इजरायल में कल संसदीय चुनाव, नेतन्याहू के सामने पूर्व सेना प्रमुख की बड़ी चुनौती

राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और युद्ध के बाद की परिस्थितियां इस बार मतदान को सीधे प्रभावित कर रही हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि चुनाव के नतीजे देश को किस दिशा में ले जाते हैं और अगली सरकार कैसी बनती है।

इजरायल में कल संसदीय चुनाव, नेतन्याहू के सामने पूर्व सेना प्रमुख की बड़ी चुनौती
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इजरायल में मंगलवार को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं। देश की 120 सदस्यीय संसद (कनेसेट) के प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए लगभग 73 लाख योग्य मतदाता वोट डालेंगे। इस अहम चुनाव में मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को कई प्रमुख नेताओं के साथ कई पूर्व सैन्य अधिकारियों से भी कड़ी चुनौती मिल रही है। इनमें गादी आइसेनकोट, नफ्ताली बेनेट, यायर लापिड, एविग्डोर लिबरमैन और यायर गोलान शामिल हैं।

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस बार का चुनाव देश के साथ ही नेतन्याहू के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेतन्याहू खुद को ऐसा नेता बता रहे हैं जो इजरायल की सुरक्षा और उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सबसे बेहतर तरीके से संभाल सकता है। इजरायली मीडिया आउटलेट 'आई24 न्यूज' के अनुसार, उनकी पार्टी लिकुड हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के खिलाफ सैन्य अभियानों में मिली सफलताओं को चुनावी मुद्दा बना रही है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि सात अक्टूबर के हमले ने उनकी सरकार के दौरान हुई गंभीर सुरक्षा चूक को उजागर कर दिया था।

इजरायली सेना (आईडीएफ) के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ गादी आइसेनकोट नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरकर सामने आए हैं। उनकी नई पार्टी याशार सुरक्षा को प्राथमिकता देने के साथ-साथ जनता का भरोसा दोबारा जीतने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने का वादा कर रही है।

पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड ने मिलकर बेयाखाद पार्टी के नाम से एक गठबंधन बनाया है, जो दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी मतदाताओं को साथ लाने की कोशिश कर रहा है। उनके एजेंडे में राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना, अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय के पुरुषों को सेना और कार्यबल में शामिल करना, रिजर्व सैनिकों का समर्थन करना और संवैधानिक ढांचे में सुधार करना शामिल है।

एविग्डोर लिबरमैन के नेतृत्व वाली 'यिसराइल बेइतेनु' पार्टी सख्त सुरक्षा नीतियों और धर्मनिरपेक्ष विचारों का समर्थन करती है। यह पार्टी पहले मुख्य रूप से पूर्व सोवियत संघ से आए प्रवासियों के बीच लोकप्रिय थी, लेकिन अब वह ऐसे व्यापक मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है जो सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा और सार्वजनिक मामलों में धर्म के कम प्रभाव की मांग करते हैं।

'आई24 न्यूज' की रिपोर्ट के अनुसार, यायर गोलान की डेमोक्रेटिक पार्टी कब्जे (एनेक्सेशन) का विरोध करती है और इजरायल-फिलिस्तीन विवाद का कूटनीतिक समाधान चाहती है। पार्टी क्षेत्र के मध्यमार्गी साझेदार देशों के साथ सहयोग बढ़ाने का भी समर्थन करती है।


'द यरूशलेम पोस्ट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में कांटे की टक्कर दिखने के बीच नेतन्याहू के विरोधी दल चुनाव के बाद संभावित राजनीतिक समीकरणों पर भी विचार कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू विरोधी खेमे में अल्पमत सरकार बनाने की संभावना पर चर्चा हो रही है। हालांकि एविग्डोर लिबरमैन और नफ्ताली बेनेट इस विचार का विरोध कर रहे हैं।

साथ ही, कई दलों के बीच मौजूदा संसद अध्यक्ष अमीर ओहाना को हटाने को लेकर भी सहमति बनती दिख रही है, चाहे गठबंधन समझौता बाद में क्यों न हो। अधिकांश सर्वे में नेतन्याहू विरोधी खेमे को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है लेकिन राजनीतिक बदलाव चाहने वाले जियोनिस्ट दल अभी भी अपने मौजूदा समझौतों के आधार पर सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत से पीछे हैं।

