FIR पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक, गिरफ्तार छात्रों को रिहा करने के निर्देश, प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

वकीलों की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि विरोध कर रहे नीट छात्रों पर पुलिस की ज्यादतियों से जुड़े सभी आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है।

गिरफ्तार छात्रों को रिहा करने के निर्देश, केंद्र और 7 राज्यों को नोटिस, प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत
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कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शनों से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने पैलेट गन के इस्तेमाल, इलेक्ट्रिक बैटन, गंभीर रूप से घायल प्रदर्शनकारियों, वकीलों और मीडिया कर्मियों पर हमलों जैसे मुद्दों का उल्लेख किया। प्रदर्शनकारियों को कोर्ट से राहत मिली है। FIR पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी गई है और साथ ही केंद्र समेत 7 राज्यों को नोटिस जारी किया गया है।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सभी मामलों में लगभग समान मुद्दे सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि याचिकाओं में पैलेट गन के इस्तेमाल से एक 19 वर्षीय युवक की आंखों की रोशनी जाने, इलेक्ट्रिक बैटन के कथित उपयोग, एक युवती के गंभीर रूप से घायल होकर आईसीयू में भर्ती होने, वकीलों के साथ मारपीट और एक पत्रकार पर हमले जैसे आरोप शामिल हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इन मामलों पर लंबी बहस की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि विवाद का मूल मुद्दा स्पष्ट है। उन्होंने यह भी दोहराया कि छात्र अपनी मांगो को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और शांतिपूर्ण विरोध करना मौलिक अधिकार है। 


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालिया छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की सभी घटनाओं की निष्पक्ष, पारदर्शी और गहन जांच सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘निर्धारित प्रोटोकॉल’ का उल्लंघन होने पर कानून को अपना काम करना चाहिए।

सुनवाई के शुरुआत में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की सदस्यता वाली पीठ ने सवाल किया कि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जिस किसी ने भी ज्यादती की है या कानून अपने हाथ में लिया है, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।’’

वकीलों की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि विरोध कर रहे नीट छात्रों पर पुलिस की ज्यादतियों से जुड़े सभी आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है।

पीठ ने कहा, ‘‘अगर तय प्रोटोकॉल का उल्लंघन होता है, तो कानून को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए।’’ प्रधान न्यायाधीश सूयकांत ने कहा कि पीठ सभी आरोपों की स्वतंत्र, पारदर्शी और गहन जांच कराने पर विचार कर रही है।

अदालत ने कहा कि 250 पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों की भी जांच होनी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि ये हमले छात्रों ने किए थे या कुछ ‘‘उपद्रवी तत्वों’’ ने।

सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि छात्र पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा में शामिल नहीं होंगे, लेकिन कुछ उपद्रवी इन घटनाओं में संलिप्त हैं। उन्होंने कहा कि हत्या, दुष्कर्म और एनडीपीएस मामलों में वांछित उपद्रवी विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए और उन्होंने पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा की।


साथ ही कोर्ट ने उन छात्र प्रदर्शनकारियों को रिहा करने का निर्देश दिया, जिनकी उम्र 18 साल से कम है और जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।

शीर्ष अदालत ने अधिकारियों से यह भी कहा कि वे नीट प्रश्नपत्र लीक को लेकर हाल में देश भर में हुए आंदोलन से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूत संभालकर रखें।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादती के आरोपों की पहली नजर में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की बर्बरता का आरोप लगाने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, शीर्ष अदालत ने कई अंतरिम निर्देश जारी किए।

पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना भी शामिल थे। पीठ ने उन सभी राज्यों को सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-कैमरा फुटेज, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड, पीसीआर लॉग और प्रदर्शन से जुड़े दूसरे डिजिटल सबूत संभालकर रखने का निर्देश दिया जहां प्रदर्शन हुए थे।

उसने यह भी आदेश दिया कि प्रदर्शनकारियों से संबंधित इकट्ठा किया गया कोई भी डिजिटल डेटा संभालकर रखा जाए, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया जाए।

पीठ ने अधिकारियों को प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कोई भी बलपूर्वक कार्रवाई करने से रोक दिया और कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को सुरक्षा नहीं मिलेगी।


पीठ ने दिल्ली सरकार को दर्ज प्राथमिकियों के मामले में जांच जारी रखने की इजाजत दी, लेकिन कहा कि कार्रवाई लंबित रहने तक प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ बलपूर्वक कोई कार्रवाई न की जाए।

पीठ ने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों पर दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, केरल, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों से भी जवाब मांगा।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘आरोपों की पहली नजर में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच पर विचार करने की जरूरत है, जिसमें 200 से ज्यादा घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की चिंताओं को भी दूर किया जाना चाहिए।’’

पीठ ने कहा कि केंद्र और संबंधित राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की सभी घटनाओं की निष्पक्ष, पारदर्शी और पूरी जांच सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र समिति या विशेष जांच दल बनाने पर विचार करने से पहले अपने बयान रिकॉर्ड पर रखें।

शुरुआत में, अदालत ने पूछा कि पुलिस की ज्यादती के आरोपों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘‘जिसने भी ज्यादती की, कानून अपने हाथ में लिया, उसे सजा मिलनी चाहिए।’’

पीटीआई के इनपुट के साथ

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