ईरान के लिए कितना जरूरी है खार्ग द्वीप,क्यों कहा जाता है आर्थिक धड़कन? जिस पर ट्रंप की चेतावनी ने बढ़ाई चिंता

खार्ग द्वीप ईरान के दक्षिण में बुशेहर तट से लगभग 55 किलोमीटर दूर फारस की खाड़ी में स्थित है। यह एक कोरल द्वीप है जिसकी समुद्री गहराई इतनी अधिक है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर भी यहां आसानी से लंगर डाल सकते हैं।

ईरान का खार्ग द्वीप
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आईएएनएस

पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान का खार्ग द्वीप एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। फारस की खाड़ी में स्थित यह छोटा-सा द्वीप लंबे समय से ईरान की तेल अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में इस द्वीप पर मौजूद सभी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। उन्होंने यह बयान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर जारी किया, जिसने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में नई बहस को जन्म दे दिया है।

खार्ग द्वीप ईरान के दक्षिण में बुशेहर तट से लगभग 55 किलोमीटर दूर फारस की खाड़ी में स्थित है। यह एक कोरल द्वीप है जिसकी समुद्री गहराई इतनी अधिक है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर भी यहां आसानी से लंगर डाल सकते हैं। इसी कारण 20वीं सदी के मध्य में ईरान ने इसे विशाल तेल निर्यात टर्मिनल के रूप में विकसित किया। पाइपलाइनों के माध्यम से देश के कई बड़े तेल क्षेत्रों से कच्चा तेल यहां लाया जाता है और फिर टैंकरों के जरिए दुनिया भर में भेजा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार ईरान के कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा इसी द्वीप से होकर गुजरता है, इसलिए इसे अक्सर देश की “आर्थिक जीवनरेखा” कहा जाता है।


खार्ग द्वीप का महत्व केवल आधुनिक तेल उद्योग तक सीमित नहीं है। पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि यहां हजारों वर्ष पहले से मानव गतिविधि मौजूद रही है। प्राचीन फारसी साम्राज्यों के दौर में यह समुद्री व्यापार का एक अहम पड़ाव था और यहां चट्टानों में बने मकबरों और प्रारंभिक ईसाई मठों के अवशेष भी मिले हैं। मध्यकाल में यह फारस, भारत और बसरा के बीच समुद्री व्यापारिक मार्ग का हिस्सा रहा। 18वीं सदी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां व्यापारिक चौकी स्थापित की, जबकि बाद में ब्रिटिश सेनाओं ने भी कुछ समय के लिए इस द्वीप पर कब्जा किया था। इससे स्पष्ट होता है कि रणनीतिक रूप से यह द्वीप सदियों से महत्वपूर्ण रहा है।

 आधुनिक दौर में खार्ग द्वीप का सबसे बड़ा परीक्षण 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध के दौरान हुआ, जब इराक ने कई बार यहां मौजूद तेल टर्मिनलों पर हमला किया। उस समय इन हमलों का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना था क्योंकि तेल निर्यात ही उसकी सबसे बड़ी आय का स्रोत था।

 प्रसिद्ध ऊर्जा इतिहासकार डैनियल येरगिन ने अपनी किताब द प्राइज: द एपिक क्वेस्ट फॉर ऑयल, मनी एंड पावर में लिखा था कि “खार्ग द्वीप ईरान के तेल निर्यात का 'नर्व सिस्टम' था; इस पर हमला करना सीधे उसकी आर्थिक जीवनरेखा पर वार करने जैसा था।” यह टिप्पणी उस समय की ऊर्जा राजनीति को समझने के लिए अक्सर उद्धृत की जाती है।

 ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अली अकबर हाशेमी रफसंजानी ने भी उस दौर में कहा था कि खार्ग द्वीप ईरान के तेल निर्यात का मुख्य द्वार है और इसकी सुरक्षा देश की अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के समान है। इन टिप्पणियों से स्पष्ट होता है कि यह छोटा-सा द्वीप केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि ईरान की आर्थिक और रणनीतिक संरचना का केंद्रीय हिस्सा है।


इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में ट्रंप का बयान चर्चा में आया। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि उनके निर्देश पर अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने मध्य पूर्व के इतिहास के सबसे शक्तिशाली बमबारी अभियानों में से एक को अंजाम दिया और खार्ग द्वीप पर मौजूद सभी सैन्य ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका के पास दुनिया के सबसे शक्तिशाली और आधुनिक हथियार हैं, लेकिन “संयम और विवेक” के कारण द्वीप के तेल ढांचे को नष्ट नहीं किया गया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान या कोई अन्य पक्ष स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षित आवाजाही में बाधा डालता है तो इस फैसले पर दोबारा विचार किया जा सकता है।

खार्ग द्वीप पर किसी भी बड़े हमले का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। यह द्वीप वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का एक अहम हिस्सा है और यहां की तेल सुविधाओं को गंभीर नुकसान पहुंचने पर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी उथल-पुथल हो सकती है। यही कारण है कि यह छोटा-सा द्वीप लंबे समय से पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक केंद्र बना हुआ है।