भारत में इजरायली दूतावास की प्रवक्ता मिशेल सिरोटा ने अपने देश में चुनाव की प्रक्रिया के बारे में कहा कि हमारे चुनाव 27 अक्टूबर को हो रहे हैं। 73 लाख योग्य मतदाता वोट डाल सकते हैं। हमें उम्मीद है कि बड़ी संख्या में लोग मतदान करेंगे। उन्होंने बताया कि संसद में कुल 120 सीटें हैं। मतदाता अपनी पसंद की किसी भी पार्टी को वोट दे सकते हैं। किसी पार्टी को जितने वोट मिलते हैं, उसी अनुपात में उसे संसद में सीटें मिलती हैं।

सिरोटा ने कहा, "आप सबसे बड़ी पार्टी को वोट दे सकते हैं या किसी भी अन्य पार्टी को। किसी पार्टी को जितनी सीटें मिलती हैं, उसी के आधार पर वह उतने प्रतिनिधि संसद में भेज सकती है, चाहे वे सत्तारूढ़ गठबंधन में हों या विपक्ष में।" सिरोटा के मुताबिक, वोटों की गिनती पूरी होने के बाद इजरायल के राष्ट्रपति तय करेंगे कि किस पार्टी को सरकार बनाने का पहला मौका मिलेगा। उस पार्टी को 28 दिन का समय दिया जाएगा।

उन्होंने कहा, "चुनाव के बाद राष्ट्रपति यह तय करेंगे कि किस पार्टी को गठबंधन बनाने का मौका मिलेगा। उस पार्टी के पास 28 दिन होंगे ताकि वह दूसरे दलों को साथ लाकर सरकार बना सके। अगर वह सफल नहीं होती, तो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को यह मौका दिया जाएगा। अगर वह भी सफल नहीं हुई, तो 90 दिनों के भीतर फिर से चुनाव करवाए जा सकते हैं।"

वरिष्ठ इजरायली पत्रकार यारोन डेसेल ने बताया कि मौजूदा जनमत सर्वेक्षणों में किसी भी पक्ष को साफ बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में कई राजनीतिक विकल्प खुले हुए हैं। उन्होंने कहा कि एक संभावना यह है कि फिर से चुनाव कराए जाएं। दूसरी संभावना राष्ट्रीय एकता सरकार की है, जिसमें बड़े दल मिलकर सरकार बनाएं। तीसरा विकल्प यह है कि नेतन्याहू विरोधी दल मिलकर अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश करें।


डेसेल ने कहा, "फिलहाल सर्वेक्षणों में किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल रहा है। ऐसी स्थिति में दोबारा चुनाव हो सकते हैं, राष्ट्रीय एकता सरकार बन सकती है या फिर नेतन्याहू विरोधी खेमे की अल्पमत सरकार बन सकती है। विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को बदलना चाहता है।" इस बीच, आम इजरायली नागरिकों का कहना है कि इस चुनाव में लोगों की सबसे बड़ी चिंता राष्ट्रीय सुरक्षा है। तीन साल के युद्ध के बाद अब हम सभी शांति चाहते हैं।

इजरायल के इतिहास के सबसे घातक हमले के लगभग तीन साल बाद देश के मतदाता मतदान की तैयारी कर रहे हैं। माना जा रहा है कि यह चुनाव सिर्फ नेतन्याहू और उनके विरोधियों के राजनीतिक भविष्य का फैसला नहीं करेगा बल्कि इजरायल की दिशा भी तय करेगा। यह 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले के बाद पहला आम चुनाव होगा।

यह चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब देश में हमले के लिए जिम्मेदारी तय करने, सैन्य सेवा के बोझ को बांटने और लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर गहरी बहस चल रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव के नतीजे इजरायल की आंतरिक राजनीति के साथ-साथ उसके क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी बड़ा असर डाल सकते हैं।

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