शांति समझौते के बीच इजरायल की कथित साजिश का खुलासा! निशाने पर थे अराघची-गालिबाफ, ईरान को अमेरिका ने किया था अलर्ट

ईरान-इजरायल संघर्ष के दौरान अमेरिका ने इजरायल की संभावित हत्या की योजना को लेकर ईरान को गुप्त चेतावनी भेजी थी। रिपोर्ट में शांति वार्ता और दोनों देशों के मतभेदों का भी खुलासा हुआ है।

फोटो: सोशल मीडिया
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ईरान-इजरायल संघर्ष को समाप्त करने और होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की कोशिशों के दौरान अमेरिका को इस बात की गंभीर आशंका थी कि इजरायल ईरान के दो शीर्ष नेताओं की हत्या की कोशिश कर सकता है। 'द वॉशिंगटन' पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी चिंता के चलते अमेरिका ने बिचौलियों के जरिए तेहरान को गुप्त रूप से चेतावनी भी भिजवाई थी। इससे पहले 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तरह का दावा किया था। अमेरिकी अधिकारियों को डर था कि यदि ऐसा हुआ तो चल रही शांति वार्ता पूरी तरह पटरी से उतर सकती है और संघर्ष एक बार फिर भड़क सकता है।

किन नेताओं को लेकर अमेरिका ने जताई थी चिंता?

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन जब संघर्ष समाप्त करने के लिए कूटनीतिक समझौते की दिशा में प्रयास कर रहा था, उसी दौरान अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि इजरायल ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ को निशाना बना सकता है। एक अमेरिकी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर द वॉशिंगटन पोस्ट से कहा, "अगर आप इन लोगों को मार देते हैं, तो आप व्यवहारिक नेताओं को खत्म कर देंगे।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि मामला इतना गंभीर था कि इस वर्ष वसंत ऋतु में अमेरिका ने असामान्य कदम उठाते हुए बिचौलियों के जरिए तेहरान को संदेश भेजा कि इजरायल इन दोनों वरिष्ठ नेताओं की हत्या की कोशिश कर सकता है। इसके अलावा, एक राजनयिक के हवाले से बताया गया कि अमेरिकी अधिकारियों ने मार्च में ही अपने इजरायली समकक्षों से आग्रह किया था कि जब तक कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, तब तक ईरान के राजनीतिक नेतृत्व को निशाना न बनाया जाए। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने 'द वॉशिंगटन' पोस्ट से कहा, "राष्ट्रपति चाहते हैं कि शांति प्रक्रिया आगे बढ़े।" वहीं, 'वॉशिंगटन' स्थित इजरायली दूतावास ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।


अमेरिका और इजरायल के बीच सामने आए मतभेद

'द वॉशिंगटन' पोस्ट के मुताबिक, इस घटनाक्रम ने ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल के बीच युद्ध के उद्देश्यों को लेकर बढ़ते मतभेद भी उजागर किए। रिपोर्ट में कहा गया कि 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद शुरुआत में दोनों देश ईरान में सत्ता परिवर्तन के पक्ष में थे, लेकिन बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि ईरान का राजनीतिक और सैन्य ढांचा संभवतः सत्ता में बना रहेगा। इसके बाद अमेरिका ने अपना ध्यान बातचीत के जरिए समझौता कराने पर केंद्रित कर दिया।

अमेरिका के पूर्व विदेश विभाग अधिकारी एरॉन डेविड मिलर ने 'द वॉशिंगटन' पोस्ट से कहा कि यह घटनाक्रम युद्ध के उद्देश्यों को लेकर अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद को दिखाता है। उन्होंने कहा कि इससे यह भी संकेत मिलता है कि इजरायल के प्रधानमंत्री अमेरिका द्वारा संभावित किसी भी वार्ता को कमजोर करने के लिए दृढ़ नजर आ रहे थे।

अली लारिजानी की कथित हत्या के बाद बढ़ी चिंता

रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में इजरायल द्वारा ईरान के वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी अली लारिजानी की कथित हत्या के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। एक पश्चिमी अधिकारी के हवाले से कहा गया, "असल मोड़ सर्वोच्च नेता की हत्या नहीं, बल्कि लारिजानी की हत्या थी। अमेरिका बातचीत के लिए एक ईरानी अधिकारी की तलाश में था और अचानक वह नहीं रहे।"

'द वॉशिंगटन पोस्ट' के मुताबिक, इसके बाद अब्बास अराघची और मोहम्मद बाघेर गालिबाफ अप्रैल में शुरुआती युद्धविराम सुनिश्चित कराने और जून में संघर्ष समाप्त करने के लिए व्यापक रूपरेखा समझौते पर बातचीत में अमेरिका के प्रमुख संपर्क बने।


न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में भी किया गया दावा

'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि 8 अप्रैल के युद्धविराम के बाद इजरायल इन दोनों नेताओं को निशाना बना सकता है। इसी वजह से क्षेत्रीय बिचौलियों के जरिए ईरान को चेतावनी भेजी गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, 12 अप्रैल को इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ बातचीत के बाद लौट रहे संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ को संभावित इजरायली खतरे की सूचना दी गई। खुफिया जानकारी मिलने के बाद उनका विमान आपात स्थिति में मशहद में उतारा गया और इसके बाद वह सड़क मार्ग से तेहरान पहुंचे।

'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा कि यदि शांति वार्ता के दौरान अब्बास अराघची या मोहम्मद बाघेर गालिबाफ की हत्या की जाती, तो पूरी शांति प्रक्रिया ध्वस्त हो सकती थी और एक बार फिर संघर्ष शुरू होने की आशंका थी। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान नीति को लेकर अमेरिका कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दे रहा था, जबकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तेहरान के खिलाफ अधिक सख्त रुख बनाए हुए थे।

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