दुनिया की खबरें: ट्रंप ने युद्ध शक्तियों पर संसद के मतदान को बताया 'फिजूल' और US की मध्यस्थता से इजरायल-लेबनान...
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह मतदान ऐसे समय में हुआ है जब उनकी सरकार ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए अंतिम चरण की वार्ताओं में लगी हुई है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने संबंधी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) के मतदान को "फिजूल" करार दिया है। ट्रुथ सोशल पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी नाराजगी जाहिर की।
प्रतिनिधि सभा ने हाल ही में एक विधेयक को 215-208 मतों से पारित किया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी के बिना ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने से रोकना है। इस मतदान में चार रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ किया।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह मतदान ऐसे समय में हुआ है जब उनकी सरकार ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए अंतिम चरण की वार्ताओं में लगी हुई है।
उन्होंने लिखा, "कल हाउस ने एक निरर्थक मतदान किया। चार बेकार रिपब्लिकन और सभी डेमोक्रेट्स ने मेरी युद्ध शक्तियों को सीमित करने के पक्ष में मतदान किया, जबकि मैं ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए अंतिम वार्ता कर रहा हूं। ऐसा देश के खिलाफ काम कौन करेगा?"
ट्रंप ने डेमोक्रेटिक पार्टी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे "ट्रंप डिरेंजमेंट सिंड्रोम" से ग्रस्त हैं और उनकी किसी भी उपलब्धि को स्वीकार नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा कि डेमोक्रेट्स देश की सफलता से ज्यादा उनकी राजनीतिक असफलता चाहते हैं।
राष्ट्रपति ने उन चार रिपब्लिकन सांसदों की भी आलोचना की जिन्होंने विधेयक का समर्थन किया। ट्रंप ने उन्हें "दिखावा करने वाले" (ग्रैंड स्टैंडर्स) बताते हुए कहा कि उन्हें अपने व्यवहार पर शर्म आनी चाहिए।
बुधवार को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने द्विदलीय 'वॉर पावर्स रेजोल्यूशन' पारित किया, जिसका मकसद ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को खत्म करना है। इस कदम को ट्रंप के लिए एक राजनीतिक झटका माना गया। प्रस्ताव बुधवार (स्थानीय समय) को पेश किया गया था। इसे हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने पेश किया था और इसे एडम स्मिथ और जिम हाइम्स जैसे वरिष्ठ डेमोक्रेट्स का समर्थन मिला। यह प्रस्ताव बहुत ही करीबी अंतर से पास हुआ।
अमेरिका-चीन के बीच शांति कुछ समय के लिए ही हो सकती है : पूर्व डिप्लोमैट
दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों की पूर्व सहायक सचिव निशा देसाई बिस्वाल ने कहा है कि ऐसा लगता है कि अमेरिका और चीन अपने संबंधों में स्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं। यह ज्यादातर आर्थिक वजहों से हो रहा है, लेकिन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के बीच टकराव की असली वजहें वैसी ही हैं।
बिस्वाल ने कहा कि बीजिंग के प्रति वाशिंगटन का मौजूदा नजरिया तनाव को मैनेज करने और ज्यादा भरोसेमंद संबंध बनाने पर केंद्रित है, खासकर इस साल के आखिर में होने वाली राजनीतिक रूप से अहम घटनाओं से पहले।
बिस्वाल ने कहा, "मुझे लगता है कि अमेरिका अभी ऐसे मोड में है, जहां वह चीन के साथ एक स्थिर संबंध बनाना चाहता है। इसके पीछे मजबूत आर्थिक वजहें भी हैं। इस साल के आखिर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका की संभावित यात्रा, बड़ी रणनीतिक असहमतियों के बजाय तुरंत की आर्थिक प्राथमिकताओं से तय हो सकती है।"
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि मिडटर्म चुनावों से ठीक पहले इस पतझड़ में राष्ट्रपति शी का एक आपसी दौरा कुछ ज्यादा जरूरी आर्थिक मुद्दों पर फोकस करेगा, जिन पर वे निवेश, खेती-बाड़ी के व्यापार वगैरह के मामले में गौर करना चाहेंगे।"
हालांकि, बिस्वाल ने मौजूदा डिप्लोमैटिक बातचीत को वाशिंगटन और बीजिंग के बीच संबंधों में बड़े बदलाव के सबूत के तौर पर देखने के खिलाफ चेतावनी दी।
तीन दिवसीय भारत दौरे पर आएंगे नेपाल के विदेश मंत्री खनाल
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल 5 से 7 जून तक भारत की आधिकारिक यात्रा पर होंगे। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को यह जानकारी दी। यह यात्रा भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के निमंत्रण पर हो रही है।
यह तीन दिवसीय यात्रा सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष रबि लामिछाने की हालिया भारत यात्रा के बाद हो रही है। वो 1 जून को नई दिल्ली पहुंचे थे।
खनाल ने अप्रैल में नौवें हिंद महासागर सम्मेलन के दौरान मॉरीशस में जयशंकर और अन्य क्षेत्रीय नेताओं से मुलाकात की थी, लेकिन 27 मार्च को नई सरकार के गठन के बाद यह उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा होगी।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा, "खनाल नई दिल्ली में जयशंकर के साथ औपचारिक वार्ता करेंगे। दोनों पक्ष व्यापार, निवेश, संपर्क (कनेक्टिविटी), ऊर्जा और पीपल-टू-पीपल संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा करेंगे।"
