आखिर अब किसकी है शिवसेना! शिव संवाद और 'आपला भगवा' के साथ सड़कों पर उतरे ठाकरे

उद्धव ठाकरे भले ही मुख्यमंत्री नहीं रहे, लेकिन महाराष्ट्र के लोग आज भी उन्हें ही शिवसेना नेता मानते हैं। लोग उनकी पार्टी को अब ‘उद्धव ठाकरे ची शिवसेना’ कहते हैं जबकि एकनाथ शिंदे के समर्थक ‘शिंदे ची शिवसेना’ बोलते हैं।

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सुजाता आनंदन

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उद्धव ठाकरे भले ही मुख्यमंत्री नहीं रहे, लेकिन महाराष्ट्र के लोग आज भी उन्हें ही शिवसेना नेता मानते हैं। लोग उनकी पार्टी को अब ‘उद्धव ठाकरे ची शिवसेना’ कहते हैं जबकि एकनाथ शिंदे के समर्थक ‘शिंदे ची शिवसेना’ बोलते हैं। इस दौरान पार्टी के चुनाव चिह्न, झंडे, टाइगर के चेहरे और मराठी मानुस के समर्थन के साथ शिवाजी की विरासत को फिर से हासिल करने के लिए ठाकरे परिवार कोई कोर कसर नहीं छोड़ रह है।

ठाकरे परिवार उस भावना का भी राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है कि गुजराती बहुल बीजेपी ने एक मराठी का अपमान करने की कोशिश की है। बता दें कि अखंड बॉम्बे के मुख्यमंत्री रहे मोरारजी देसाई के समय से ही महाराष्ट्र के लोगों में गुजरात को लेकर एक तरह का गुस्सा है, क्योंकि उन्होंने 50 के दशक में हुए संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया था जिसमें 106 लोगों की मौत हुई थी। दरअसल यही वह भावना थी जिसके आधार पर 1966 में शिवसेना अस्तित्व में आई थी।

सत्ता में रहते हुए और सत्ता से बाहर की शिवसेना में अंतर महाराष्ट्र के लोग अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं। किसी भी विषम परिस्थिति में जुझारू शिव सैनिक बारिश आ गर्मी की परवाह किए बिना सड़क पर उतरते हैं और एयरकंडीशंड कमरों के बजाए सड़क पर संघर्ष करते रहे हैं। शिवसेना के इसी चरित्र को फिर से जीवित करने के लिए उद्धव के पुत्र आदित्य ठाकरे जनता के बीच उतरे हैं और उन्होंने राज्य भर में लोगों से शिव संवाद शुरु करने का कार्यक्रम बनाया है।

इस बार के शिव संवाद का नजारा बदला हुआ है। हालांकि 2019 में भी आदित्य ठाकरे ने ऐसा एक अभियान किया था लेकिन उस समय आदित्य ठाकरे को देवेंद्र फडणविस के मातहत डिप्टी सीएम के तौर पर तैयार किया जा रहा था और सारा कामकाज पीआर एजेंसियों ने संभाल रखा था, जिसमें शिवसैनिकों को पीछे की कतार में धकेल दिया गया था। उससे बहुत अच्छी छवि और प्रभाव जनता के बीच नहीं गया था। लेकिन इस बार सारी कमान शिवसैनिकों के हाथ में है और वही शिव संवाद का प्रबंधन कर रहे हैं।


गौरतलब है कि शिवसेना विपक्ष के तौर पर हमेशा बहुत प्रभावी रही है। सत्ता से सड़क पर संघर्ष करने में शिवसेना माहिर है। हालांकि महा विकास अघाड़ी सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे की काफी सराहना हुई है, लेकिन विपक्ष के तौर पर स्थितियां एकदम विपरीत हैं।

