छत्रपति शिवाजी को लेकर महाराष्ट्र में सियासी घमासान, फिल्म 'हर हर महादेव' के विरोध और बचाव में उतरी पार्टियां

महाराष्ट्र में हाल में रिलीज हुई 'हर हर महादेव' नाम की फिल्म को लेकर राजनीतिक दल उद्धेलित हैं। फिल्म में शिवाजी महाराज को लेकर कहानी है। बस शिवाजी पर अपना हक जताने को लेकर राजनीतिक दल मैदान में उतर आए हैं। लेकिन कौन किसका विरोध कर रहा है, यह काफी रोचक है।

फिल्म का पोस्टर
फिल्म का पोस्टर
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सुजाता आनंदन

मराठी फिल्म, ‘हर हर महादेव’, दो हफ्ते पहले पूरे महाराष्ट्र के सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स में आम फिल्मों की तरह रिलीज हुई। लेकिन कुछ समय बाद ही मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज को अपना बताने को लेकर एक विवाद शुरु हो गया। स्थिति अब यह है कि यही नहीं पता चल पा रहा है कि दरअसल कौन शिवाजी महाराज को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहा है और कौन सही मायनों में शिवाजी महाराज की छवि बचाने की कोशिश कर रहा है।

हर हर महादेव फिल्म की कहानी पवन खिंड नाम के एक व्यक्ति पर केंद्रित है। पवन खिंड एक मावला या मवाली है। शिवाजी महाराज के सैनिकों को भी मवाली कहा जाता था जिन्होंने बीजापुर सल्तनत के खिलाफ भीषण युद्ध लड़ा था ताकि शिवादी महाराजा को विशालगढ़ में सुरक्षित रास्ता मिल सके। किंवदंती के मुताबिक शिवाजी कोल्हापुर के पनहाला किले में थे और उन्हें आदिलशाही और मुगल सेनाओं ने दो तरफ से घेर लिया था। उन्हें अनुमान था कि उनकी अपनी सेना इन दोनों का मुकाबला नहीं कर सकेगी। ऐसे में उन्होंने एक घोड़ खिंड (घोड़े के निकलने भर का रास्ता) के संकरे पहाड़ी रास्ते को सुरक्षित करने का तरीका अपनाया। इस रास्ते को बचाने में शिवाजी के 300 सैनिक मारे गए थे।

हालांकि बाद में वे आदिलशाही सेना के हाथों परास्त हुए, लेकिन तब तक शिवाजी वहां से भेष बदलकर सुरक्षित विशालगढ़ के लिए निकल गए थे। उन्होंने वहां पहुंचकर पांच तोपें दागी जोकि संकेत था कि वे सुरक्षित विशालगढ़ पहुंच गए हैं। इस पास को बाद में पवन खिंड यानी पवित्र पास का नाम देकर इस तरह शिवाजी की रक्षा करने वाले मावलियों को समर्पित किया गया। जिन मावलियों ने इस युद्ध में जान गंवाई थी उनमें मावलियों का सरदार बाजी प्रभु देशपांजे भी था जो बुरी तरह घायल होने के बाद भी आखिरी दम तक तब तक लड़ता रहा जब तक उसने तोपों की आवाज नहीं सुन ली।

इतिहास में इस प्रसंग को आदिलशाही जनरल अफजल खान द्वारा शिवाजी की हत्या के प्रयास और जवाब में शिवाजी द्वारा सिंह पंजे द्वारा अफजल खान का सीना चीर देने की घटना के साथ पूरा किया गया है। हालांकि शिवाजी ने बाद में अफजल खान को पूरे सम्मान के साथ प्रतापगढ़ में दफ्न करवा दिया था। इसी प्रतापगढ़ में पिछले सप्ताह बॉम्हे हाईकोर्ट के आदेश पर अफजल खान के मकबरे को ढहा दिया गया और इसके आसपास के सारे अतिक्रमण को भी हटा दिया गया।


यह संयोग है कि ऐसा शिवाजी के वंशज माने जाने वाले छत्रपति संभाजी राजे ने प्रेस कांफ्रेंस कर हर हर महादेव फिल्म में इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का दावा किया था। संभाजी के मुताबिक फिल्म में शिवाजी को मराठा के बजाए मराठी के तौर पर पेश किया गया है और दिखाया गया है कि वे एक अंग्रेज अफसर से मराठी बोलने को कहते दिखाए गए हैं जबकि वे कभी भी मराठी नहीं बोलते थे। संभाजी का कहना है कि इस तरह शिवाजी को सिर्फ महाराष्ट्र का राजा बताया गया है जबकि उनका राज तो पेशावर (अब पाकिस्तान में), दक्षिणी, पश्चिमी और पूर्वी भारत के साथ ही मध्य भारत के कई हिस्सों तक फैला हुआ था।

