वे 10 रिपोर्ट्स जिन्हें देखने के बाद सामने आ जाएगी देश की हकीकत और खुल जाएगी सरकारी दावों की पोल

देश की अर्थव्यवस्था को लेकर संकेत चिंता पैदा करने वाले हैं। हवाओं की जो रफ्तार है, वह देश में आने वाले दिनों के और बुरा होने के संकेत दे रही है। लेकिन न संसद और न ही मीडिया इनके निहितार्थ बता रहा और न ही इस जंजाल से निकलकर आगे बढ़ने का तरीका सुझा रहा है।

फोटो : सोशल मीडिया
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शालिनी सहाय

मेरे छोटे-से शहर की कहानी, दरअसल, भारत की कहानी है। यहां नए-नए पित्जाहट, केएफसी, डोमिनोज, चमक-दमक वाले मॉल और सुपरमार्केट खुले हैं लेकिन फाइबर ऑप्टिक इंटरनेट की सेवाएं परेशान करने वाली हैं। जोमैटो/स्विगी से भी सामान आ जाते हैं! हम क्या मिस कर रहे हैं? सड़कें, पटरियां, कूड़ा डिस्पोजल और सार्वजनिक प्रशासन का किसी किस्म का आभास!
- निखिल इनामदार
आपका रोजाना का खर्चा 14 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। आपके करों की दरें उसी तरह हैं। एफडी/पीपीएफ पर आपके निवेश की रिटर्न दरें कम ही हो रही हैं। आपकी सेविंग की रिटर्न दरें 3 प्रतिशत से भी कम हैं। खाने-पीने के सामान महंगे ही होते गए हैं। कपड़े खरीदने जाओ, तो उन पर टैक्स ज्यादा लग रहे हैं। किसी भी तरह के वाहन से चलो, तेल महंगा हो गया है। लेकिन क्या उस हिसाब से आपका वेतन बढ़ रहा है?
- रजत दत्ता
मुद्रास्फीति गरीबों को मारती है, जो आबादी के विशिष्ट 5 प्रतिशत लोग हैं, उन्हें नहीं। जो सबसे नीचे के स्तर पर रहने वाले 50 फीसदी लोग हैं, वे झेलते हैं। धनी-मानी लोग की छुट्टियों में घूमने की जगह आइसलैंड से मालदीव हो जाएगी। हर ट्वीट के लिए दो रुपये कमाने वाले आप एक वक्त का खाना नहीं खा पाएंगे।
- रूबी रॉय
लेकिन हम उम्मीद ही क्या कर सकते हैं? सत्ताधारी पार्टी मंदिर बनाने में बिजी है, तो अपने को विकल्प होने का दावा करने वाली दूसरी पार्टी मंदिरों की मुफ्त यात्राओं का वादा करने में व्यस्त है।
- अलेक्स चैंडी

ये टिप्पणियां देश के मध्यवर्ग में बढ़ रही चिंता और दुश्वारियों को प्रतिबिंबित करती हैं। चीजों के दाम बढ़ रहे हैं और उसी दर से बेरोजगारी, तो उसी रफ्तार से उनकी चिंताओं में भी बढ़ोतरी हो रही है। जो बूढ़े-बुजुर्ग हैं, वे बेबस होकर देख रहे हैं कि उन्होंने नौकरी के दौरान जो बचत की थी, वह कम सूद दरों की वजह से और घटती जा रही हैं। सचमुच, भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर संकेत चिंता पैदा करने वाले हैं। हवाओं की जो रफ्तार है, वह देश में आने वाले दिनों में और बुरा होने के संकेत दे रही है। लेकिन न तो संसद और न ही मीडिया इनके निहितार्थ बता रहा और न ही इस जंजाल से निकलकर आगे बढ़ने का तरीका सुझा रहा है। ऐसे में, लोग अपने हाथ ही मल रहे हैं।

हालात कितने गंभीर हैं, इसके कुछ संकेत इसी माह मिले हैं। लेकिन देश के अधिकतर लोग मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम विभाजन, भारत विभाजन और औरंगजेब तथा अयोध्या, काशी एवं मथुरा के गौरव पर बात कर रहे हैं। इन 10 रिपोर्ट्स को देखकर शायद भारत के लोग कुछ सोचें।

  1. नवंबर में थोक महंगाई दर 14.2 प्रतिशत थी। यह 30 साल में सबसे अधिक है। लेकिन अधिकांश अखबारों ने यह खबर पहले पन्ने के लायक नहीं समझी।

  2. उपभोक्ता विश्वास पर आरबीआई के सर्वे ने बताया कि भारतीय उपभोक्ता नवंबर में निराशावादी बने रहे।

  3. बैंकों ने 2014-15 से अब तक 10.72 लाख करोड़ रुपये माफ कर दिए हैं। 2014 से ही नरेन्द्र मोदी सरकार है। पिछले वित्त वर्ष में 2,02,781 करोड़ के बैड लोन थे।

  4. विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में देश की कुल राष्ट्रीय आय में आबादी के 1 प्रतिशत ने एक का पांचवां हिस्सा (21.7 प्रतिशत) कमाया जबकि निचले 50 प्रतिशत ने सिर्फ 13.1 प्रतिशत धन अर्जित किया। इस रिपोर्ट के मुताबिक, ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी ने 2021 में देश की राष्ट्रीय आय का 57 प्रतिशत तक हासिल किया।

