‘मुझे लोगों को सत्याग्रह का रहस्य समझाने का उत्साह था’ 

प्रस्तुत अंश महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ से लिया गया है। गांधी की पत्रिका “नवजीवन” में 1925 से इसका प्रकाशन किस्तों में शुरू हुआ और यह किताब 1927 में छपी।

महात्मा गांधी/ फोटो: Getty Images
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नवजीवन डेस्क

सरकारी मेहरबानी से ‘क्रॉनिकल’ बंद हो गया। जो लोग ‘क्रॉनिकल’ की व्यवस्था के कर्ताधर्ता थे, वे ही लोग ‘यंग इंडिया’ की व्यवस्था पर भी निगरानी रखते थे। वे थे उमर सोबानी और शंकरलाल बैकर। इन दोनों भाईयों ने मुझे सुझाया कि मैं ‘यंग इंडिया’ की जिम्मेदारी अपने सिर लूं। और ‘क्रॉनिकल’ के अभाव की थोड़ी पूर्ति करने के विचार से ‘यंग इंडिया’ को हफ्ते में एक बार के बदले दो बार निकालना उन्हें और मुझे ठीक लगा। मुझे लोगों को सत्याग्रह का रहस्य समझाने का उत्साह था। पंजाब के बारे में मैं और कुछ नहीं तो कम के कम उचित आलोचना तो कर ही सकता था, और उसके पीछे सत्याग्रह-रूपी शक्ति है इसका पता सरकार को था ही। अतएव इन मित्रों की सलाह मैने स्वीकार कर ली।

किन्तु अंग्रेजी द्वारा जनता को सत्याग्रह की शिक्षा कैसे दी जा सकती थी? गुजरात मेरे कार्य का मुख्य क्षेत्र था। भाई इंदुलाल याज्ञनिक इस समय उमर सोबानी और शंकरलाल बैकर की मंडली में थे। वे ‘नवजवीन’ नामक गुजराती मासिक चला रहे थे। उसका खर्च भी उक्त मित्र पूरा करते थे । भाई इंदुलाल और उन मित्रों ने यह पत्र मुझे सौंप दिया और भाई इंदुलाल ने इसमें काम करना भी स्वीकार किया। इस मासिक को साप्ताहिक बनाया गया।

इस बीच ‘क्रॉनिकल’ फिर जी उठा, इसलिए ‘यंग इंडिया’ पुन: साप्ताहिक हो गया और मेरी सलाह के कारण उसे अहमदाबाद ले जाया गया। दो पत्रों को अलग-अलग स्थानों से निकालने में खर्च अधिक होता था और मुझे अधिक कठिनाई होती थी। ‘नवजीवन’ तो अहमदबाद से ही निकलता था। ऐसे पत्रों के लिए स्वतंत्र छापा खाना होना चाहिए, इसका अनुभव मुझे ‘इंडियन ओपीनियन’ के संबंध में हो चुका था। इसके अतिरिक्त यहां के उस समय के अखबारों के कानून भी ऐसे थे कि मैं जो विचार प्रकट करना चाहता था, उन्हें व्यापारिक दृष्टि से चलनेवाले छापाखानों के मालिक छापने में हिचकिचाते थे। अपना स्वतंत्र छापखाना खड़ा करने का यह भी एक प्रबल कारण था और यह काम अहमदाबाद में ही सरलता से हो सकता था । अतएव ‘यंग इंडिया’ को अहमदाबाद ले गए।

इन पत्रों के द्वारा मैने जनता को यथाशक्ति सत्याग्रह की शिक्षा देना शुरू किया। पहले दोनों पत्रों की थोड़ी सी प्रतियां खपती थी। लेकिन बढ़ते-बढ़ते वे चालिस हजार के आसपास पहुंच गई। ‘नवजीवन’ के ग्राहक एकदम बढ़े, जबकि ‘यंग इंडिया’ के धीरे-धीरे बढ़े। मेरे जेल जाने के बाद इसमे कमी हुई और आज दोनों की ग्राहक की संख्या 8000 से नीचे चली गयी है।

इन पत्रों में विज्ञापन न लेने का मेरा आग्रह शुरू से ही था। मैं मानता हूं कि इसमे कोई हानी नहीं हुई और इस प्रथा के कारण पत्रों के विचार-स्वतांत्र्य की रक्षा करने में बहुत मदद मिली। इन पत्रों द्वारा मैं अपनी शांति प्राप्त कर सका। क्योंकि यद्धपी मै सविनय कानून-भंग तुरन्त ही शुरू नहीं कर सका, फिर भी मैं अपने विचार स्वतंत्रता-पूर्वक प्रकट कर सका, जो लोग सलाह और सुझाव के लिए मेरी ओर देख रहे थे, उन्हें मैं आश्वासन दे सका। और मेरा ख्याल है कि दोनों पत्रों ने उस कठिन समय में जनता की अच्छी सेवा की और फौजी कानून के जुल्म को हल्का करने में हाथ बंटाया।

Published: 18 Aug 2017, 4:19 PM
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