मिर्जा फखरुल चुने गए बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति, वामपंथी छात्र राजनीति से राष्ट्र प्रमुख तक ऐसे तय किया सफर

ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान आलमगीर वामपंथी संगठन 'ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन' में शामिल हुए थे। इसके बाद 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने भारत में शरण ली और वामपंथी स्वतंत्रता सेनानियों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मिर्जा फखरुल चुने गए बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति, वामपंथी छात्र राजनीति से राष्ट्र प्रमुख तक ऐसे तय किया सफर
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बांग्लादेश की संसद ने गुरुवार को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के उम्मीदवार मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को देश का नया राष्ट्रपति चुना। इसके साथ ही 1960 के दशक के अंत में एक वामपंथी छात्र कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में कदम रखने वाले मिर्जा ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया है। नए राष्ट्रपति 21 अगस्त को बंगभवन में पद की शपथ लेंगे।

मिर्जा फखरुल इस्लाम बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति

बीएनपी के लंबे समय से महासचिव रहे मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति चुने गए हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन समर्थित उम्मीदवार ओली अहमद को हराया। फखरुल को 255 वोट मिले, जबकि अहमद को 88 वोट प्राप्त हुए। गुरुवार दोपहर राष्ट्रीय संसद में हुए राष्ट्रपति चुनाव में कुल 343 वैध मत डाले गए। यह चुनाव मुख्य चुनाव आयुक्त और रिटर्निंग अधिकारी एएमएम नासिर उद्दीन की निगरानी में आयोजित किया गया।

साढ़े तीन दशक बाद मतदान से हुआ राष्ट्रपति चुनाव

यूएनबी की रिपोर्ट के मुताबिक, नतीजों की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, "मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को सबसे अधिक वोट मिले हैं, इसलिए वे विधिवत रूप से राष्ट्रपति चुने गए हैं।" रिपोर्टों के अनुसार, मतदान के पात्र 349 सांसदों में से छह ने राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डाला। जिन सांसदों ने मतदान नहीं किया, उनमें बीएनपी के मिर्जा अब्बास और मुस्तफा कमाल पाशा, निर्दलीय सांसद रुमीन फरहाना, जमात के सांसद गाजी नजरुल इस्लाम और इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश के सांसद ओली उल्लाह शामिल हैं।

यह राष्ट्रपति चुनाव पिछले साढ़े तीन दशकों से अधिक समय में पहला ऐसा चुनाव रहा, जिसमें मतदान के जरिए मुकाबला हुआ। इससे पहले 1991 से लगातार राष्ट्रपति बिना किसी प्रतिद्वंद्वी के चुने जाते रहे थे। संसद में मतदान के जरिए तय हुआ आखिरी राष्ट्रपति चुनाव 8 अक्टूबर 1991 को हुआ था। बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शाहाबुद्दीन के 24 जुलाई को इस्तीफा देने के बाद, राष्ट्रीय संसद के स्पीकर हाफिज उद्दीन अहमद कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। बांग्लादेश के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति पद खाली होने के 90 दिनों के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव कराना जरूरी होता है।


बीएनपी में 'नंबर दो' के शीर्ष नेता

राष्ट्रपति चुने जाने से पहले 78 वर्षीय नेता प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व में स्थानीय सरकार, ग्रामीण विकास और सहकारिता मंत्री के रूप में कार्य कर रहे थे। इसके साथ ही वह मध्य-दक्षिणपंथी विचार वाली बीएनपी के महासचिव की जिम्मेदारी भी निभा रहे थे। फखरुल ने 15 साल से अधिक समय तक बीएनपी में प्रभावी रूप से 'नंबर दो' नेता की भूमिका निभाई। वे पार्टी के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले महासचिव रहे हैं और पार्टी के सबसे प्रमुख सार्वजनिक चेहरों में से एक माने जाते हैं।

बीएनपी के कठिन दौर में जब तारिक रहमान लंदन में निर्वासन में थे और उनकी मां व पूर्व बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया जेल, नजरबंदी या लंबे समय तक बीमारी से जूझ रही थीं, तब फखरुल बांग्लादेश में मौजूद सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक बनकर उभरे। वे लगातार जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहे और पार्टी के फैसलों को लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। फखरुल का राष्ट्रपति बनना इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यह जुलाई चार्टर के तहत राजनीतिक दलों के बीच सहमति से प्रस्तावित संवैधानिक बदलावों के दौर में हुआ है।

वामपंथी छात्र संगठन से शुरुआत

ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान आलमगीर वामपंथी संगठन 'ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन' में शामिल हुए थे। वह 1969 में तत्कालीन पाकिस्तानी सैन्य समर्थित सरकार के खिलाफ हुए जन आंदोलन के दौरान ढाका विश्वविद्यालय में पार्टी की इकाई के अध्यक्ष बने। इसके बाद 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने भारत में शरण ली और वामपंथी स्वतंत्रता सेनानियों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीएनपी की स्थापना बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के सात साल बाद हुई थी।


राजनीति में आने से पहले सरकारी सेवा में थे

मुख्यधारा की राजनीति में आने से पहले आलमगीर सरकारी सेवा में थे। वह 1972 में सिविल सेवा के शिक्षा कैडर में शामिल होकर अर्थशास्त्र के शिक्षक बने। राजनीति में आने के लिए उन्होंने 1986 में नौकरी छोड़ दी और दो साल बाद अपने गृहनगर ठाकुरगांव से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नगर पालिका अध्यक्ष चुने गए।

मुस्लिम लीग के नेता और पूर्वी पाकिस्तान प्रांतीय विधानसभा के पूर्व सदस्य मिर्जा रूहुल अमीन के बेटे आलमगीर 1990 के दशक की शुरुआत में बीएनपी में शामिल हुए थे। वह 2001 में पहली बार संसद सदस्य बने और कृषि राज्य मंत्री तथा नागरिक उड्डयन एवं पर्यटन राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। वह फरवरी 2026 के आम चुनाव में ठाकुरगांव-1 सीट से फिर से चुने गए।

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