रिसर्च में दावा- गेम चेंजर साबित हो सकती है कांग्रेस की ‘न्याय’ योजना, बदल जाएगी देश के गरीबों की तकदीर

दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित शोध संगठनों में से एक ‘द वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ने अपने एक अध्ययन में कहा है कि ‘न्याय’ योजना गेमचेंजर साबित हो सकती है। वहीं शोध संस्थान ने बीजेपी की गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण की योजना पर सवाल उठाए हैं।

फोटो: @INC
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नवजीवन डेस्क

कांग्रेस की योजना ‘न्याय’ (न्यूनतम आय योजना) से देश की तस्वीर बदल सकती है। दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित शोध संगठनों में से एक ‘द वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ने अपने एक अध्ययन में कहा है कि ‘न्याय’ योजना गेमचेंजर साबित हो सकती है। वहीं शोध संस्थान ने बीजेपी की गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण की योजना पर सवाल उठाए हैं। संस्थान का मानना है कि गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण की योजना का फायदा सिर्फ अमीर लोग उठा सकेंगे। लैब ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में सामाजिक खर्च बहुत कम है, जबकि आर्थिक असमानता की खाई बहुत चौड़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक 1980 के दशक से ही 0.1 फीसदी धनकुबेरों ने देश की 50 फीसदी आबादी की तुलना में अधिकांश संपत्ति पर कब्जा कर रखा है।

‘द वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ने लोकसभा चुनाव के मध्यनजर बीजेपी और कांग्रेस द्वारा लॉन्च की गई योजनाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया है। लैब की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस के न्याय योजना से देश के करीब 20 फीसदी लोगों को फायदा हो सकता है। इसका मतलब यह है कि इस योजना से कुल 5 करोड़ गरीब परिवारों (एक परिवार में औसतन पांच लोगों के हिसाब से कुल 25 करोड़ लोगों) को न्यूनतम आय की गारंटी के तहत सीधे फायदा मिल सकता है। इस योजना के तहत वैसे गरीब परिवारों को हर महीने 6 हजार रुपए दिए जाएंगे जिनकी मासिका आय 12 हजार रुपए से कम है। सलाना यह रकम 72 हजार रुपए होगी। यह रकम उनके खाते में डाले जाएंगे और उनकी मासिक आय 12 हजार रुपए सुनिश्चित की जाएगी।

लैब ने अपने रिपोर्ट में कांग्रेस के ‘न्याय’ योजना को गेमचेंजर बताते हुए कहा है कि इस योजना से समाज के 33 फीसदी गरीब परिवारों का आर्थिक विकास संभव होगा। हालांकि इस योजना से देश के जीडीपी पर 1.3 फीसदी का बोझ आएगा। रिपोर्ट के मुताबकि न्यूनतम आय देने से गरीबों की जिंदगी में कई महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे। न्यूनतम आय की वजह से न केवल सामाजिक खर्च में इजाफा होगा बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी गुणात्मक बदलाव आ सकेंगे।

वहीं शोध संस्थान ने बीजेपी द्वारा गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने की बात को राजनीतिक स्टंट करार दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरक्षण पाने की शर्तों की वजह से देश की अधिकांश आबादी इसकी हकदार हो गई है। बता दें कि मोदी सरकार वैसे गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण दे रही है जिनकी 8 लाख रुपये की सालाना आय, पांच एकड़ से कम कृषि भूमि, 1000 वर्गफीट से कम क्षेत्र में घर या 900 वर्गफीट (नोटिफाइड एरिया) से कम आवासीय भूखंड या 1800 वर्गफीट (नन नोटिफाइड एरिया) से कम आवासीय भूखंड है।

रिपोर्ट के मुताबिक देश की करीब 93 फीसदी आबादी आय सीमा के हिसाब से, 96 फीसदी कृषि भूखंड पैमाने के हिसाब से, 80 फीसदी आवासीय परिसर के पैमाने से और 73 फीसदी शहरी आबादी रेससिडेंशियल प्लॉट के पैमाने की वजह से आरक्षण की हकदार हो गई है। लैब का कहना है कि अगर 50 फीसदी गरीब परिवारों को आरक्षण का लाभ देने का मकसद होता तो सलाना आय की सीमा 2 लाख रुपए होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जिसकी वजह से धनी लोग भी इस योजना का लाभ ले सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना को लागू करने के तरीकों को देखकर लगता है कि इसे राजनीतिक लाभ लेने के मकसद से लागू किया गया है।

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