जम्मू में भी डगमगा रही है बीजेपी की नाव

कश्मीर को मुद्दा बनाकर राष्ट्रवाद और पाकिस्तान का कार्ड खेलने की कोशिश कर रही बीजेपी की खुद जम्मू-कश्मीर में चुनावी हालत खराब है। बारामूला और अनंतनाग में तो उसके लिए कुछ है ही नहीं, जबकि जम्मू और उधमपुर में भी इस बार वह डगमगाती नाव पर सवार दिख रही है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

बीजेपी पूरे देश में जम्मू-कश्मीर को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है ताकि वह राष्ट्रवाद और पाकिस्तान का कार्ड खेल सके। लेकिन जम्मू-कश्मीर में उसकी चुनावी हालत खुद ही खराब है। बारामूला और अनंतनाग में तो उसके लिए कुछ नहीं है और जम्मू और उधमपुर में भी इस बार वह डगमगाती नाव पर सवार दिखती है। इन दोनों सीटों पर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करेगी। जबकि पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने अपना कोई भी उम्मीदवार इन दोनों सीटों पर नहीं उतारा है।

जम्मू में बीजेपी ने जुगल किशोर को दोबारा उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने रियासती सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके रमन भल्ला को मैदान में उतारा है। रसाना कांड के बाद पूर्व सांसद और कैबिनेट मंत्री रह चुके चौधरी लाल सिंह ने अपनी अलग पार्टी डोगरा स्वाभिमान संगठन का गठन कर खुद भी इस सीट के लिए नामांकन भरा है।

चौधरी लाल सिंह हाल तक बीजेपी में रहे हैं और उनकी बीजेपी वोट बैंक के बीच अच्छी पकड़ मानी जाती है। इस दफा वह बीजेपी के खिलाफ हैं और स्वाभाविक तौर पर बीजेपी समर्थकों तक भी अपनी बातों के साथ पहुंच रहे हैं। बीजेपी के लिए यह चिंता का सबब है।

उधमपुर पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी निगाह है। वजह यह है कि यहां पीएमओ के प्रभारी मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह उम्मीदवार हैं। पिछली बार यह सीट उन्होंने जीती थी। उनका मुख्य मुकाबला कांग्रेस के कद्दावर नेता डॉ कर्ण सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह से है। वह कांग्रेस उम्मीदवार हैं।

इन दोनों ही इलाकों में बेरोजगारी एक प्रमुख मुद्दे के तौर पर उभर रही है। जम्मू विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पीएचडी कर रही और तहसील जम्मू की पंचायत कोट लोअर बी पुरखू निवासी मृदु शर्मा की बात इस संदर्भमें उचित ही लगती है कि लोगों को ऐसी सरकार चाहिए जो सभी को रोजगार दे सके। आज ऐसी सरकार की जरूरत है जो नौकरियों के लिए एक समान अवसर पैदा करें।

इसके अलावा उनके लिए सुरक्षा और आतंक बड़े मुद्दे हैं। प्राथमिकताएं भले ही ऊपर-नीचे हों लेकिन जिला साम्बा की सीमांत पंचायत रामनगर के गांव काली बाड़ी निवासी पूर्व सेनाधिकारी रतन चैधरी भी यही बात कहते हैं। सैनिकों की शहादत और सीमांत इलाकों में शिक्षा की स्थिति को लेकर वह चिंतित हैं। उनका कहना है कि वह ऐसी सरकार को प्राथमिकता देंगे जो खासतौर पर इस तरफ ध्यान दे।

किश्तवाड़ जिले की दूरवर्ती तहसील पाड़र के गांव करथी में रहने वाले संजीव चैहान अपनी प्राथमिकताएं दूसरे किस्म से रखते हैं। उनका कहना है कि सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और आतंकवाद सबसे अहम मुद्दे हैं। दूरदराज इलाकों का विकास शायद ही किसी सरकार की प्राथमिकता में शामिल हो। सड़क, अस्पताल, और शिक्षा को लेकर केवल खानापूर्ति की गई है। वह कहते हैं कि वह ऐसे उम्मीदवार को चुनना चाहेंगे जो उनकी मूलभूत समस्याओं का समाधान करे और इसके अलावा आतंकवाद के साथ भी सख्ती से निपटे।

बीजेपी सीमा सुरक्षा को उभारने की हरसंभव कोशिश कर रही है लेकिन यहां सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर, उसने इसके लिए क्या और कितना किया है। राजौरी का सीमावर्ती गांव है लाम। इसी इलाके में पाक वायुसेना का विमान हाल में घुसा था जिसे लेकर इतना बवाल हुआ। यहां के निवासी शाम लाल का कहना है कि सीमा पर उनका क्या हालहै, केवल वे लोग ही जानते हैं। आए दिन होने वाली गोलाबारी से उनलोगों का जीवन नरक बना हुआ है। वह कहते हैं कि वे ऐसे व्यक्ति को चुनना चाहते हैं जो उनकी आवाज को दिल्ली तक पहुंचाए। उन्हें केवल वोट बैंक न समझा जाए और उनकी सुरक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएं।

यहां नागरिकता का मुद्दा भी कई इलाकों में उठ रहा है। अब जैसे, तहसीलमढ़ की पंचायत हल्का निवासी परमानंद का कहना है कि वह जम्मू-कश्मीर की नागरिकता से वंचित हैं क्योंकि वह पश्चिमी पाकिस्तान के रिफ्यूजी हैं। सरकारें आईं और गईं लेकिन उन जैसे लोगों के लिए कुछ नहीं किया गया। उनका कहना है कि उन जैसे लोग न तो सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन कर सकते हैं और न ही विधानसभा चुनावों में उनकी कोई हिस्सेदारी है।

कई जगह आम लोगों में निराशा का भाव भी है। यह इस ओर संकेत करता है कि कुछ लोग नोटा भी दबा सकते हैं। अब जैसे, मूलतः हीरानगर तहसील की और जम्मू विश्वविद्यालय में कॉन्ट्रैक्ट आधार पर हिंदी विषय पढ़ाने वाली भगवती देवी का कहना है कि सभी उम्मीदवार एक जैसे ही हैं। इन नेताओं का आम आदमी की रोजाना की दिक्कतों से कोई लेना-देना नहीं है। धार्मिक प्रेम और विभिन्न समुदायओ में बढ़ रही दूरियां भी चिंता का विषय हैं क्योंकि इसका खामियाजा समाज को भुगतना पड़ता है।

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