ईरान का पलटवार, खाड़ी में कोहराम, सत्ता परिवर्तन पर अमेरिका का यूटर्न, ब्रिटेन ने भी दिया झटका!

ईरान के पलटवार और खाड़ी में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका, ईरान में सत्ता परिवर्तन से पीछे हट गया, जबकि ब्रिटेन ने भी जमीन पर सहयोग से दूरी बना ली है।

फोटो: AI Generated
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हैदर अली खान

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बदले हैं। एक ओर ईरान ने ताबड़तोड़ पलटवार करते हुए यह संकेत दिया कि उसका सैन्य और राजनीतिक ढांचा कमजोर नहीं पड़ा है, वहीं खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा कर दिया है। ऐसे माहौल में अब यह सवाल उठ रहा है, क्या अमेरिका अपनी रणनीति को लेकर बैकफुट पर आ गया है?

जेडी वेंस का बयान, बदला सुर

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने जंग के बीच बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका का मकसद ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि यह अभियान स्पष्ट लक्ष्यों के साथ चल रहा है और इसे इराक या अफगानिस्तान की तरह लंबा युद्ध नहीं बनने दिया जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में सैन्य तनाव चरम पर है।

वेंस के इस बयान को कई विश्लेषक अमेरिका के बदले हुए सार्वजनिक रुख के तौर पर देख रहे हैं। पहले जहां अमेरिकी नेतृत्व की ओर से ईरान के शासन पर कड़े बयान सामने आए थे और कुछ संकेत ऐसे भी थे जिन्हें “सत्ता परिवर्तन” की दिशा में देखा गया, वहीं अब आधिकारिक लाइन यह है कि उद्देश्य शासन बदलना नहीं, बल्कि सुरक्षा खतरे को सीमित करना है।


क्या है विरोधाभास?

यहीं से बहस शुरू होती है। आलोचकों का तर्क है कि अगर पहले की भाषा में शासन पर सीधा दबाव और बदलाव की बात दिखती थी, तो अब ईरान में सत्ता परिवर्तन से साफ इनकार क्या रणनीतिक पीछे हटना है?

इसके साथ एक और सवाल जुड़ता है। अमेरिका ने पहले यह दावा किया था कि उसने बी-2 बॉम्बर के जरिए ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर दिया। अगर ऐसा है, तो फिर बार-बार यह कहना कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोका जाएगा, क्या यह संकेत नहीं देता कि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ?

सहोगी ब्रिटेन से भी अमेरिका को झटका?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केइर स्टार्मर ने कहा कि ब्रिटिश सेना अमेरिका व इजरायल के ईरान पर किए गए हमलों में सीधे शामिल नहीं होगी और ब्रिटेन “Regime change from the skies” यानी सिर्फ हवा से शासन बदलने वाली रणनीति का समर्थन नहीं करता। उन्होंने ईराक जैसे संघर्षों से सीखे गए सबक का हवाला देते हुए कहा कि केवल बमबारी या एयर स्ट्राइक से स्थायी राजनीतिक बदलाव संभव नहीं होता, इसके लिए व्यापक रणनीति, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और एक “सोचा समझा” योजना जरूरी है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ब्रिटेन जमीन पर युद्ध में नहीं उतरेगा और केवल सीमित, रक्षात्मक उद्देश्य के लिए अमेरिका को कुछ ब्रिटिश बेस का इस्तेमाल करने की अनुमति दी है, ताकि जरूरत पड़ने पर मिसाइलों को टारगेट करके सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का यह बयान अमेरिका के लिए कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पारंपरिक रूप से ब्रिटेन उसका करीबी सहयोगी रहा है।


क्या ईरान के पलटवार ने बदला समीकरण?

खामेनेई की मौत के बाद भी ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया तेज और संगठित रही है। शासन तंत्र में तत्काल कोई ढीलापन नजर नहीं आया। ऐसे में यह तर्क सामने आ रहा है कि अगर ईरान अंदर से कमजोर नहीं पड़ा और सहयोगी देश भी पूर्ण सैन्य समर्थन से हिचक रहे हैं, तो क्या अमेरिका ने अपने लक्ष्य की भाषा को नरम किया है?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका पूरी तरह बैकफुट पर है, लेकिन यह जरूर दिखता है कि उसकी सार्वजनिक बयानबाजी अब अधिक सीमित और नियंत्रित है। “सत्ता परिवर्तन” जैसे शब्दों से दूरी बनाकर वह अपने अभियान को राष्ट्रीय सुरक्षा और परमाणु खतरे तक सीमित बताने की कोशिश कर रहा है।

बड़ा सवाल

इन सभी घटनाओं के बीच असली सवाल यही है कि क्या अमेरिका ने स्थिति का पुनर्मूल्यांकन किया है? क्या उसे यह एहसास हुआ है कि व्यापक युद्ध की कीमत भारी पड़ सकती है? या यह सिर्फ कूटनीतिक भाषा का बदलाव है ताकि क्षेत्रीय तनाव को नियंत्रित रखा जा सके?

फिलहाल तथ्य यही बताते हैं कि

  • ईरान ने पलटवार किया है,

  • क्षेत्र में तनाव बढ़ा है,

  • ब्रिटेन जमीनी युद्ध से दूरी बना रहा है,

  • और अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से सत्ता परिवर्तन के लक्ष्य से इनकार किया है।

इन संकेतों को जोड़कर देखा जाए तो कई मायने निकल रहे हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह रणनीतिक समायोजन है या सचमुच दबाव का परिणाम।