इसमें संदेह नहीं कि शिवसेना पर बीजेपी का दबाव है, और बकौल संजय राउत, बीजेपी तो अब शिवसेना के चिह्न के साथ-साथ दादर स्थित सेना भवन और मातोश्री तक पर कब्जा करने की साजिश रच रही है। सेना भवन और मातोश्री वही जगहें हैं जहां से बाला साहेब ठाकरे ने पांच दशक तक शिवसेना को नियंत्रित किया। लेकिन अब ऐसे संकेत उभर रहे हैं कि ठाकरे एकजुट होकर जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार हो रहे हैं। वैसे तो देवेंद्र फडणवीस भी मानते हैं कि ठाकरे और शिवसेना एक दूसरे के पर्याय हैं। और सूत्रों की मानें तो संभवत: इसीलिए उन्होंने राज ठाकरे से मिलकर उनके बेटे अमित ठाकरे को शिंदे सरकार में मंत्री बनाए जाने की पेशकश की थी। सरगोशियां हैं कि राज ठाकरे ने इस पेशकश को विनम्रता से ठुकरा दिया है।

शिवसेना के आड़े-तिरछे भगवाध्वज की भी रोचक कहानी है। पूर्व शिवसैनिक छगन भुजबल बताते हैं कि शिवसेना के शुरुआती दिनों में शिवसैनिकों को सैकड़ों गज भगवा रंग का पालिस्टर दिया गया। लेकिन बहुत सो को पता ही नहीं था कि क्या करना है, तो उन्होंने इसे आड़ा-तिरछा काट कर झंडा बना दिया। इसे ऐसे त्रिकोणीय आकार में काटा गया था कि इस पर कुछ छापने की गुंजाइश ही नहीं बची थी। इस तरह थान के थान बरबाद हो गए थे, तब कहीं जाकर शिवसैनिकों को समझ आया था कि आखिर इसका करना क्या है।

बाल ठाकरे दरअसल शिवसेना का झंडा वैसा ही चाहते थे जैसा कि शिवाजी महाराज का भगवा ध्वज होता था। एक समान रेखा में वी का आकार बनाता हुआ, हवा में लहराने पर एक विशेष आकृति दिखाता हुआ। लेकिन शिवसैनिकों को तो इसकी पूरी समझ थी नहीं। भुजबल दावा करते हैं कि वे इसके बाद शिवसैनिकों के साथ बैठे और उन्हें समझाया कि किस तरह कपड़ा काटकर भगवा ध्वज बनाना है।


इसे बहुत ही सरल रखा गया था ताकि किसी किस्म का असमंजस न रहे। इसमें कोई और रंग की पट्टी नहीं मिलाई गई, साथ ही किसी किस्म की सिलाई या रंगाई की भी जरूरत नहीं पड़ी। यह पूरी तरह शुद्ध भगवा झंडा था। कई बार इस पर एक टाइगर की आकृति छापी जाती है सिर्फ प्रभाव और आभा के लिए और इस पर कई बार पार्टी का चुनाव चिह्न तीर-कमान छापा जाता है। बाल ठाकरे झंडे को लेकर किसी भी किस्म के विवाद से बचना चाहते थे इसीलिए उन्होंने इसे सिर्फ आपला भगवा या सिर्फ भगवा ही कहा।

जब राज ठाकरे शिवसेना से अलग हुए थे तो उन्होंने अपने झंडे का रंग भगवा, सफेद और नीला रखा, साथ ही उसमें हरी पट्टियां डालीं। मकसद झंडे के माध्यम से सभी समुदायों , मुस्लिम और दलितों को भी आकर्षित करना था। लेकिन राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माम सेना (मनसे) राजनीतिक तौर पर कोई कमाल नहीं दिखा पाई। इसीलिए हाल ही में राज ठाकरे ने अपनी पार्टी के झंडे में कुछ बदलाव किए हैं और काफी हद तक उसे छत्रपति शिवाजी के झंडे जैसा बना दिया है।

भले ही उन्होंने अपने झंडे में बदलाव किया है लेकिन मराठी मानुस में अभी भी शिव सेना के भगवा का ही गहरा सम्मान है।

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