विकास की पटरी से उतरा नहीं, बल्कि पीछे जा रहा है गुजरात, इसीलिए मोदी नहीं करते अब वाइब्रेंट गुजरात की बात

इस बार के चुनाव की खास बात यह है कि मोदी भूले से भी गुजरात मॉडल की बात नहीं कर रहे। यह ऐसे ही नहीं है। देश के सामने अब ये साफ हो चुका है कि इस मॉडल से गुजरात का कोई भला नहीं हुआ और वहां उद्योग-धंधे से शिक्षा-कुपोषण तक, सभी मानदंडों पर यह मॉडल बुरी तरह विफल रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

आपने गौर किया होगा, इस बार लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ‘गुजरात मॉडल’ का गुणगान करने से परहेज कर रहे हैं। दरअसल, इसकी वाजिब वजह है। वे जिस वाइब्रेंट गुजरात की शेखी बघारते थे, उसका सच्चाई से कोई नाता नहीं था। हकीकत यह है कि गुजरात में विकास की गाड़ी रुक ही नहीं गई, बल्कि पीछे जा रही है।

7 अक्टूबर, 2001 को जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो गुजरात वाकई ‘वाइब्रेंट’ था। 1960 में अलग राज्य बनने के बाद के दो दशकों के दौरान गुजरात का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 4.4 फीसदी रहा जबकि देश का जीडीपी इस दौरान 3.3 फीसदी रहा। इसके बाद 1980 से 2000 के दो दशकों के दौरान गुजरात की अर्थव्यवस्था 14.5 फीसदी की दर से बढ़ी, जबकि देश की विकास दर 5.5 फीसदी रही। राज्य बनने के चार दशकों तक गुजरात देश के विकास का इंजन बना रहा।

साल 2002 के बाद भी राज्य की अर्थव्यवस्था की गति बनी रही और 2002 से 2014 तक यह 9.5 और 2014-2018 के बीच 8.6 फीसदी की दर से बढ़ी जबकि इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था क्रमशः 7.5 और 6.8 फीसदी की दर से बढ़ी। लेकिन गुजरात की मानव विकास के तमाम मानदंडों पर हालत बुरी है। 2002 के बाद हुए सभी चुनावों में मोदी, पाकिस्तान और मुसलमानों को गुजरात के ‘दुश्मन’ बताते रहे।

मुख्यमंत्री के तौर पर बारह साल के अपने कार्यकाल के दौरान मोदी ने खुद को उद्योगों और कारोबारी जगत के बड़े पैरोकार की तरह पेश किया और ‘वाइब्रेंट गुजरात’ शब्दावलि को गुजरातियों की उद्यमिता प्रकृति के प्रतीक के तौर पर उछाला। छह-छह माह पर वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट कराए और कारोबारियों के दल-बल के साथ कई देशों की यात्रा की। हालांकि ये समिट अपेक्षित निवेश आकर्षित करने और रोजगार के अवसर पैदा करने के मामले में शिगूफा ही साबित हुए।

2003 से 2011 के बीच हुए इन निवेश सम्मेलनों में 40 लाख करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। हालांकि इनमें से केवल आठ फीसदी, यानी तीन लाख करोड़ का निवेश ही आ सका। 2013, 2015 और 2017 में हुए निवेश सम्मेलनों में 86 लाख करोड़ के भारी-भरकम निवेश का वादा किया गया, लेकिन इनमें से वाकई कितना पैसा आया, कोई नहीं जानता क्योंकि सरकार ने इसकी कोई जानकारी नहीं दी।

एक बात काबिले गौर है, जब भी उद्योग में निवेश होगा तो रोजगार भी बढ़ेगा। जबकि रोजगार कार्यालयों में दर्ज आंकड़ों के अनुसार 2018 में बेरोजगारों की संख्या 16 लाख थी। और तो और, ग्रामीण इलाकों में 35 लाख लोग ऐसे रहे जिन्हें मनरेगा के तहत मजदूर के तौर पर सौ दिन का रोजगार मिला। इन लोगों की रोजाना 174 रुपये के हिसाब से आय हुई जो न्यूनतम मजदूरी कानून के हिसाब से काफी कम है।

