चार हिस्सों में विभाजित करना चाहते हैं ताकि दो मकसद पूरे हो सकें। पहला, यह महागठबंधन की ताकत को कम कर देगा। दूसरा, मतदाताओं के साथ-साथ विपक्षी पार्टियों का भी ध्यान असली मुद्दों से हट जाएगा।

बीजेपी द्वारा शासित राज्य के राज्यपाल के साथ बंद कमरे में हुई एक मुलाकात में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यह स्वीकार किया कि अगर कांग्रेस, बीएसपी और समाजवादी पार्टी का महागठबंधन अगले लोकसभा चुनाव में हो जाता है तो बीजेपी बुरी तरह पराजित हो जाएगी। बीजेपी में बड़े स्तर के एक सूत्र ने बताया कि पार्टी में चाणक्य के तौर पर समझे जाने वाले शाह मुलाकात के दौरान थोड़े चिंतित दिखे। खबर है कि शाह ने राज्यपाल के सामने स्वीकार किया, “दो अंकों का आंकड़ा पार करना भी पार्टी के लिए मुश्किल होगा। पार्टी को 2 से 8 के बीच सीटें मिलेंगी।” राज्यपाल ने पूछा, “फिर आगे का रास्ता क्या है?” राज्यपाल बनने से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी का आधार बढ़ाने के लिए उन्हें बहुत श्रेय जाता है। कुछ सप्ताह बाद एक केंद्रीय मंत्री ने इसका जवाब दिया जिन्हें बीजेपी में बहुत मजबूत और उभरता हुआ जाट नेता माना जाता है। दिल्ली के अपने ऑफिस में जुलाई के आखिरी सप्ताह में कुछ चुनिंदा लोगों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी और केंद्र सरकार महागठबंधन का मुकाबला करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रही है। मंत्री जी की टिप्पणी थी कि बीजेपी के लिए सबसे अच्छा विकल्प यह है कि उत्तर प्रदेश को चार भागों में विभाजित कर दिया जाए। उस बैठक में शामिल एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, “उन्होंने आगे स्वीकार किया कि जमीन पर बढ़ता असंतोष 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की संभावनाओं पर बुरा असर डालेगा।” मंत्री जी ने यह भी बताया कि बीजेपी का पैतृक संगठन आरएसएस भी उत्तर प्रदेश को विभाजित करने के विचार का समर्थन कर रहा है।

भविष्य का नक्शा

छोटे राज्य बनाने के अपने इरादे को आगे बढ़ाते हुए 2014 के अपने चुनावी घोषणा-पत्र में भी बीजेपी ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को समझने पर महत्व दिया था। घोषणा-पत्र के एक हिस्से में पार्टी ने छोटे राज्यों के गठन के जरिये अत्यधिक विकेन्द्रीकरण के लिए एक राय बनाने की कोशिश की थी। उसके अनुसार, “उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में विभाजित किया जाएगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश हरित प्रदेश के नाम से जाना जाएगा और उसकी राजधानी मेरठ होगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश पूर्वांचल में तब्दील किया जाएगा और उसकी राजधानी इलाहाबाद होगी। लखनऊ केंद्रीय उत्तर प्रदेश या अवध प्रदेश की राजधानी होगी और विभाजन के बाद दक्षिणी उत्तर प्रदेश बुंदेलखंड के नाम से जाना जाएगा और झांसी उसकी राजधानी होगी।”

