लोकसभा चुनावः पांचवें चरण में अपनी सीटें बचाना बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती

लोकसभा चुनाव के चार चरणों की वोटिंग के ट्रेंड से मिले संकेतों के बाद अब पांचवें चरण का मतदान भी बीजेपी के लिए मुश्किलों भरा नजर आ रहा है। क्योंकि इस चरण की अधिकतर सीटों पर बीजेपी पिछली बार विपक्षी दलों के बिखराव की वजह से बहुत कम अंतर से जीत पायी थी।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत तमाम बीजेपी नेता ऐसे ही बार-बार नहीं कह रहे हैं कि यह सोचकर निश्चिंत होना उचित नहीं है कि बीजेपी जीत रही है, इसलिए वोटरों को अधिक-से-अधिक संख्या में पार्टी के पक्ष में वोटिंग करनी चाहिए। यह बताता है कि बीजेपी खास तौर से कई ऐसी सीटों को लेकर डरी हुई है जहां वह पिछली बार प्रतिद्वंद्वी वोटों के बिखराव के कारण या बहुत कम अंतर से जीती थी।

जैसे, लद्दाख लोकसभा सीट। यहां बीजेपी सिर्फ 36 मतों के अंतर से 2014 में जीती थी। पिछली बार जीते थुपस्तान छेवांग ने बीजेपी ही छोड़ दी है। इसलिए इस सीट को लेकर बीजेपी खुद भी मुतमईन नहीं हो सकती।

वहीं उत्तर प्रदेश में पांचवां चरण भी बीजेपी के लिए मुश्किल भरा ही है। इसी फेज में दो सीटें- अमेठी और रायबरेली भी हैं। इन पर बीजेपी पिछली बार के लहर में भी नहीं जीती थी। अमेठी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और रायबरेली से यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी इस दफा भी उम्मीदवार हैं। रायबरेली में कांग्रेस ने 63 प्रतिशत से अधिक मत लेकर जीत दर्ज की थी। इसी तरह पिछली बार अमेठी में राहुल गांधी ने 46 फीसदी से भी अधिक वोट लेकर चुनाव जीता था। इन दोनों सीटों पर इस बार एसपी, बीएसपी और आरएलडी ने अपना प्रत्याशी नहीं दिया है। इसलिए यहां तो बीजेपी की दाल गलने वाली नहीं है।

वैसे, जिस तरह अमेठी-रायबरेली में अन्य दलों ने उम्मीदवार नहीं दिए हैं, उसी तरह कांग्रेस ने भी अजित सिंह के खिलाफ मुजफ्फरनगर, जयंत चौधरी के खिलाफ बागपत, अक्षय यादव के खिलाफ फिरोजाबाद, मुलायम सिंह यादव के खिलाफ मैनपुरी, डिंपल यादव के खिलाफ कन्नौज और अखिलेश यादव के खिलाफ आजमगढ़ में उम्मीदवार नहीं दिए हैं। यह संकेत है कि चुनाव बाद कांग्रेस और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन की राजनीति क्या करवट लेने जा रही है।


पांचवें चरण में अन्य सीटें ऐसी हैं जिन पर पिछली बार बीजेपी सेकुलर दलों में बिखराव के कारण कम वोट पाने के बावजूद जीत गई थी। इस बार एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन के कारण वह परेशान है। अब जैसे, धौरहरा सीट पर बीजेपी को 34 फीसदी से भी काम वोट मिले थे, फिर भी वह चुनाव जीत गई थी। पिछले चुनाव में एसपी-बीएसपी के मतों को जोड़ दें, तो यह 44 प्रतिशत से भी अधिक है।

इसी तरह, सीतापुर में भी बीजेपी को 40 फीसदी वोट मिले थे, जबकि एसपी-बीएसपी का संयुक्त मत प्रतिशत 50 फीसदी से भी अधिक है। मोहनलालगंज में भी बीजेपी को 41 प्रतिशत से कम वोट मिले थे। यहां एसपा-बीएसपी को मिले मतों को जोड़ दें तो यह 50 फीसदी बैठता है। बांदा में भी बीजेपी महज 40 फीसदी मत लेकर जीत गई थी। जबकि एसपी- बीएसपी का संयुक्त मत प्रतिशत पिछली बार 48 प्रतिशत से भी अधिक था।

वैसे, बीजेपी ने इस गठबंधन के डर से यहां के निवृत्तमान सांसद भैरों मिश्रा का टिकट काटकर इस बार आर के सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया है। फतेहपुर में बीजेपी ने 2014 में साध्वी निरंजन ज्योति को अपना उम्मीदवार बनाया था। उन्हें 45 प्रतिशत मत मिले थे। पिछली बार मिले एसपी-बीएसपी के मतों को जोड़ दें, तो यह बीजेपी के बराबर ही होता है। निरंजन ज्योति संघ के मूल एजेंडे- हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद की ध्वजवाहक हैं।

बीजेपी ने कौशांबी सीट पिछली बार 37 प्रतिशत से भी कम मत लाकर जीत ली थी। यहां एसपी-बीएसपी के मतों को जोड़ दें, तो यह लगभग 54 फीसदी बनता है। ऐसा सेकुलर दलों के वोट विभाजन की वजह से हुआ। बाराबंकी और फैजाबाद में भी ऐसा ही था। बहराइच में बीजेपी ने 2014 में सावित्री बाई फुले को उम्मीदवार बनाया था। इस बार वह कांग्रेस से यहां उम्मीदवार हैं।

पिछले चुनाव में कैसरगंज से बीजेपी के बृजभूषण शरण सिंह 40 फीसदी मत लेकर जीत गए थे। उनकी छवि बाहुबली वाली है। मगर इसी सीट पर एसपी-बीएसपी के मतों को जोड़ दें, तो यह लगभग 48 प्रतिशत बनती है। पिछली बार गोंडा सीट पर एसपी-बीएसपी का संयुक्त वोट प्रतिशत 35 से अधिक था। यहां बीजेपी गठबंधन से मतों का अंतर सिर्फ 6 प्रतिशत का है। अगर बीजेपी का थोड़ा वोट भी कम हुआ, तो बीजेपी इस बार इस सीट पर हार सकती है।

वैसे भी, लोकसभा चुनाव के पिछले चार चरणों में उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन बीजेपी पर भारी पड़ा था इसलिए अगले चरणों में भी वह बीजेपी को परेशान किए रहेगा।

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