जिस ‘गुजरात मॉडल’ को बेचकर मोदी बने पीएम, उसकी हकीकत जानकर चौंक जाएंगे आप

13 साल तक मोदी के शासन में रहे गुजरात की हालत ये है कि आज देश की तीन नदियों का सर्वाधिक प्रदूषित हिस्सा गुजरात में है। सर्वाधिक विषाक्त कचरे के ढेर में से एक अहमदाबाद में है। अध्ययन बताते हैं कि अहमदाबाद के आसपास का भू-जल चिंताजनक रूप से दूषित हुआ है।

फोटोः सोशल मीडिया
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आर के मिश्रा

झूठ आश्चर्यजनक तेजी से फैलता है जबकि सच की ओर देखने वाला कोई नहीं होता। विकास के गुजरात मॉडल के साथ यही बात है, जो आज मोदी सरकार में पूरे देश के लिए आदर्श बताया जाता है। मीडिया में लगातार हो रही प्रशंसा और 'वाट्सएप' यूनिवर्सिटी से बह रही कथित ज्ञान की धारा ने मानो लोगों को भरोसा दिला दिया कि गुजरात का 'जन्म' 7 अक्टूबर, 2001 को हुआ जिस दिन मोदी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला। उसके अगले 4610 दिनों तक गुजरात का जादुई तरीके से विकास होता रहा जब तक उम्मीदों से भरे देश ने उन्हें गुजरात छोड़कर देश की बागडोर संभालने का 22 मई, 2014 को जनादेश नहीं दिया।

बहरहाल, इसकी तथ्य आधारित जांच से ही पता चल सकता है कि जमीनी स्थिति क्या है। फिलहाल तो नरेंद्र मोदी स्वच्छता अभियान के मसीहा बने हुए हैं। मजेदार तथ्य है कि इतिहास का सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान महात्मा गांधी ने 1919 में अहमदाबाद में चलाया था। तब करीब 3,000 टन कचरा हटाया गया था।

जबकि13 साल तक मोदी और उसके ठीक बाद चार साल के बीजेपी शासनकाल में रहे गुजरात की स्थिति यह है कि आज देश की तीन नदियों का सर्वाधिक प्रदूषित हिस्सा गुजरात में है। सर्वाधिक विषाक्त कचरे के ढेर में से एक अहमदाबाद के पिराना में है। 84 एकड़ में फैले 1982 के इस डंप यार्ड में 75-75 फुट ऊंचे कचरे के तीन विशालकाय पहाड़ बन गए हैं। हर का वजन लगभग 69 लाख मीट्रिक टन है।

इन ढेरों से मिथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी विषैली गैसें निकलती रहती हैं। इन गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए रोजाना 48 हजार लीटर यानी सालाना 1.75 करोड़ लीटर पानी की जरूरत होती है। यहां रोजाना 4.7 हजार टन कचरा आता है। तमाम अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले चार दशकों के दौरान अहमदाबाद के आसपास का भू-जल चिंताजनक रूप से दूषित हुआ है।

20 सितंबर, 2018 को एनजीटी ने अपने एक आदेश में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला दिया था। इसमें कहा गया कि भारत में सर्वाधिक 351 प्रदूषित नदी खंडों में से 160 गुजरात, असम, महाराष्ट्र, केरल और मध्य प्रदेश में हैं और राजकोट का भादर खंड भारत का तीसरा सबसे प्रदूषित क्षेत्र है।

वडोदरा में, माही और धनधर नदियां त्राहि-त्राहि कर रही हैं और तापी नदी के लिए घरेलू सीवेज जानलेवा साबित हो रहा है। घरेलू सीवेज और औद्योगिक प्रदूषकों से निपटने में गुजरात सर्वाधिक असंवेदनशील राज्यों में से एक है। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन विभाग बनाने में गुजरात को देश की छोड़िए एशिया में पहला स्थान हासिल है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के उपाय सुझाने के मामले में वह भारत में भी फिसड्डी है।

