‘द इकोनॉमिस्ट’ के लिए ‘भारत की आत्मा के संघर्ष’ का चुनाव है यह, और क्या कहते हैं दुनिया के दूसरे बड़े अखबार !

लोकसभा चुनाव को द इकोनॉमिस्ट ने भारत की आत्मा का संघर्ष करार दिया है। उसकी नजर में मोदी सरकार के दौर में लोकतंत्र खतरे में है। दुनिया के बाकी प्रतिष्ठित और बड़े अंतरराष्ट्रीय अखबार देश के चुनाव के बारे में क्या कहते हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
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आशीस रे

दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में से एक द इकोनॉमिस्ट ने 5 साल पहले आम चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में लिखा था। एक तरह से कांग्रेस के लिए अपील की थी द इकोनॉमिस्ट ने। लेकिन भारत के मतदाताओं ने इसे नजरंदाज़ कर दिया था। इस बार के चुनाव में द इकोनॉमिस्ट ने ऐसा तो नहीं किया, लेकिन उसकी नजर में इस बार का लोकसभा चुनाव ‘भारत की आत्मा के लिए संघर्ष’ है।

द इकोनॉमिस्ट ने आगे लिखा है, “पाकिस्तान को रणनीतिक प्रतिद्धंदी के बजाय सभ्यता के लिए खतरे के रूप में पेश करने वाले मोदी के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद ने मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी को एकदम हाशिए पर पहुंचा दिया है।” इसी लेख में आगे लिखा है कि, “अब हिंदुत्ववाद के हिसाब-किताब का समय आ गया है।”

द इकोनॉमिस्ट के अलावा दुनिया भर में सम्मान और साख के साथ प्रसिद्ध बीबीसी की वेबसाइट पर भी हाल की एक हेडलाइन ने ध्यान खींचा। इसमें लिखा गया था, “राहुल गांधी: क्या यह भारतीय नेता पीएम मोदी को हटा सकता है?” इस लेख में लिखा गया, “राहुल गांधी ने संघर्षरत कांग्रेस में नई जान फूंकी और आक्रामकता के साथ चुनावों का एजेंडा तय किया।” इसमें आगे कहा गया, “राहुल गांधी अपनी छवि तोड़कर बाहर आ चुके हैं, उनका सोशल मीडिया कैंपेन बहुत स्मार्ट हो गया है और वह सरकार के नोटबंदी के विवादित फैसले, बेरोजगारी, असहिष्णुता और आर्थिक मंदी पर मजबूती के साथ बहस करते हैं।”

वहीं ब्रिटेन के सबसे बड़े वित्तीय अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने भी भारत के चुनाव की वृहद कवरेज की है। ‘नरेंद्र मोदी अब भारतीय कारोबारियों को मूर्ख नहीं बना सकते’ इस शीर्षक के साथ अखबार ने वह खबर लिखी जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन मुकेश अंबानी द्वारा कांग्रेस उम्मीदवार मिलिंद देवड़ा का समर्थन करने की बात है। अखबार ने लिखा कि, “इससे संकेत हैं कि जो लोग मानते हैं कि मुकेश अंबानी और पीएम मोदी के बीच मजबूत रिश्ते हैं, वे भुलावे में हैं।“

अखबार ने हाल के ओपीनियन पोल की बात करते हुए लिखा है, “90 करोड़ वोटरों वाले देश के लिए यह एक खतरनाक बात है।” अखबार जोर देकर कहता है कि, “मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है देश की दो तिहाई बैंकिंग परिसंपत्तियों वाले बैंकों की बिगड़ती हालत और पिछले कई सालों में कार्पोरेट को दिए कर्ज का लगातार एनपीए में बदलना।”

ब्रिटेन के वाम विचार वाले अखबार गार्डियन ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में बौद्ध अध्ययन के प्रोफेसर रूपर्ट जेथिन ने “प्राचीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता का एक अध्याय” का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है, “कोई सरकार या राज्य द्वारा धार्मिक सहिष्णुता के विचारों को प्रोत्साहित करने के शुरुआती उदाहरण प्राचीन भारत में मिलते हैं। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के मध्य में पराक्रम शासक अशोक का साम्राज्य अपने समय का सबसे बड़ा साम्राज्य था। उसने अपने राज्य में कई जगह यह लिखवाया था, ‘राजा...सभी धार्मिक मतों का सम्मान करता है, उन्हें विभिन्न उपहार और सम्मान देता है। लेकिन वह उपहारों और सम्मान को इतना महत्व नहीं देता जितना कि धार्मिक मतों के बुनियादी सिद्धांतों को। इसका मूल यह है कि सभी स्वरों की रक्षा करता है ताकि कोई सिर्फ अपने मत का बखान न करे और दूसरे मत की बुराई न करे। साथ ही किसी भी मत का प्रदर्शन किसी भी मौके पर सादगी से हो। बाकी दूसरे मतों का सम्मान हर अवसर पर किया जाए।’

भारत में चुनावों के मौके पर इस उदाहरण को पेश करना काफी रोचक है।

इसके अलावा न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी एक लेख प्रकाशित किया। इसका शीर्षक है, “भारत का चुनावी मौसम, मोदी के पतन पर बमबारी का विघ्न...” इस लेख में कहा गया है, “चुनावों की घोषणा के बाद दोबारा सत्ता में आने की कोशिश में मोदी काफी कमजोर नजर आ रहे थे...।” इसी लेख में आगे कहा गया है कि, “कश्मीर में विस्फोट और बाद में पाकिस्तान के साथ सैन्य आंखमिचौली ने शायद मोदी के पतन में विघ्न डाला है।” इसी लेख में आगे है, “बाहस से मोदी की इस बात के लिए खूब आलोचना हो रही है कि वे चुनाव जीतने के लिए युद्ध तक का जोखिम उठाने को तैयार हैं, लेकिन जब एक भारतीय पायलट को पाकिस्तानी सीमा में बंदी बना लिया गया तो कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने लिखा कि मोदी का दुस्साहस उलटा पड़ गया।”

“दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव” शीर्षक से वॉशिंगटन पोस्ट लिखता है, “भारत में नरेंद्र मोदी ने उम्मीदों के बजाय डर का माहौल बनाया है।” भारत को बदलने के मोदी के वादे को याद दिलाते हुए अखबार ने कहा है, “पांच साल पहले किए गए लंबे-चौड़े वादे पूरे नहीं हुए। अर्थव्यवस्था फली-फूली तो लेकिन नौकरियां पैदा नहीं हुईं। किसान बढ़ती लागत और कर्ज से परेशान हैं।” अखबार ने यह भी लिखा है कि, “(बालाकोट) एयरस्ट्राइक से किसका क्या नुकसान हुआ यह भी नहीं पता।”

उधर फ्रांस के अखबार ले मोंडे में मशहूप अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने न्याय योजना की तारीफ की है। कांग्रेस ने न्याय योजना के लिए पिकेटी की भी सलाह ली थी। वे लिखते हैं, “यह योजना सबसे गरीब 20 फीसदी भारतीयों के लिए है। इसपर कुल जीडीपी का एक फीसदी से थोड़ा ज्यादा खर्च होगा, लेकिन यह वहन किया जा सकता है।” उन्होंने बुनियादी मुद्दों की वकालत करते हुए कहा है कि, “मोदी को बड़े-बड़े कार्पोरेट चंदा दे रहे हैं, जो कि भारत में बिल्कुल भी नियमित नहीं है।”

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