बात इतने पर ही खत्म नहीं हुई। अब इसमें जाति का भी तड़का लग गया है। फिल्म में बाजी प्रभु देशपांडे को उस मौके पर तलवार लिए दिखाया गया है जब शिवाजी ने अफजल खान को मारा था। जबकि तथ्य यह है कि बाजी प्रभु देशपांडे ने तो घोड़ खिंड में शिवाजी की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागे थे। शिवाजी ने अफजल खान पर उस समय हमला किया था जब युद्ध विराम के प्रस्ताव के साथ आए अफजल खान ने शिवाजी पर हमला करने की कोशिश की थी। लेकिन फिल्म में दिखाया गया है कि शिवाजी ने अफजल खान को अपनी गोद में उठा लिया और सिंह के पंजों से उसका पेट फाड़ दिया, बिल्कुल उसी तरह जैसा कि विष्णु के नरसिंह अवतार में होता है।

छत्रपति संभाजी बीजेपी से एक बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। इस फिल्म को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) अध्यक्ष राज ठाकरे और महाविकास अघाड़ी सरकार में मंत्री रहे और एनसीपी नेता जितेंद्र आह्वाड के समर्थक विरोध कर रहे हैं। इन दोनों के समर्थकों ने थाणे में एक मल्टीप्लेक्स में धावा बोलकर इस फिल्म की स्क्रीनिंग रुकवा दी। जितेंद्र आह्वाड को तो इसके लिए गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया गया।

उधर डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और शिवेसना नेता आदित्य ठाकरे ने यह कहकर फिल्म से किनारा कर लिया है कि उन्होंने अभी फिल्म देखी नहीं है। लेकिन साथ ही कहा है कि फिल्म में अगर तथ्यों से छेड़छाड़ हुई है तो गलत है और इसके विरोध में कानून को अपने हाथ में नहीं लिया जा सकता।

विवाद के बाद महाराष्ट्र के सिनेमाघरों से फिल्म हटा ली गई है, लेकिन फिल्म के डायरेक्टर अभिजीत देशपांडे ने यह कहते हुए फिल्म का  बचाव किया है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड ने पास किया है। जबकि एनसीपी की कहना है कि सिर्फ इतना काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए ऐतिहासिक दस्तावेज पेश कर फिल्म में दिखाए गए तथ्यों की पड़ताल होनी चाहिए।


उधर अभी हाल में नांदेड़ में भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होकर राहुल गांधी को संविधान की प्रति भेंट करने वाले एनसीपी के महाराष्ट्र अध्यक्ष जयंत पाटिल और पार्टी सांसद सुप्रिया सुले ने फिल्म पर जितेंद्र आह्वाड के कदम का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि शिवाजी महाराज से जुड़े किसी भी ऐतिहासिक तथ्य से छेड़छाड़ की किसी को भी इजाजत नहीं दी जा सकती।

इस तरह इस विवाद से वह रेखा काफी हद तक धुंधली नजर आने लगी है जोकि हिंदुत्व की रक्षा का दम भरने वाले और शिवाजी को अपना मराठा योद्धा मानने वालों के बीच है। जितेंद्र आह्वाड ने राज ठाकरे की इस बात के लिए आलोचना की है वे यूं तो खुद को  शिवाजी का अवतार समझते हैं लेकिन जानबूझकर तथ्यों से छेड़छाड़ को सही ठहरा रहे हैं। उन्होंने बीजेपी पर भी निशाना साधा है कि एक तरफ तो बीजेपी न सिर्फ शिवाजी को एक अलग रूप में दिखाने की समर्थन कर रही है बल्कि भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह का भी अपमान कर रही है।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत बावनखुले ने भी इस बीच फिल्म का समर्थन कर अपना पैर विवाद में फंसा लिया है। उन्होंने उलटा आह्वाड पर ही भगवान नरसिंह और शिवाजी के अवतार के अपमान का आरोप लगा दिया है।

इसके अलावा शरद पवार के पोते और एनसीपी विधायक रोहित पवार ने भी विवाद पर बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि शिवाजी के इतिहास से छेड़छाड़ करने वाली फिल्म को नहीं दिखाने दिया जाएगा।

अतिवादी संगठन संभाजी ब्रिगेड ने भी इस फिल्म को दिखाने वाले सिनेमाघरों पर धावा बोलने की धमकी दी है। इसके उलट एमएनएस ने पूरे महाराष्ट्र में इस फिल्म को मुफ्त में दिखाने का ऐलान कर दिया है।

कुल मिलाकर इस फिल्म को लेकर पूरे महाराष्ट्र में राजनीतिक दल एक दूसरे के आमने-सामने आ गए हैं। और मुद्दा यह है कि कौन इतिहास के साथ है और कौन शिवाजी पर अपना हक जमा रहा है। रोचक बात यह है कि शिवाजी के नाम से राजनीतिक दल बनाने वाली शिवसेना के दोनों धड़े इस विवाद पर फिलहाल खामोश हैं और जो भी राजनीतिक गतिविधियां हो रही हैं उन पर नजर रखे हुए हैं।

हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर भड़क उठने वाली बीजेपी तो भगवान नरसिंह के रूप को दिखाने पर आपत्ति कर रही है। वहीं शिवसेना के राजनीतिक स्थान को हासिल करने की कोशिश कर रही एनसीपी भी नरसिंह के रुप को इस तरह दिखाने के खिलाफ है।

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