संघ से जुड़े इस संस्थान को नहीं मिले मन-मिजाज पर शोध करने वाले एक भी छात्र, मान्यता मिले बीत गए 5 साल

आरएसएस की विचारधारा को प्रचारित करने वाले संस्थान के रूप में जाने जाने वाले रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी को पिछले पांच साल में राजनीति शास्त्र में पीएचडी और एमए (शोध) करने के लिए एक भी छात्र नहीं मिला।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया
user

नवीन कुमार

आरएसएस की विचारधारा को प्रचारित करने वाले संस्थान के रूप में जाने जाने वाले रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी को पिछले पांच साल में राजनीति शास्त्र में पीएचडी और एमए (शोध) करने के लिए एक भी छात्र नहीं मिला। मुंबई से सटे भायंदर के इस संस्थान को इस कोर्स के लिए अक्तूबर, 2015 में मान्यता मिली थी। इसके लिए इसे मुंबई यूनिवर्सिटी से संबद्ध किया गया ताकि छात्रों को पीएचडी और एमए का प्रमाणपत्र इसी यूनिवर्सिटी से मिले। पांच साल के दौरान यहां से पीएचडी या एमए करने के लिए एक भी छात्र ने अपना पंजीयन नहीं कराया।

वैसे, यह मान्यता उसे मिली ही इसलिए थी कि तब महाराष्ट्र में बीजेपी की देवेंद्र फडणवीस सरकार थी। मुंबई यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉ. संजय देशमुख ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी क्योंकि वह प्रबोधिनी के शोध विभाग के निदेशक पद पर भी थे। इस पद पर एक साल रहने के बाद प्रबोधिनी को मान्यता मिली और मुंबई यूनिवर्सिटी से संबद्ध किया गया। यह कहने की जरूरत नहीं है कि डॉ. देशमुख आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित रहे हैं। वैसे, इस संस्थान को मुंबई यूनिवर्सिटी से संबद्ध करने पर तब भी सवाल उठाए गए थे। यूनिवर्सिटी के तत्कालीन रजिस्ट्रार एमए खान ने सफाई दी थी कि यूनिवर्सिटी के नियमों के मुताबिक ही इसे संबद्ध किया गया है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया था कि एमए के लिए नहीं बल्कि सिर्फ रिसर्च कोर्स के लिए मान्यता दी गई है। अगर यह सही है, तो सवाल यह भी उठता है कि जिस कोर्स के लिए प्रबोधिनी को मान्यता नहीं मिली थी, उसके लिए भी छात्रों से आवेदन कैसे मंगाए जा रहे थे और यूनिवर्सिटी कैसे किसी छात्र को पंजीकृत करती।


इधर प्रबोधिनी के कार्यकारी निदेशक रवींद्र साठे के मुताबिक, तीन छात्रों ने संस्थान में पंजीकरण कराया था। लेकिन इन छात्रों का यूनिवर्सिटी में पंजीकरण नहीं हो पाया। इसकी वजह यह है कि यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र विभाग के बोर्ड ऑफ स्टडीज ने चयन नहीं किया था। जबकि यूनिवर्सिटी के सूत्रों का कहना है कि इन पांच सालों के दौरान प्रबोधिनी की ओर से एक भी शोध प्रस्ताव जमा नहीं किया गया है। वैसे, संस्थान सूत्रों का कहना है कि प्रबोधिनी को तीन छात्रों से शोध प्रस्ताव मिले तो थे, पर उनके हिंदुत्ववादी विचारधारा से प्रभावित नहीं होने के कारण उसे आगे यूनिवर्सिटी को नहीं भेजने का फैसला किया गया।

वैसे, बीजेपी की पिछली फडणवीस सरकार के दौरान नागपुर यूनिवर्सिटी में आएसएस से जुड़ेविषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर भी जमकर विवाद हुआ था। इसके बाद मुंबई यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रबोधिनी में दो-दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया लेकिन उसका भी विरोध होने लगा जिस कारण इसे बीच में ही रद्द कर दिया गया था।

नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia