चुनावी घेराबंदी के पहले यूपी में ‘प्रशासनिक बाड़बंदी’

उत्तर प्रदेश में हाल के दिनों में बड़े पैमाने पर पुलिस और प्रशासनिक फेरबदल किए गए हैं। इसे आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले की उस जरूरी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है जो जरूरत पड़ने पर मुफीद साबित हो।

हाल के दिनों में योगी आदित्यनाथ ने पुलिस और प्रशासन में बड़े पैमाने पर फेरबदल किया है
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उत्तर प्रदेश में रविवार को 10 और सोमवार को 34 सीनियर आईएएस के बाद मंगलवार देर रात 18 सीनियर आईपीएस के तबादले और आने वाले दिनों में कुछ और ब्यूरोक्रेटिक ‘गोटियां’ इधर-उधर खिसकाए जाने की चर्चाएं विधानसभा चुनावों की घेराबंदी से पूर्व ‘प्रशासनिक बाड़बंदी’ है। सबकी निगाहें अब तबादलों की अगली किस्त पर हैं।

सूबे में कई मंत्रियों की अफ़सरों से शिकायत तो शुरू से रही, लेकिन चुनावी बेला क़रीब आते और लखनऊ में दिल्ली की सक्रियता भांप नाराज़गी के स्वर मुखर होने लगे थे। लखनऊ में हाल में हुई समन्वय बैठक में तो कुछ विधायकों का कथित रूप से ग़ुस्सा इस कदर फूटा कि कुछ लोगों के अनुसार किसी की रुलाई ही फूट गई, हालांकि कुछ लोग इसे दबाव की राजनीति भी मानते हैं, जिसका असर उन्हें बहुत जल्द ही इन ताबड़तोड़ तबादलों के रूप में दिख भी गया। 

कई मंत्रियों को भी लम्बे समय से शिकायत थी कि उनके प्रमुख सचिव उनकी बात ही नहीं सुनते। ऐसे ही एक अफ़सर से ऊर्जामंत्री एके शर्मा दुखी बताए जाते रहे और कई बार यह दुःख ग़ुस्से के गिलास के बाहर भी छलकता रहा। एक पंचायती राज सचिव से ओमप्रकाश राजभर भरे हुए थे तो सचिवालय में बैठने वाले दो ‘प्रमुख’ ऐसे थे जिनसे दोनों उप-मुख्यमंत्री ही खार खाए बैठे थे। रिटायरमेंट की कगार पर बैठे एक अफ़सर की गाड़ी उप-मुख्यमंत्री बृजेश पाठक की पटरी से मेल नहीं खा रही थी। चर्चाएं और भी तमाम हैं।

पूर्व आईपीएस एके वर्मा मानते हैं कि ऐसे में चुनावी समय नज़दीक आते देख अफ़सरों को इधर-उधर कर सरकार ने मंत्रियों के लिए वही पुरानी हवादार खिड़की खोली है, जो आमतौर में ऐसे अवसरों पर होता है, लेकिन इसमें किसी को खुश करने से ज्यादा चुनाव पूर्व अपने मोहरों को खानों में अपने अनुकूल बिठाने के तौर पर ज्यादा देखा जाना चाहिए। 

सर्वज्ञात है कि यूपी के असली चुनाव (विधानसभा) में अब चंद महीने ही शेष हैं, लेकिन इस बीच कई छोटे-छोटे चुनाव ज़ेन जी की भाषा में कहें तो ‘बैक टु बैक’ लगे हुए हैं, जिनमें और जिनकी अपनी-अपनी आचार संहिता लगनी होती है और ऐसे में कम से कम ज़िलाधिकारियों (रिटर्निंग अफ़सर) का तबादला नहीं हो पाता है। एडीएम या एसओ के तबादले भी इस दौरान संभव नहीं रह जाते। उसके बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण (चुनाव से पहले ज़ारी होने वाली अंतिम मतदाता सूची) का समय आ जाएगा, तब भी ऐसे तबादले संभव नहीं होंगे, क्योंकि फ़ाइनल ड्राफ़्ट तक इसके लिए इंतज़ार करना होगा। ऐसी स्थिति में चुनाव की घोषणा या आचार संहिता लागू होने में इतना कम वक्त रह जाएगा (जनवरी में या उसके आसपास कभी भी) कि सरकार के लिए मनमाफ़िक तबादले न तो संभव रह जाएंगे न इतने कम अंतराल पर होने की स्थिति में नई जगह पर मुफ़ीद साबित होंगे।