मंत्रालय के अनुसार, यह यात्रा नेपाल और भारत के बीच उच्च-स्तरीय संपर्कों की नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे दोनों पड़ोसी देशों के लंबे समय से चले आ रहे बहुआयामी संबंध और मजबूत होंगे। खनाल 7 जून को काठमांडू लौटेंगे।
विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि 6 जून को द्विपक्षीय वार्ता होगी। इस दौरान रेलवे, सड़क, हवाई और जन-से-जन संपर्क बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद रबि लामिछाने ने कहा था कि साझा सांस्कृतिक विरासत, डिजिटल कॉरिडोर और निर्बाध संपर्क के आधार पर नेपाल और भारत आपसी विश्वास और विकास पर आधारित साझेदारी को नई ऊंचाई दे सकते हैं।
नेपाल लंबे समय से लुंबिनी और पोखरा के नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के लिए भारत से छोटे हवाई मार्गों की मांग करता रहा है। इसके अलावा भारत ने प्रस्तावित रक्सौल-काठमांडू रेलवे परियोजना की व्यवहार्यता रिपोर्ट भी तैयार की है।
डब्ल्यूएचओ के साथ मिलकर इबोला रोकथाम में सहयोग करेगा ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने गुरुवार को मध्य अफ्रीका में फैले इबोला प्रकोप से निपटने और बीमारी को आगे फैलने से रोकने के लिए वैश्विक प्रयासों में आर्थिक मदद देने की घोषणा की। विदेश मंत्री पेनी वोंग और अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री ऐन एली ने एक संयुक्त बयान में कहा कि ऑस्ट्रेलिया इस पहल के लिए 50 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (करीब 36 लाख अमेरिकी डॉलर) की सहायता देगा।
बयान में कहा गया, "ऑस्ट्रेलिया की यह मदद इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के माध्यम से दी जाएगी। इससे जरूरी चिकित्सा सेवाएं और दवाइयां उपलब्ध कराई जाएंगी, स्वच्छ पानी और सफाई से जुड़ी सेवाओं को बेहतर बनाया जाएगा, बीमारी की निगरानी और तैयारी को मजबूत किया जाएगा, और स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था को भी सशक्त किया जाएगा।"
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) में चल रहे इबोला प्रकोप के दौरान अब तक 344 मामलों की पुष्टि हुई है और 60 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, युगांडा में 15 मामले सामने आए हैं और एक व्यक्ति की मौत हुई है।
सिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, डब्ल्यूएचओ ने बुधवार को जिनेवा में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बेहतर समन्वय और लगातार प्रयासों की वजह से डीआरसी में इबोला प्रकोप से निपटने की स्थिति अब धीरे-धीरे सुधर रही है।
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस, जो हाल ही में डीआरसी के दौरे से लौटे हैं, ने कहा कि वहां लोगों और संस्थाओं की प्रतिबद्धता देखकर उन्हें काफी हौसला मिला है। उन्होंने कहा, "जो मैंने वहां देखा, उससे मुझे उम्मीद मिली है, हालांकि अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं।"
टेड्रोस ने बताया कि डीआरसी में 344 मामलों की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें 60 लोगों की मौत हुई है। ये मामले तीन प्रांतों के 24 स्वास्थ्य क्षेत्रों में फैले हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संदिग्ध मामलों की संख्या पिछले सप्ताह 1,000 से ज्यादा थी, जो अब घटकर 116 रह गई है।
टेड्रोस ने कहा, "बीमारी को फैलने में काफी बढ़त मिल चुकी थी और हम अभी भी कुछ हद तक पीछे हैं, लेकिन डीआरसी सरकार के नेतृत्व में हम तेजी से स्थिति को संभाल रहे हैं।"
इजरायल और लेबनान के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में युद्धविराम पर बनी सहमति
इजरायल और लेबनान ने वॉशिंगटन में दो दिनों तक चली अमेरिका की मध्यस्थता वाली बातचीत के बाद युद्धविराम लागू करने पर सहमति जताई है। दोनों देशों ने आगे भी सीधे बातचीत जारी रखने और सुरक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाने का वादा किया है, ताकि दक्षिणी लेबनान में किसी भी गैर-सरकारी सशस्त्र समूह की वापसी रोकी जा सके।
यह समझौता दो और तीन जून को अमेरिकी विदेश विभाग में हुई अमेरिका, इजरायल और लेबनान की चौथी उच्च स्तरीय त्रिपक्षीय बैठक के बाद सामने आया।
इस फैसले की घोषणा करते हुए अमेरिकी विदेश विभाग के काउंसलर डैन हॉलर ने कहा, “अमेरिका के नेतृत्व में हुई बातचीत के नतीजे के तौर पर इजरायल और लेबनान ने युद्धविराम लागू करने पर सहमति दी है।”
तीनों देशों के संयुक्त बयान के मुताबिक, यह युद्धविराम इस शर्त पर लागू होगा कि “हिज्बुल्लाह की ओर से पूरी तरह से गोलीबारी बंद हो और उसके सभी लड़ाके दक्षिण लिटानी क्षेत्र से हट जाएं।”
यह भी तय हुआ है कि जल्द ही कुछ 'पायलट जोन' बनाए जाएंगे, जहां लेबनान की सेना पूरी तरह नियंत्रण संभालेगी।
डैन हॉलर ने कहा, “दोनों पक्षों ने अमेरिका के मार्गदर्शन में इस बात पर सहमति दी है कि ऐसे पायलट जोन जल्दी बनाए जाएंगे, जहां लेबनानी सेना पूरी तरह नियंत्रण रखेगी और किसी भी गैर-सरकारी सशस्त्र समूह की मौजूदगी नहीं होगी।”
बयान में कहा गया कि ये कदम आगे चलकर दोनों देशों के बीच 'एक व्यापक शांति और सुरक्षा समझौते' की स्थिति बनाने में मदद करेंगे।
तीनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि इजरायल और लेबनान के भविष्य के रिश्ते उनकी अपनी सरकारों की ओर से तय किए जाने चाहिए, किसी बाहरी ताकत की ओर से नहीं।
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