गुजरात में बीजेपी ने लंबे समय तक शासन किया है, इसलिए वहां की गड़बड़ियों के लिए वही जिम्मेदार है। एनजीटी के निर्देशानुसार गुजरात को तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजना पेश करनी थी, लेकिन ऐसा न करने के कारण 50,000 करोड़ की परियोजनाएं अटकी हुई हैं। इसी कारण एनजीटी ने पर्यावरण और वन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि गुजरात जब तक यह योजना पेश नहीं करता, उसे विनियमित क्षेत्रों में विकास की अनुमतिन दी जाए।

पिछले साल 20 सितंबर को एनजीटी के सख्त रुख को देखते हुए ही गुजरात आखिरकार नदी कायाकल्प नीति बनाने पर सहमत हुआ है। झीलों, जल निकायों और उनकी वर्तमान स्थिति पर केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने जानकारी मांगी है, लेकिन गुजरात ने चुप्पी साध रखी है। हालांकि राज्य ने 2005 में ही 44,138 झीलों को अधिसूचित किया था।

मोदी के नेतृत्व में गुजरात ने शिक्षा पर राज्य के जीडीपी का महज 3.3 प्रतिशत खर्च किया। ऐसोचैम के मुताबिक वर्ष 2007-08 से 2013-14 के बीच, यानी मोदी शासन के दौरान गुजरात में शिक्षा पर किया गया खर्च बीस राज्यों में न्यूनतम था। इस सूची में अपने जीडीपी की 11 फीसदी राशि खर्च करके बिहार और असम पहले स्थान पर रहे। इसका असर यह हुआ कि 2015 में गुजरात में 12वीं का परिणाम घटकर 54.98 प्रतिशत रह गया जो 22 साल का सबसे खराब प्रदर्शन है। वह भी तब, जब एक लाख छात्रों को 18 अंकों का ग्रेस दिया गया।

केंद्र की सत्ता संभालने के बाद मोदी स्वच्छता को लेकर बेशक बड़ी-बड़ी बातें करते रहे, लेकिन गुजरात में उनके मुख्यमंत्री रहते (2008-13) झूठ का महल खड़ा किया गया। 11 नवंबर, 2014 को विधानसभा में पेश सीएजी रिपोर्ट में कहा गया कि 5,000 आंगनबाड़ी केंद्रों और 4,000 स्कूलों में शौचालय नहीं था। यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने 2012 तक सभी स्कूलों में शौचालय बनाने का निर्देश दे रखा था।

दुखद यह है कि सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत राज्य के हिस्से की राशि इसलिए घटा दी गई कि गुजरात प्राथमिक शिक्षा परिषद आवंटित धनराशि का इस्तेमाल नहीं कर सकी। 13वें वित्तआयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि ‘गुजरात में बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की है, जो शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं।’ इसके साथ ही आयोग ने कहा कि सरकारी रिकॉर्ड में दिए गए आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं, इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है।

26 जून, 2005 में गुजरात का मुख्यमंत्री रहते मोदी ने बड़े जोर-शोर से ऐलान किया था कि गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कारपोरेशन लि. (जीएसपीसी) ने केजी बेसिन में भारत का सबसे बड़ा तेल भंडार खोजा है। उनका दावा था कि यह भंडार 20 खरब क्यूबिक फीट का था और उस समय उसकी कीमत 2,20,000 करोड़ थी। उस समय पूरे देश में जितना तेल निकाला जा रहा था, यह उससे कहीं अधिक था।

मोदी ने घोषणा की कि सरकार इस पर 1,500 करोड़ खर्च करेगी और 2007 में इस तेल क्षेत्र से कमर्शियल उत्पादन शुरू हो जाएगा। तथ्य यह है कि 2016 तक केजी बेसिन के इस ब्लॉक से कमर्शियल उत्पादन शुरू नहीं हो सका है और 31 मार्च 2015 तक इस परियोजना पर 19,716 करोड़ खर्च हो चुका है। 15 सरकारी और निजी बैंकों का 31 मार्च 2015 तक का बकाया 19,716 करोड़ हो गया था। इस दौरान एसजीपीसी का मुनाफा घटकर सिर्फ 23 करोड़ रह गया।

असल में यही है मोदी के गुजरात मॉडल का सच!

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