सूबे की राजनीति और नौकरशाही पर सतर्क नज़र रखें वाले वरिष्ठ पत्रकार परवेज़ अहमद कहते हैं कि इतने कम दिन में न तो सरकार के पास मोहरों की सही चाल सोचने का वक्त होगा और न ही मोहरे उस तेज़ी से अपना ‘कमाल’ दिखा पाने में सक्षम होंगे। ऐसे में समय रहते तबादले कर सरकार ने कुछ मंत्रियों, विधायकों को कथित रूप से खुश किया भी हो तो असल कहानी कहीं और है। 

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता याद दिलाते हैं कि इस बार बीएल संतोष के सामने विधायकों के ‘सब्र का बांध’ जिस तरह टूटने की बात कही जा रही है, वह भी कोई पहली बार नहीं है और यह भी महज संयोग नहीं है कि तब भी बीएल संतोष ही थे जब 2021 में लखनऊ की समन्वय बैठक में बीजेपी विधायकों का वह कथित बांध टूटा था और मुख्यमंत्री उस समय भी योगी आदित्यनाथ ही थे।

तब भी कई प्रमुख नेताओं और विधायकों की शिकायत थी कि अफ़सर उनकी बात नहीं सुनते; विधायकों की प्रशासन में सुनवाई नहीं है; जनता के काम नहीं हो पा रहे हैं; और सरकार तथा संगठन के बीच समन्वय की कमी है। बाद में केशव प्रसाद मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य, स्वतंत्र देव सिंह और सिद्धार्थनाथ सिंह आदि जैसे नेताओं और मंत्रियों की सरकार और अफसरशाही से जुड़ी शिकायतों के कई मामले उछले भी थे।

नाराज़गी का मामला 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भी बीएल संतोष की ही उस बैठक में आया था, जिसमें योगी आदित्यनाथ के साथ केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक भी मौजूद थे, और वहां भी विधायकों/संगठन के लोगों की नाराजगी तथा सरकार-अफसरों के संबंधों की चर्चा हुई थी।

ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक उत्कर्ष सिन्हा की यह टिप्पणी खासी मौजू हो जाती है कि ‘बीजेपी के राज में विधायकों के ऐसे असंतोष और ग़ुस्से की बातें समय-समय पर आती ही रहती हैं और इसे आसानी से निपटा भी लिया जाता है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। असल सवाल यह है कि दस साल पूरे कर रही सरकार अपने तमाम वादे और दावे पूरे करने में विफल रही है और उसकी भरपाई के लिए उसके पास महज हिन्दू-मुसलमान वाला पुराना हथकंडा ही फिर अंतिम सहारे के रूप में दिख रहा। बात यह भी है आम जनता अब इस सब से ऊब चुकी है और ‘भक्त प्रजाति’ भी खुलकर सवाल करने लगी है’। 

यूपी में बीजेपी अपनी पांच साला सत्ता का दूसरा कार्यकाल पूरा कर रही है लेकिन सच है कि इस दूसरे कार्यकाल में शुरू से ही ‘समन्वय’ के सूत्र और सिद्धांत पर चलने वाली इस पार्टी और सरकार में अगर कुछ नहीं रहा तो यही दो बातें सबसे ऊपर रहीं। कभी ‘मुख्यमंत्री की जाति वालों’ के आधार पर नाराज़गी दिखी तो कभी जन-प्रतिनिधियों यहां तक कि वरिष्ठ  मंत्रियों तक की बात सुने जाने का दंश उभरता रहा। अफ़सरशाही से उप-मुख्यमंत्रियों की नाज़रागी तक की खबरें हवाओं में उछलती रहीं। सूबे की सत्ता के प्रथम कार्यकाल में ही सत्ता की एक लॉबी से ऊबे विधायकों के धरने की बात लोगों को अब भी याद है।   


