वादे निभाने में भारत के लचर प्रदर्शन से नाखुश हैं आसियान के लोग, इस रिपोर्ट में दिखेंगे रुझान

आसियान के देशों के बीच हुए एक सर्वे में दुनिया और क्षेत्र की राजनीति के बारे में लोगों के विचार पता चले हैं। भारत, चीन और अमेरिका आदि के बारे में इस रिपोर्ट में दिलचस्प रुझान दिखते हैं।

फोटो: DW
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डॉयचे वेले

कोविड महामारी ने अमेरिका, जापान और जर्मनी समेत दुनिया की तमाम बड़ी ताकतों को स्वास्थ्य-संबंधी इंफ्रास्ट्रक्चर, वैक्सीन और महामारी से उपजी सामाजिक समस्याओं के जाल में लपेटा है। आसियान देशों के लिए यह स्थिति पश्चिम के मुकाबले ज्यादा बड़ी रही है क्योंकि इन देशों की आर्थिक क्षमता और सुशासन उतना सुदृढ़ नहीं रहा है। इन्हीं चिंताओं के कारण आसियान के तीन चौथाई लोग मानते हैं कि कोविड का हमला इलाके की सबसे बड़ी समस्या है।

दुनिया के तमाम बड़े देशों के लिए आसियान क्या मायने रखता है। कौन से देश ज्यादा भरोसेमंद हैं और कौन से देशों की मदद चीन-अमेरिका के बढ़ते विवादों के बीच ली जा सकती है, ऐसे तमाम मुद्दों पर दक्षिण एशियाई देशों के लोगों का रुख बताती एक रिपोर्ट इंस्टिट्यूट आफ साउथ ईस्ट एशियन स्टडीज - युसूफ इशाक इंस्टिट्यूट ने जारी की है।

जी-7 और आसियान की दोस्ती से है दोनों का फायदा

इस इंस्टिट्यूट का शुमार सामरिक और क्षेत्रीय राजनय के मामलों में एशिया और दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में होता है। सिंगापुर स्थित इस संस्थान के स्टेट आफ साउथईस्ट एशिया सर्वे रिपोर्ट को क्षेत्र का सामरिक और कूटनीतिक बैरोमीटर कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। सालाना जारी की जाने वाली यह रिपोर्ट संस्थान के आसियान स्टडीज सेंटर द्वारा तैयार की गयी है।

भारत का जिक्र

2020 में पहली बार जारी होने के बाद से इस सर्वे रिपोर्ट ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों, विदेश सेवा से जुड़े नौकरशाहों और राजनेताओं, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों व मीडिया कर्मियों - सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल ही में जारी हुए बहुप्रतीक्षित तीसरे संस्करण ने दक्षिणपूर्व एशिया के साथ-साथ आसियान और इंडो-पसिफिक क्षेत्रों में बढ़ती कूटनीतिक और सामरिक गतिविधियों और तमाम रुझानों का व्यापक विश्लेषण किया है।

इस सर्वे में आसियान के डायलॉग पार्टनर के तौर पर भारत का भी जिक्र हुआ है। अधिकांश मुद्दों पर भारत, जापान और यूरोपीय संघ की तुलना में पीछे ही रहा है। आसियान देशों को भारत से उम्मीदें तो बहुत हैं लेकिन कहीं न कहीं उन्हें लगता है कि भारत अपने वादों को निभाने में लचर प्रदर्शन कर रहा है। भारत के नीतिनिर्धारकों को यह देखना होगा कि वे इस सर्वे से क्या सबक ले सकते हैं और किस तरह आसियान क्षेत्र में भारत की स्थिति और उपस्थिति को मजबूत बना सकते हैं।

आसियान ने चीन के साथ रिश्तों का दर्जा और उठाया

रिपोर्ट में कई दिलचस्प परिणामों का जिक्र है जिसमें चीन-अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव एक प्रमुख मुद्दा है। साथ ही जापान और यूरोपीय संघ की बड़ी भूमिका संबंधी रुझान भी सामने आये हैं।

