हरियाणा का मिर्चपुर कांड: दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बदला, 20 दोषियों को सुनाई उम्रकैद की सजा 

हरियाणा के मिर्चपुर गांव में 2010 में एक विवाद के बाद दलितों के घर जलाने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुना दिया। इसमें हाईकोर्ट ने 20 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इनमें से कुछ को ट्रॉयल कोर्ट ने बरी कर दिया था

फोटो: सोशल मीडिया 
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नवजीवन डेस्क

हरियाणा के मिर्चपुर कांड में दलित समुदाय के बाप-बेटी को जिंदा जलाने के 20 दोषियों को दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम फैसले में शुक्रवार को उम्रकैद की सजा सुनाई है। हाई कोर्ट ने इन सभी को अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट के तहत सजा सुनाई है। इससे पहले इस मामले में दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने 3 लोगों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इनमें से कुछ को ट्रॉयल कोर्ट ने बरी कर दिया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में जाट समुदाय के उन लोगों को भी दोषी ठहराया है, जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। अपने फैसले में कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जाट समुदाय ने जानबूझकर बाल्मीकी समुदाय के लोगों पर हमला किया था।

कोर्ट ने आगे कहा, “मिर्चपुर में 19 से 21 अप्रैल, 2010 के बीच हुई घटनाएं एक बार फिर यह कड़वा एहसास दिलाती हैं कि भारतीय समाज में दो चीजों, समानता और भाईचारा पूरी तरह नदारद हैं।” जैसा डॉ भीमराव अम्बेडकर ने संविधान के अंतिम ड्राफ्ट में लिखा था।

कोर्ट ने कहा कि इस घटना से दलितों के 254 परिवारों की जिंदगी प्रभावित हुई। उन्हें अपना गांव मिर्चपुर छोड़कर पलायन करना पड़ा। कोर्ट ने कहा कि आजादी के 70 साल के बाद भी दलितों के साथ इस तरह की घटना बेहद शर्मनाक है। दलितों के खिलाफ अभी भी अत्याचार कम नहीं हुए हैं। हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को आदेश दिया है कि सरकार इन परिवारों को पुनर्वास प्रदान करे।

घटना 8 साल पुरानी है जब अप्रैल 2010 में हरियाणा के मिर्चपुर इलाके में 70 साल के दलित बुजुर्ग और उसकी बेटी को जिन्दा जिला दिया गया था। जिसके बाद गांव के दलितों ने पलायन कर लिया था। जिसके बाद दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने मिर्चपुर कांड में दोषी ठहराए गए 15 आरोपियों में से घर जलाने वाले 3 को उम्रकैद और आगजनी के 5 दोषियों को पांच-पांच वर्ष कैद समेत 20-20 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। 2011 में अपने फैसले में 82 आरोपियों को रोहिणी कोर्ट ने बरी कर दिया था।

घटना हरियाणा में हुई थी लेकिन उसके बावजूद इस पूरे मामले की सुनवाई पहले दिल्ली की निचली अदालत और फिर दिल्ली हाईकोर्ट में हुई। ऐसा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुआ क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को लगा कि दलितों से जुड़ें इस मामले की ठीक से सुनवाई हरियाणा में नहीं हो सकती और इस मामले से जुड़े गवाहों को प्रभावित करना आसान होगा अगर सुनवाई हरियाणा में ही हुई।

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