ज़मीनी हक़ीक़त यह भी है कि बदले माहौल में सरकार और पार्टी (बीजेपी) को अपनी ज़मीन के भीतर की ‘खुश्की’ और ‘नमी’ का अहसास है और ज़ेन जी के हालिया उभार ने उसके चश्मे पर पड़ी धुंध और ज्यादा साफ कर दी है। लोग जिस तरह अफ़सरशाही से परेशान हैं, राजधानी से लेकर सुदूर जिले तक नागरिक की टूटी सड़कों, नाली-खड़ंजा और कम मिलते राशन जैसी समस्याओं पर भी कोई ध्यान नहीं दे रहा, सरकार जनता से सीधे जुड़े अफ़सरों को इधर से उधर करके वहां भी एक संदेश देना चाहती है। अब यह संदेश किस हद तक, और किस भाषा और परिमाण में वहां तक पहुंचता है, यह समय ही तय करेगा।

यूपी की सत्ता में ब्यूरोक्रेसी और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव के मामले नए नहीं है:  

सबसे चर्चित मामला जुलाई 2024 में नंद किशोर गुर्जर का रहा जब गुर्जर ने जनप्रतिनिधियों की बैठक में पुलिस आयुक्त के व्यवहार और अपनी सुरक्षा हटाए जाने की शिकायत की थी और एक डीसीपी को हटना पड़ा था। अलीगढ़ में तो एक भाजपा विधायक के सम्मान/प्रोटोकाल का मामला उस वक्त चर्चा में रहा जब एक इंस्पेक्टर द्वारा उनको सलाम न ठोकने का आचरण ‘बड़ा’ मुद्दा बन गया। बेचारा लाइन हाजिर हुआ। बांदा में एक एसडीएम को इसलिए हटना पड़ा कि उसने रेत के ओवरलोडेड ट्रक पकड लिए थे और ‘माननीय विधायक’ को यह रस नहीं आया था। यहां नेताजी की बात न मानने से ज्यादा खनन माफिया की हरकत और प्रशासनिक टकराव ज्यादा अहम था। 

वैसे भी विधायक/जन प्रतिनिधियों के फोन न उठाना, कॉल बैक न करना, कथित अभद्र व्यवहार, सरकारी कार्यक्रमों में विधायक को न बुलाना या अनदेखी, कई जगह पूर्व विधायक को महत्व मिलना, या शिलापट्ट से नेताजी का नाम ग़ायब हो जाना जैसी शिकायतें आम रही हैं और ऐसी ही शिकायतें इस बार भी थीं, जब मुख्यमंत्री और दोनों उप मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में बीएल संतोष सरकार के कामकाज, जनप्रतिनिधियों के परफ़ॉरमेंस की समीक्षा कर रहे थे। यह विवाद इससे पहले भी कई बार उठ चुका था और फरवरी 2026 में तो विधानसभा के भीतर भी उठा, जब अध्यक्ष सतीश महाना ने अफ़सरों को विधायकों के साथ उचित बर्ताव और प्रोटोकाल सुनिश्चहित करने के निर्देश दिए थे। खास बात यह कि तब ऐसी  शिकायतें सतापक्ष और विपक्ष दोनों के ही विधायकों ने की थीं।

मामले का दिलचस्प पहलू यह भी था कि विधायकों की शिकायत सिर्फ बदे अफ़सरों से ‘सम्मान’ की नहीं थी, यह भी थी कि ज़िले, तहसील और थाने के स्तर पर भी अफ़सरों के ऐसे आचरण के कारण वे जनता के कामों में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहे। 

सिद्धार्थ राजू की राय में यह कहना जल्दबाजी होगी कि योगी सरकार ने मुख्यतः नाराज विधायकों/जन प्रतिनिधियों को खुश करने के लिए यह तबादले किए हैं, लेकिन यह कहना भी मुश्किल है कि इसमें राजनीतिक असंतोष का कोई रोल नहीं है। कई मामले दिखाते हैं कि सरकार के सामने मंत्री-अधिकारी और विधायक-अधिकारी संबंधों के सवाल वास्तविक हैं और चिंता का कारण भी। इन बदलावों के साथ चुनाव-पूर्व प्रशासनिक मोहरा सेटिंग भी स्पष्ट रूप से देखा जाना ही चाहिए।

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