2017 में मोदी सरकार ने मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर गुजरात को 11वें नंबर पर रखा। गुजरात के ग्रामीण इलाकों में 21.5 फीसदी और शहरी इलाकों में 10.1 फीसदी परिवार गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। राज्य में पांच साल से कम उम्र के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। यहां तक कि 28 फीसदी वयस्क पुरुष और 63 फीसदी वयस्क महिलाएं भी कुपोषण की चपेट में हैं। ये है ‘वाइब्रेंट गुजरात’ में गरीबी का आलम।

गुजरात सरकार खुद को ‘मेडिकल टरूिज्म’ की पसंदीदा जगह बताते नहीं थकती और दावा करती है कि पिछले पांच साल में अहमदाबाद में 200 से ज्यादा निजी अस्पताल खोले गए, लेकिन सरकारी अस्पतालों में केवल 200 बिस्तर जोड़े गए। राज्य के सरकारी अस्पतालों में 12 हजार डॉक्टरों की कमी है, पैरा-मेडिकल स्टाफ की तो बात ही न करें।

शिक्षा के मामले में भी गुजरात की हालत खस्ता है। सरकार दावा करती है कि उसने 50 निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना को प्रोत्साहित किया है, लेकिन पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले हर सौ छात्रों में से केवल पांचवा हिस्सा ही कॉलेज की पढ़ाई कर पाता है। 2018 में पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले 17 लाख छात्रों में से 11 लाख ने ही दसवीं की परीक्षा दी और इनमें से केवल 6 लाख ही पास हुए। गुजरात के प्राइमरी, सेकंडरी और हायर सेकंडरी स्कूलों में 40 हजार शिक्षकों की कमी है जबकि कॉलेजों में 10 हजार लेक्चरर कम हैं। हाल ऐसा है कि 125 कॉलेजों में प्रिंसिपल तक नहीं हैं।

मोदी सरकार की बहुप्रचारित उज्ज्वला योजना की हकीकत भी यहां आंखें खोलने वाली है। नरेंद्र मोदी ने इस योजना को महिलाओं के लिए बड़ी आजादी बताया था क्योंकि इससे उन्हें लकड़ी पर खाना बनाने में निकलने वाले धुएं से निजात मिलेगी। लेकिन हाल ही में उत्तरी और पूर्वी गुजरात के आदिवासी बहुल चार जिलों में गैरसरकारी संगठन ‘दिशा’ ने घर-घर जाकर सर्वे किया, जिसमें सरकारी दावों की हकीकत सामने आ गई।

साबरकंठा, अरावली, दाहोद और पंचमहल जिलों के जिन 1080 परिवारों का सर्वे किया गया, उनमें से 953 परिवारों ने दोबारा सिलेंडर नहीं भराए और वे दोबारा लकड़ी पर खाना बनाने लगे हैं। इन परिवारों की स्थिति और भी बुरी हो गई क्योंकि उनका नाम उज्ज्लवा स्कीम में रजिस्टर है, इसलिए उन्हें राशन की दुकानों से अब केरोसिन भी नहीं मिल रहा है।

2002 के मुस्लिम विरोधी नरसंहार के बाद ‘भक्तों’ का एक नया वर्ग तैयार हो गया है। वे मोदी को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के तौर पर प्रचारित कर रहा है जो मुसलमानों और पाकिस्तान को सबक सिखा सकता है। मुसलमान, ईसाई, आदिवासी, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता भय के वातावरण में जी रहे हैं। वैसे बुद्धिजीवी, लेखक-पत्रकार और शिक्षाविद निशाने पर हैं जो संघ परिवार की विचारधारा को नहीं मानते।

(नवजीवन के लिए गुजरात से हेमंत कुमार शाह का लेखक। शाह गुजरात विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं)

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