कोरोना महामारी के बीच नवम्बर 2020 से जनवरी 2021 के बीच हुए इस सर्वे में एक हजार से ज्यादा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इस सर्वे की दो और खास बातें यह रहीं कि इनमें आसियान देशों में रहने वाले लोगों को ही सर्वे में भाग लेने का मौका मिला। साथ ही, पहली बार इस सर्वे को अंग्रेजी के अलावा भाषा इंडोनेशिया और वियतनामी भाषा में भी किया गया। यह एक अच्छा कदम था क्योंकि इन दोनों ही देशों में अंग्रेजी भाषा का उतना चलन नहीं है। खास तौर पर इन देशों के छोटे शहरों और कस्बों में।

मानवाधिकारों पर कम ध्यान

कोविड महामारी के दौरान बेरोजगारी तथा गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई के मुद्दे भी इस रिपोर्ट में प्रमुखता से छाए हैं। साफ है कि आसियान देशों की जनता कोविड से उपजी स्वास्थ्य, नौकरी, और तमाम सामाजिक-आर्थिक चिंताओं को लेकर हताश है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कुल मिलाकर अपने देशों की सरकारों से इन्हें कोई खास शिकायत नहीं है।

वैसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि दुनिया भर के लिए आसियान से जुड़े दो सबसे बड़े मुद्दे - आतंकवाद और मानवाधिकारों का बढ़ता हनन दस प्रतिशत से ज्यादा ध्यान नहीं आकर्षित कर सके. जाहिर है, आसियानवासियों के लिए स्वस्थ, आत्मनिर्भर और अभाव-रहित जीवन बड़ी प्राथमिकताएं हैं। पश्चिमी देशों को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए।

आसियान और म्यांमार में बढ़ती दूरियां

इस बात का दूसरा उदाहरण इस बात में भी साफ दिखता है कि रूस के यूक्रेन पर हमले की सिंगापुर को छोड़ कर किसी दक्षिणपूर्व एशियाई देश ने निंदा नहीं की। कुछ कारणवश इस बार के सर्वे से रूस को हटा दिया गया लेकिन अगर रूस को स्थान दिया गया होता और शायद कुछ और दिलचस्प बातें निकल कर सामने आतीं।

दो महाशक्तियों का संघर्ष

बहरहाल, आसियान देशों की दूसरी बड़ी चिंता अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती तनातनी है जो समय के साथ बढ़ती ही जा रही है। दक्षिणपूर्व एशिया में एक कहावत बड़ी लोकप्रिय है - 'जब दो हाथी लड़ते हैं तो लड़ाई में पिसती घास ही है'। दक्षिणपूर्व एशिया के देश और उनके निवासी इसी बात को लेकर चिंतित हैं। लेकिन सर्वे रिपोर्ट से यह भी साफ है कि बीते वर्षों के मुकाबले चीन को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं और इसके चलते अमेरिका की छवि में सुधार हुआ है। चीन के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

आर्थिक तौर पर सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली शक्ति होने के बावजूद चीन को आसियान में ज्यादा पसंद नहीं किया जा रहा है। अगर यह चलन आगे आने वाले वर्षों में बढ़ता है तो चीन के दक्षिणपूर्व एशिया में कूटनीतिक दबदबे पर असर पड़ेगा।

सर्वे की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इसकी प्रक्रिया के दौरान दुनिया के तमाम हिस्सों की तरह दक्षिणपूर्व एशिया के देश भी कोविड महामारी की चपेट में आ गए। कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं इस दौरान चरमरा गईं। ऐसा होना लाजमी था क्योंकि दक्षिणपूर्व एशिया के तमाम देश पर्यटन और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर निर्भर हैं। कोविड के दौरान उपजी चिंताएं रिपोर्ट में साफ दिखती हैं।

(राहुल मिश्र मलाया विश्वविद्यालय के एशिया-यूरोप संस्थान में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं।)

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