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उत्तर प्रदेशः चुनाव सिर पर लेकिन छुट्टा पशुओं से किसान बेहाल, सरकार की बेरुखी से नाराज

किसान मानते हैं कि सरकार की अनुचित नीतियों के कारण ये स्थिति आई है, जिससे उनकी फसल तबाह हो रही है। आवार पशुओं के कारण फसल क्षति के लिए न तो उन्हें अभी तक कोई मुआवजा मिला है और न ही उन्हें बहुचर्चित फसल बीमा योजनाओं के अंतर्गत इसकी कोई क्षतिपूर्ति हुई है।

फोटोः भारत डोगरा

भारत डोगरा

उत्तर प्रदेश के बहराईच जिले के झोपड़वा गांव (ब्लॉक केसरगंज) के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत किसान हैं। इन दिनों वे छुट्टा पशुओं द्वारा फसलों को हुई क्षति के कारण बुरी तरह तनावग्रस्त हैं। यह स्थिति सिर्फ इस गांव की नहीं है, बल्कि आसपास के अनेक गांवों की यही स्थिति है।

गांववासियों ने बताया कि पिछले कुछ समय से छुट्टा पशुओं की संख्या में आश्चर्यजनक ढंग से वृद्धि हुई है, जो पहले कभी देखी नहीं गई। इसे लोग सरकार की कुछ नीतियों से जोड़ कर देखते हैं। छुट्टा पशुओं का अर्थ वे पशु हैं, जिन्हें विभिन्न कारणों से गांववासी खुला घूमने के लिए छोड़ देते हैं। हाल के समय में क्षेत्र में देखा गया कि बड़े झुंड में ये पशु घूमते रहते हैं और मौका देखकर अपनी भूख मिटाने के लिए किसी खेत में घुस जाते हैं।

यहां के किसान बताते हैं कि इन छुट्टा पशुओं से अपने खेत बचाने के लिए सर्दी-बरसात में भी वे अपने खेत में डंडा लिए घूमते रहते हैं। लेकिन इसके बावजूद ये आवारा पशु उनके खेत चर जाते हैं। कुछ किसानों की तो आधी फसल तक इस कारण बर्बाद हो गई है।

गांववासी मानते हैं कि सरकार की अनुचित नीतियों के कारण ही ये हालात पैदा हुए जिससे उनकी इतनी फसल नष्ट हुई। फिर भी इस तरह की फसल की क्षति के लिए उन्हें न तो अभी तक कोई मुआवजा मिला है और न ही उन्हें बहुचर्चित फसल बीमा योजनाओं के अंतर्गत इसकी कोई क्षतिपूर्ति हुई है। किसान बताते हैं कि एक गोशाला आरंभ करने की घोषणा की गई और इसके लिए चंदा भी एकत्र किया गया, लेकिन यह कार्य आगे नहीं बढ़ पाया।

यह किसी एक गांव या एक पंचायत की समस्या नहीं है, बल्कि इस तरह के समाचार तो देश के अनेक भागों से मिल रहे हैं। एक तो किसान पहले ही कई कारणों से परेशान हैं, उस पर अगर उनकी फसल के एक बड़े हिस्से को छुट्टा पशु खा जाएं तो उनका संकट और बढ़ जाता है। फिर अगर चारे वाली फसलें ही नष्ट हो जाएं, तो अपने पशुओं को किसान क्या खिलाएगा? इस तरह क्षतिग्रस्त हुआ किसान भी पशु छुट्टा करने के लिए मजबूर होगा। इस तरह तो यह समस्या बढ़ती ही जाएगी।

ऐसे में इस बढ़ती समस्या के सभी पक्षों पर विचार कर कोई न्यायसंगत समाधान किया जाना बहुत जरूरी है। जो क्षति पहले ही हो चुकी है उसका मुआवजा सरकार को किसानों को देना चाहिए।

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