फिल्मी पोस्टर के अतीत से लेकर वर्तमान तक की यात्रा का दस्तावेज़ है इकबाल रिज़वी की ‘पोस्टर बोलते हैं’

इकबाल रिज़वी की किताब पोस्टर बोलते हैं का लोकार्पण करते प्रख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल। तस्वीर में (बाएं से) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी, फिल्म अभिनेता अतुल तिवारी, लेखक और पत्रकार इकबाल रिज़वी, फिल्मकार श्याम बेनेगल और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र न्यास के अध्यक्ष राम बहादुर राय

एक कागज के टुकड़े पर एक पूरी की पूरी फिल्म की कहानी दिखा देना एक कमाल से कम नहीं है, यही कमाल करता रहा है फिल्मों का पोस्टर। फिल्मी पोस्टरों के अतीत से लेकर वर्तमान तक की दिलचस्प यात्रा से रूबरू कराती है इकबाल रिजवी की ‘पोस्टर बोलते हैं’। हिंदी दिवस के मौके पर दिल्ली में इस किताब का लोकार्पण हुआ।

पहले भी होती थी, और आज भी, फिल्म पब्लिसिटी पर उतनी ही मेहनत हुआ करती थी, जितनी फिल्म की परिकल्पना से लेकर उसके बनने और रिलीज़ होने तक। फिल्मों की पब्लिसिटी की सबसे सशक्त माध्यम उसका पोस्टर ही होता था, जिसे देखकर अनुमान लगाया जाता था कि फिल्म कैसी होगी। पोस्टर आज भी महत्वपूर्ण हैं, तब भी अहम थे जब फिल्में खामोश हुआ करती थीं और पोस्टर बोलते थे।

पोस्टर बोलते हैं, यह उस किताब का नाम है जिसे हिंदी दिवस के मौके पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र- आईजीएनसीए ने प्रकाशित किया है। इस फिल्म का लोकार्पण दिल्ली में प्रख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल ने किया। इस फिल्म के अध्येता वरिष्ठ पत्रकार इकबाल रिज़वी हैं। इकबाल रिज़वी आईजीएनसीए में फिल्मों पर शोध कर रहे हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिनेमा और साहित्य पर इकबाल रिज़वी लंबे समय से काम कर रहे हैं। उनकी इस किताब में 13 अध्याय हैं जिनमें फिल्मी पोस्टरों का इतिहास और वर्तमान दौर में पोस्टरों की महत्ता तक को वर्णित किया गया है।

पुस्तक का आवरण

पुस्तक का आवरण

‘पोस्टर बोलते हैं...’ के बारे में इकबाल रिज़वी कहते हैं कि, “फिल्मी पोस्टर दरअसल कला का ही एक हिस्सा हैं और उन्हें इसी रूप में देखा जाना चाहिए।” इकबाल रिज़वी मानते हैं कि पोस्टर महज़ फिल्म पब्लिसिटी का माध्यम ही नहीं, वरन् दर्शकों के साथ संवाद का माध्यम होने के साथ ही फिल्मों का सचित्र इतिहास भी हैं। इकबाल रिज़वी को इस बात का अफसोस है कि फिल्म पोस्टरों को कला में वह स्थान हासिल नहीं हुआ जो मिलना चाहिए था।

इस किताब में फिल्मों के पोस्टर की शुरुआत, उनके महत्व और पोस्टर बनाने में लगने वाले सृजनात्मक परिश्रम का जिक्र है। पोस्टर बनाने की बारिकयों और समय-समय पर उसमें हुए दलाव के साथ ही पोस्टर कलाकारों के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है। पोस्टर बनाने की प्रक्रिया और पोस्टर बनाने वाले कलाकारों के बारे में रोचक किस्से किताब को पठनीय बनाते हैं।

इकबाल रिज़वी लंबे समय से इस पुस्तक पर काम कर रहे थे। वे बताते हैं कि इस किताब को लिखना काफी दुश्कर भी था, क्यों कि समय के साथ पोस्टरों का समूचा परिदृशय बदल चुका था और बहुत से पोस्टर कलाकार भी जीवित नहीं रहे। हिंदी दिवस पर लोकार्पित इस पुस्तक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस विषय में हिंदी में संभवत: यह पहली मौलिक पुस्तिक है।

किताब के विषय में फिल्म और थिएटर अभिनेता अतुल तिवारी का कहना था कि जब फिल्में खामोश थी, तब पोस्टर बोलते थे। और आज भी जब फिल्में खामोश हैं, तो पोस्टर बोल रहे हैं।

इस किताब की प्रस्तावना इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी ने लिखी है। वे कहते हैं कि, “कथा, कला और काल इन तीन शब्दों को मिलाकर एक नए शब्द की रचना की जाए तो निश्चय ही वह पोस्टर होगा, जो किसी भी घटना का कालजयी चित्रण प्रस्तुत करता है। एक कागज के टुकड़े पर एक पूरी की पूरी फिल्म की कहानी दिखा देना एक कमाल से कम नहीं है, यही कमाल करता रहा है हमारा पोस्टर..” उनके मुताबिक यह पुस्तक सिनेमा प्रेमियों और सिनेमा पर शोध कर रहे विद्यार्थियों के लिए उपयोगी होगी।

इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने मूक दौर की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों का उत्सव भी किया है। 16 सितंबर तक चलने वाले इस आयोजन में जिसमें दादा साहेब फाल्के की 'राजा हरिश्चंद्र', 'श्री कृष्ण जन्म और कालिया मर्दन' जैसी फिल्मों के साथ ही कुछ ऐसी फिल्में दिखाई जाएंगी जिन्होंने भारतीय सिनेमा की दिशा तय की।

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