बीजेपी का तर्क और उम्मीद

छोटे राज्यों के लिए बीजेपी का दांव अटल-आडवाणी-जोशी की त्रयी में 90 के दशक में ही शुरू हो गया था, जब बीजेपी ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। बीजेपी के इस सिद्धांत का उन लोगों पर जबरदस्त असर हुआ जो लंबे समय से देश के कई हिस्सों में पृथक राज्य की मांग कर रहे थे। जब बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में एनडीए सरकार बनाई तो उन्होंने तीन छोटे राज्यों उत्तराखंड, छतीसगढ़ और झारखंड के गठन को मंजूरी दे दी जिन्हें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार से अलग किया जाना था। हालांकि, इसकी औपचारिकता 1999 में एनडीए के सत्ता में वापस आने के बाद ही पूरी हुई। तीन छोटे राज्यों के गठन के फैसला बीजेपी की चुनावी संभावना में एक बड़ा कदम साबित हुआ क्योंकि विभाजन के बाद तीनों राज्यों में बीजेपी सबसे ताकतवर पार्टी बनकर उभरी और बाद में सरकारें भी बनाईं। तीन में से दो राज्यों में बीजेपी एक दशक से भी ज्यादा समय से सत्ता में है। मंत्री जी के अनुसार, इस पुराने प्रयोग से सबक लेते हुए पार्टी के रणनीतिकार यूपी को चार हिस्सों में विभाजित करना चाहते हैं ताकि दो मकसद पूरे हो सकें: पहला, यह महागठबंधन की ताकत को कम कर देगा। दूसरा, मतदाताओं के साथ-साथ विपक्षी पार्टियों का भी ध्यान असली मुद्दों से हट जाएगा। बीजेपी सूत्र के अनुसार, पार्टी उच्च नेतृत्व मतलब पीएम मोदी और अध्यक्ष अमित शाह भी इस राय से इत्तेफाक रखते हैं। उनका विश्वास है कि यह प्रस्तावित कदम कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा। इसके अलावा आरएलडी, अपना दल और पीस पार्टी जैसी छोटी पार्टियां या तो राजनीतिक रूप से खत्म हो जाएंगी या फिर उनसे उनकी शर्तों पर गठबंधन करने के लिए मजबूर हो जाएंगी। उन्होंने कहा, “बीजेपी को लगता है कि विभाजन के बाद बीएसपी और समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों का वहीं हाल होगा जो आरजेडी का बिहार में हुआ था।” बिहार के विभाजन के बाद आरजेडी ने झारखंड में अपना जनाधार खो दिया और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने बिहार में अपना जनाधार गंवा दिया, जबकि बीजेपी ने दोनों राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली जो उस समय तक बहुत बड़ी ताकत नहीं थी। उसी तरह आंध्र प्रदेश में टीडीपी और टीआरएस का वही हाल हुआ। आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद तेलुगु देशम पार्टी सिर्फ आंध्र प्रदेश की पार्टी बनकर रह गई और तेलंगाना राष्ट्र समिति तेलंगाना की सीमाओं में सिमटकर रह गई। और बीजेपी दोनों राज्यों में एक क्षेत्रीय ताकत बनकर उभरी।

क्या समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान होगा?

बीजेपी के आकलन के मुताबिक, समाजवादी पार्टी महागठबंधन का सबसे बड़ा दल है और यूपी में बीजेपी के विकास में सबसे बड़ी बाधा भी है। उसे राज्य के विभाजन से सबसे ज्यादा नुकसान होगा। 1992 में मुलायम सिंह यादव द्वारा गठित समाजवादी पार्टी चार बार यूपी में सत्ता पर काबिज हो चुकी है – पहली बार 1989 में और फिर 1993, 2003 और 2012 में। इसमें मुस्लिम-यादव समर्थन आधार की सबसे ब़ड़ी भूमिका रही। प्रदेश के 12 फीसदी यादवों और 20 फीसदी मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद समाजवादी पार्टी के लिए वोट किया था। बीजेपी के रणनीतिकारों का यह मानना है कि भौगोलिक विभाजन से प्रदेश की राजनीति का भी विभाजन हो जाएगा और पूर्वांचल के यादव हरित प्रदेश (पश्चिमी यूपी) के यादव के लिए वोट नहीं करेंगे। बीजेपी को लगता है कि यादव वोट बैंक पर मुलायम परिवार की कड़ी पकड़ विभाजन के बाद कमजोर पड़ जाएगी।