  5. यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 13 कॉरपोरेट्स को दिए लगभग 2.85 लाख करोड़ खो दिए क्योंकि उनका उपयोग सरकार ने यस बैंक और आईएल एंड एफएस को उबारने के लिए किया। 13 कॉरपोरेट्स की उधारी 4,86,800 करोड़ थी जिसे 1,61,820 करोड़ में ‘सलटा लिया गया’ जिससे 2,84,980 करोड़ का घाटा हुआ।

  6. नवंबर में खुदरा महंगाई दर 4.91 प्रतिशत थी। यह तीन माह में सबसे अधिक है। अक्तूबर में यह 4.48 प्रतिशत थी जबकि सितंबर में 4.35 प्रतिशत। ग्रामीण उपभोक्ता महंगाई दर 5.54 प्रतिशत थी।

  7. सेमीकंडक्टर की कमी और खराब आर्थिक सुधार की वजह से पिछले साल नवंबर की तुलना में इस साल नवंबर में पैसेंजर वाहन बिक्री 19 प्रतिशत तक गिर गई।

  8. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) के अनुसार, मार्च, 2021 में भारत की श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) 41.38 प्रतिशत थी लेकिन नवंबर में यह गिरकर 40.15 प्रतिशत हो गई। यह इस बात का संकेत है कि रोजगार योग्य भारतीय काम तलाश ही रहे हैं। एशिया में भी यह आंकड़ा निम्नतम है और इसे इस बात के लिए उत्तरदायी माना गया कि या तो महिलाएं काम से अलग रहना चुन रही हैं या उन्हें अर्जित करने योग्य रोजगार नहीं मिल रहा है। सीएमआईई के अनुसार, एलपीआर मार्च, 2017 में 47 प्रतिशत था जो पिछले चार साल में तेजी से गिरकर 40 प्रतिशत हो गया। अधिकांश गिरावट कोविड महामारी से पहली हुई।

  9. तेल मंत्रालय के पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण सेल के आंकड़े के अनुसार, इस साल नवंबर में पिछले साल नवंबर की तुलना में तेल ईंधन की मांग 11.4 प्रतिशत तक गिर गई।

  10. विश्व असमानता रिपोर्ट ने बताया कि भारत के सबसे गरीब 50 प्रतिशत लोग आज उतना ही कमाते हैं जितना महामंदी के बाद 1932 में सबसे गरीब 50 प्रतिशत अमेरिकी कमाते थे।


सरकारी कर्मचारी और मध्यवर्ग के वे लोग खुशकिस्मत हैं जिनकी नौकरी बची हुई है। शिक्षित युवाओं की बड़ी संख्या ऐसी है जिनके पास रोजगार नहीं है और वे जैसे-तैसे गाड़ी खींच रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों और वरिष्ठजनों ने बैंकों में मियादी जमा खाते की दरों के 4.5 से 5 प्रतिशत तक हो जाने पर निराशा जताई है। एक वरिष्ठजन ने शिकायत की, ‘यह बेतुकी बात है। बमुश्किल 2-3 साल पहले यह दर 7-7.4 प्रतिशत तक थी। रिटायर कर चुके लोगों की आय का यह प्राथमिक स्रोत था लेकिन सरकार न तो सामाजिक सुरक्षा और न ही स्थिर सूद दर सुनिश्चित कर पा रही है।’ उन्होंने बताया कि अपनी बुजुर्गियत के दिनों के लिए घर बनवाने के खयाल से उन्होंने अपनी आय में से बहुत मुश्किल से थोड़ा-थोड़ा बचाकर कुछ पैसे इकट्ठा किए। इन सबके लिए उन्होंने जवानी कुर्बान कर दी और अब जब वह बूढ़े हो गए हैं, तो बचाए गए पैसे भी खो दे रहे हैं।

एक अन्य मॉर्निंग वॉकर कुछ ज्यादा ही दुखी नजर आए। उन्होंने कहा, कोई भी इन मुद्दों में रुचि नहीं रख रहा। ऐसा लगता है कि अधिकतर लोग अचानक ही खूब धनी-मानी हो गए हैं। मैं नहीं जानता कि ऐसा कैसे हो गया। रिटायर लोग और वरिष्ठजन भी इन मुद्दों को लेकर चिंतित नहीं हैं।

वैसे, पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी ने भी ट्वीट किया कि बढ़ती हुई बेरोजगारी ऐसा मुद्दा है जिसकी अब बहुत दिनों तक अनदेखी नहीं की जा सकती है। उन्होंने लिखा कि ‘पहली बात, कोई सरकारी नौकरी नहीं है। फिर भी, कुछ अवसर आते हैं, तो पेपर ही लीक हो जाते हैं। अगर परीक्षा ली जाती है, तो कई साल तक उसके परिणाम ही नहीं आते या किसी घोटाले की वजह से उसे रद्द कर दिया जाता है। 1.25 करोड़ युवा दो साल से रेलवे ग्रुप-डी नौकरी के लिए इंतजार कर रहे हैं। ऐसा ही सेना में नौकरी को लेकर है। आखिर, युवाओं को कब तक धैर्य बनाए रखना चाहिए?’

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