मौसम नहीं, ट्रेनिंग की कमी ले रही एवरेस्ट पर पर्वतारोहियों की जान

माउंट एवरेस्ट से सकुशल वापस आए अनुभवी पर्वतारोही एवरेस्ट पर चढ़ाई के रास्तों में होने वाले हादसों और मौतों के लिए ट्रेनिंग की कमी को जिम्मेदार मानते हैं। पर्वतारोही मानते हैं कि बुनियादी प्रशिक्षण के बिना एवरेस्ट की चोटी पर जाने वालों को रोका जाना चाहिए।

फोटोः सोशल मीडिया
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DW

एवरेस्ट फतह करने गए पर्वतारोहियों के साथ होने वाले हादसों की खबरें आना अब आम हो गया है। आंखों में सपने और दिल में जोश भरे जब पर्वतारोही अपनी यात्रा के लिए निकलते हैं तो उन्हें शायद इस बात का वास्तविक अंदाजा नहीं होता कि रास्तों पर बिछी बर्फ मखमली नहीं बल्कि पथरीले एहसास कराएगी।

मंगलवार को दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवेस्ट से लौट रहे एक और पर्वतारोही की मौत के साथ 2019 में मरने वाले पर्वतारोहियों की संख्या 11 हो गई। नेपाल सरकार के एक अधिकारी ने भी मंगलवार को इसकी पुष्टि की। इससे पहले 23 मई को भी एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान दो भारतीय पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी। पर्वतारोहियों और विशेषज्ञों का मानना है कि एवरेस्ट पर लगातार बढ़ती भीड़ के कारण ही इतने लोगों को जान गंवानी पड़ी है।

अमीषा चौहान भी एक ऐसी ही पर्वतारोही हैं जो एवरेस्ट के रास्तों में मिले ‘ट्रैफिक जाम’ में फंसने के बाद सीधे अस्पताल पहुंच गईं। अमीषा फ्रॉस्टबाइट का शिकार हुईं। अब वह अपनी इस तकलीफ का इलाज करा रही हैं। एवरेस्ट पर होने वाले हादसों को लेकर अमीषा कहती हैं कि बुनियादी प्रशिक्षण के बिना एवरेस्ट की चोटी पर जाने वालों को रोका जाना चाहिए। अमीषा ने बताया, “चढ़ाई के दौरान मुझे ऐसे कई पर्वतारोही मिले जिनके पास कोई प्रशिक्षण नहीं था और वे पूरी तरह अपने शेरपा गाइड पर निर्भर थे।”

उन्होंने बताया कि जिनके पास कोई ट्रेनिंग नहीं होती वे चढ़ाई के दौरान गलत निर्णय लेते हैं और अपने साथ-साथ शेरपा की जिंदगी को भी खतरे में डालते हैं। चढ़ाई के रास्ते पर मिलने वाली भीड़ को लेकर अमीषा बताती हैं, “मुझे नीचे आने के लिए 20 मिनट का इंतजार करना पड़ा, लेकिन वहां कई ऐसे लोग थे जो ना जाने कितने घंटों से फंसे थे।”

अमीषा मानती हैं कि प्रशासन को पर्वतारोहियों को एवरेस्ट पर जाने की इजाजत देने से पहले उनकी योग्यता जांचनी चाहिए। साथ ही सिर्फ प्रशिक्षित पर्वतारोहियों को ही जाने की इजाजत मिलनी चाहिए। पिछले दो हफ्तों में तकरीबन दस लोगों की जान चली गई। कुछ जानें खराब मौसम के चलते, कुछ ऑक्सीजन खत्म होने के चलते तो कुछ की मौत ठंडे रास्तों में फंसे रहने के कारण हो गई। अमीषा बताती हैं कि कई बार पर्वतारोही स्वयं की लापरवाही के चलते जान गवां बैठते हैं। ऑक्सीजन खत्म होने के बावजूद वे चोटी पर पहुंचने की जिद करते हैं और अपनी जिंदगी को खतरे में डालते हैं।

हाल में एक अन्य पर्वतारोही और ऐडवेंचर फिल्ममेकर एलिया साइक्ले ने इंस्टाग्राम पर डाली एक पोस्ट में कहा था कि एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर उन्होंने जो देखा उस पर उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने बताया, “मौत, लाशें, अराजकता. रास्तों पर लाशें और कैंप में और लाशें। जिन लोगों को मैंने वापस भेजने की कोशिश की थी, उनकी भी यहां आते-आते मौत हो गई। लोगों को घसीटा जा रहा है। लोग लाशों पर से गुजर रहे थे।” एलिया ने लिखा, “जो कुछ भी आप किसी सनसनीखेज हेडलाइन में पढ़ते हैं, वह सब उस रात हमारे सामने मंडरा रहा था।”

साल 1953 में एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के पहली बार एवरेस्ट पर चढ़ने के बाद से पर्वतारोहण एक आकर्षक व्यवसाय बन गया है। पर्वतारोहण के लिए नेपाल की ओर से जारी किए जाने वाले परमिट की कीमत करीब 11 हजार डॉलर है। इन परमिट के जरिए नेपाल के पास अच्छी खासी विदेशी मुद्रा आती है। इस साल तकरीबन 140 परमिट तिब्बत के उत्तरी छोर से जाने के लिए दिए गए थे।

हालांकि, अब तक इस बात का स्पष्ट आंकड़ा नहीं आया है कि साल 2018 के मुकाबले 2019 में कितने लोगों ने एवरेस्ट की चढ़ाई की। हालांकि इस साल अब तक मारे गए पर्वतारोहियों में चार भारतीय और एक अमेरिका, ब्रिटेन और नेपाल से थे। उत्तरी तिब्बत की ओर से जाने वालों में एक ऑस्ट्रियन और आइरिश पर्वतारोही की भी मौत की पुष्टि की गई है।

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