समाजवादी पार्टी के जातीय जनाधार को खत्म करने के लिए बीजेपी दो स्तरीय रणनीति पर काम कर रही थी: पहला, पार्टी ने गैर-यादव ओबीसी जातियों से आने वाले नेताओं को तैयार किया और आगे बढ़ाया और जमीन पर यादव-विरोधी अकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन किया। दूसरा, इसने अपने यादव नेताओं को तैयार किया जो चुनावी लड़ाई में मुलायम परिवार को आड़े हाथों लेने के लिए तैयार थे। बीजेपी की योजना से अवगत समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने पूरी योजना को अप्रभावी बताते हुए कहा, “विभाजन के बाद भी अगर समाजवादी पार्टी, बीएसपी और कांग्रेस गठबंधन करती है तो आने वाले चुनावों में बीजेपी को मुंह की खानी पड़ेगी।”

मायावती के दलित जनाधार के लिए खतरनाक?

बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि चार हिस्सों में उत्तर प्रदेश का विभाजन अब तक संगठित दलित वोट बैंक को भी विभाजित कर देगा। लंबे समय से दलित वोट बैंक पर बीजेपी की नजर है, जो राज्य के कुल वोटों का 20-22 फीसदी है। पहला, आरएसएस की देख-रेख में दलितों के हिंदुकरण के जरिये कई सालों में बीजेपी ने एक गैर-सेकुलर दलित वोट बैंक तैयार किया है। और फिर दलित समुदाय के भीतर जाटव बनाम गैर-जाटव विभाजन पैदा कर उदित राज जैसे शहरी चेहरों को बढ़ावा देकर बीजेपी पहले ही बीएसपी के चुनावी क्षेत्र में दखल बना चुकी है। बीजेपी के उच्च नेतृत्व को लगता है कि प्रस्तावित विभाजन के बाद बीएसपी काफी सिकुड़ जाएगी, और शायद एक गैर-महत्वपूर्ण जातीय जनाधार के साथ एक उप-क्षेत्रीय दल बनकर बुंदेलखंड और पूर्वांचल तक सिमट जाए। एक आरएसएस कार्यकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “आरएसएस को लगता है कि जाटव बनाम गैर-जाटव विभाजन पैदा कर बीजेपी ने सफलतापूर्वक मायावती की राजनीतिक जमीन के ठीक-ठाक हिस्से को झटक लिया है (आंकड़ों के अनुसार, लगभग 45 फीसदी गैर-जाटवों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए वोट किया)। आंकड़े बताते हैं कि गैर-जाटवों के समर्थन ने 2014 में बीजेपी की सफलता में बड़ी भूमिका निभाई। बीजेपी नेता राज्य का विभाजन इसे हमेशा के लिए पक्का कर लेना चाहते हैं।

अमेठी तक सीमित हो जाएगी कांग्रेस?

एक राष्ट्रीय नेता और खासतौर से मोदी के विकल्प के तौर पर उभरे राहुल गांधी बीजेपी की जहरीली राजनीति का काट हैं और इससे बीजेपी तिलमिला गई है। बीजेपी को लगता है कि चार छोटे राज्यों को बनाकर वह यूपी में राहुल गांधी के बढ़ते प्रभाव को भी रोक सकती है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने इस मसले पर अभी तक कोई राय नहीं बनाई है। जब एक कांग्रेस नेता से पूछा गया तो उनका जवाब था, “हम इंतजार करेंगे और देखेंगे कि वे क्या घोषणा करते हैं। हमे अभी से चिंता क्यों करनी चाहिए?”

कुछ कांग्रेस नेताओं की अलग राय है: “कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसे इस प्रस्तावित विभाजन से फायदा होगा। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनावों में हुई जीत ने पहले से ही हमारी पार्टी के पक्ष में पलड़ा झुका दिया है।”

जाटों की धरती पर क्या आरएलडी खत्म हो जाएगी?

जाट पार्टी के तौर पर पहचानी जाने वाली राष्ट्रीय लोक दल पश्चिमी यूपी की एक मुख्य पार्टी है। एक समय में पार्टी को जाट समुदाय का काफी समर्थन प्राप्त था जो उस इलाके के कुल वोट का 27-30 फीसदी है। लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक लहर पर सवार बीजेपी जाट वोटों के एक बड़े हिस्से को आरएलडी से छीन लेने में कामयाब रही। हालांकि हालिया कैराना उपचुनाव में बीजेपी को शर्मनाक हार झेलनी पड़ी, फिर भी बीजेपी के विचारकों को लगता है कि उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद आरएलडी कतई बीजेपी की शक्ति के सामने टिक नहीं पाएगी और क्षेत्र में एक महत्वहीन पार्टी बनकर रह जाएगी। ऐसी स्थिति में जाट वोट बैंक राजनीतिक विकल्प के अभाव में बीजेपी के पाले में आ जाएगा।

एक आरएलडी नेता ने कहा, “हम जमीन पर उनकी ताकत से मुकाबला नहीं कर सकते। उनके पैसे, ताकत और गोलबंदी की क्षमता की बराबरी नहीं की जा सकती। साथ में वे राष्ट्रीय पार्टी भी हैं। वे मतदाताओं को बड़े सपने बेच सकते हैं। इसके अलावा उन्होंने सफलतापूर्वक किसानों में हमारे जनाधार को हिंदू और मुसलमान में बांट दिया है। निश्चित रूप से विभाजन का उन्हें फायदा होगा।” उन्होंने जोड़ा कि महागठबंधन होने की स्थिति में 2014 की सफलता को बीजेपी दोहरा नहीं पाएगी।

संविधान क्या कहता है?

संविधान की धारा 3 नए राज्यों के गठन और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रफल, सीमाओं और नाम में बदलाव के बारे में बात करती है। यह धारा संसद को पुराने राज्यों को विभाजित कर नए राज्य बनाने का अधिकार देती है। लेकिन, इस मामले में संसद की भूमिका बाद में आती है। केंद्रीय कैबिनेट पहले राष्ट्रपति को इसका प्रस्ताव भेजती है जो उस प्रस्ताव को संबंधित विधानसभा को भेजते हैं। विधानसभा और राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाने के बाद विधेयक को चर्चा के लिए लोकसभा और राज्यसभा के सामने रखा जाता है और इसे साधारण बहुमत से पास कराया जा सकता है। आमतौर पर, विधेयकों को चर्चा के लिए पहले संसद के सामने रखा जाता है और फिर उसे मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, लेकिन इस मामले में यह उल्टा है।

अंबेडकर की किताब

उत्तर प्रदेश के विभाजन का विचार काफी पुराना है, लगभग उतना ही पुराना जितनी पुरानी हमारी आजादी है। संभावित राजनीतिक फायदों को ध्यान में रखकर पार्टियों ने समय-समय इस विचार को हवा दी है। कई लोगों को लगता है कि बीएसपी प्रमुख मायावती ने पहली बार बेहतर प्रशासन के मकसद से यूपी को चार छोटे राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह विचार 1955 में ही आ गया था जब बीआर अंबेडकर ने अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन लिंगुस्टिक स्टेट्स’ में यूपी को तीन राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा था। फिर, दो दशकों बाद, 70 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री और चमत्कारी जाट नेता चौधरी चरण सिंह ने इस विचार को सामने रखा और उत्तर प्रदेश से अलग एक हरित प्रदेश बनाने की मांग की।

80 और 90 के दशक में समाजवादी पार्टी के उभार के साथ यह मांग पीछे चली गई। 2012 में एक बार फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने केंद्र को यह प्रस्ताव भेजा लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। सूत्रों के अनुसार, यह अजीब है कि बीजेपी में कई वरिष्ठ नेताओं को यह डर है कि यह विचार बीजेपी को उल्टा नुकसान पहुंचा सकता है। बीजेपी पर निगाह रखने वाले एक विश्लेषक की भाषा में साफ-साफ कहें तो, “राफेल घोटाले, जीएसटी-नोटबंदी और दलित-मुसलमानों के उभार ने यूपी को विभाजित करने के इरादे या निकट भविष्य में ऐसा कोई कारनामा करने से बीजेपी को रोक रखा है। लेकिन 2019 के चुनाव से पहले अगर स्थिति आती है तो वह इस जुए को खेलने से हिचकिचाएगी नहीं।”

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